Tom Vattakuzhy की कला का मुंबई में खास आगाज, ‘Where Words End’ प्रदर्शनी में सन्नाटे और रंगों के जरिए कहानी

Tom Vattakuzhy की कला का मुंबई में खास आगाज, ‘Where Words End’ प्रदर्शनी में सन्नाटे और रंगों के जरिए कहानी

प्रेषित समय :21:54:22 PM / Sun, May 3rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

भारतीय समकालीन कला जगत में अपनी अलग पहचान बना चुके Tom Vattakuzhy ने आखिरकार मुंबई में अपनी पहली प्रदर्शनी के साथ दस्तक दे दी है, जो कला प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है। ‘Where Words End’ शीर्षक से आयोजित यह प्रदर्शनी Kala Ghoda स्थित ICIA में 17 मई तक जारी रहेगी, जहां कलाकार की 55 कृतियां दर्शकों के लिए प्रदर्शित की गई हैं।

करीब दो दशकों से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी कला का प्रदर्शन कर चुके वट्टाकुझी के लिए यह मुंबई डेब्यू खास मायने रखता है। दिलचस्प बात यह है कि जहां कई कलाकार अपने करियर के शुरुआती दौर में मुंबई का रुख करते हैं, वहीं उन्होंने एक अलग रास्ता चुना। उन्होंने अपनी कला को पेशे से ज्यादा एक आंतरिक आवश्यकता के रूप में देखा और आर्थिक जरूरतों को पूरा करने के लिए अन्य कार्य करते हुए अपनी रचनात्मकता को स्वतंत्र बनाए रखा।

कलाकार बताते हैं कि उनके लिए समय और सफलता की परिभाषा अलग रही है। उन्होंने ‘निष्काम कर्म’ के सिद्धांत को अपनाते हुए बिना परिणाम की चिंता किए अपने काम पर ध्यान केंद्रित किया। उनका मानना है कि अगर उनके काम में वास्तविक मूल्य है, तो वह अपने समय पर दर्शकों तक जरूर पहुंचेगा। यही वजह है कि उन्होंने कभी भी तेजी से पहचान पाने की कोशिश नहीं की, बल्कि अपनी कला को स्वाभाविक रूप से विकसित होने दिया।

वट्टाकुझी की पेंटिंग्स में अक्सर समाज के भीतर छिपे दर्द, खामोशी और अनकहे भाव नजर आते हैं। हालांकि वह इसे किसी थीम के रूप में नहीं देखते, बल्कि कहते हैं कि ये भावनाएं उनके आसपास के सामाजिक और राजनीतिक परिवेश से स्वतः उनके काम में उतरती हैं। उनके अनुसार, समुदाय के ‘घाव’ हमेशा स्पष्ट नहीं होते, बल्कि वे खामोशी, ठहराव और लोगों के व्यवहार में दिखाई देते हैं। उनकी कला इन्हीं सूक्ष्म भावनाओं को सामने लाने का प्रयास करती है, ताकि दर्शक अपने अनुभवों से जुड़ सकें।

उनकी कृतियों में रंगों का चयन भी विशेष महत्व रखता है। सफेद, लाल और चमकीले रंगों का उपयोग पहली नजर में विरोधाभासी लगता है, लेकिन यही विरोधाभास उनकी कला की गहराई को बढ़ाता है। सफेद रंग उनके लिए खालीपन नहीं, बल्कि एक ‘संवेदनशील सन्नाटा’ है, जो दर्शकों को सोचने की जगह देता है। वहीं लाल रंग जीवन, ऊर्जा और कभी-कभी भीतर छिपे तनाव को दर्शाता है। इस तरह, रंग केवल सजावट नहीं बल्कि भावनाओं को गहराई देने का माध्यम बनते हैं।

उनकी चर्चित कृति ‘Death of Gandhi’ भी इसी संवेदनशील दृष्टिकोण का उदाहरण है। इस पेंटिंग में उन्होंने Mahatma Gandhi की हत्या को एक ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं, बल्कि वर्तमान समय से जुड़ी एक निरंतर अनुभूति के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश की है। उनका मानना है कि गांधी की मृत्यु केवल अतीत की घटना नहीं है, बल्कि आज के सामाजिक और राजनीतिक संदर्भ में भी उसकी गूंज सुनाई देती है।

वट्टाकुझी ने अपने करियर की शुरुआत प्रिंटमेकिंग से की थी, जिसमें लिथोग्राफी, एचिंग और चारकोल का इस्तेमाल शामिल था। लेकिन समय के साथ उन्होंने कैनवास पर पेंटिंग को अपनाया, क्योंकि यह माध्यम उन्हें अधिक स्वतंत्रता और तत्काल अभिव्यक्ति की सुविधा देता है। उनका कहना है कि पेंटिंग के जरिए वह अपने विचारों और भावनाओं को अधिक सहजता से व्यक्त कर पाते हैं, जबकि प्रिंटमेकिंग में प्रक्रिया अधिक जटिल और समय लेने वाली होती है।

यह प्रदर्शनी न केवल उनके कलात्मक सफर का प्रतिबिंब है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि कैसे एक कलाकार बिना जल्दबाजी के, अपने तरीके से आगे बढ़ते हुए भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बना सकता है। मुंबई जैसे कला केंद्र में उनकी यह पहली प्रस्तुति दर्शकों को एक नए दृष्टिकोण से कला को समझने का अवसर दे रही है, जहां शब्दों की बजाय सन्नाटा, रंग और अनुभव अपनी कहानी कहते हैं।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-