ममता बनर्जी का सियासी सफर सड़क की लड़ाई से सत्ता तक और फिर करारी हार तक का पूरा घटनाक्रम

ममता बनर्जी का सियासी सफर सड़क की लड़ाई से सत्ता तक और फिर करारी हार तक का पूरा घटनाक्रम

प्रेषित समय :19:27:35 PM / Mon, May 4th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

कोलकाता. पश्चिम बंगाल की राजनीति में दशकों तक निर्णायक भूमिका निभाने वाली Mamata Banerjee का सियासी सफर 2026 के विधानसभा चुनावों में एक बड़े मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है. कभी सड़क से संघर्ष कर सत्ता तक पहुंचने वाली नेता के रूप में पहचान बनाने वाली बनर्जी को इस बार भारी जनादेश के साथ सत्ता से बाहर होते देखा जा रहा है. राज्य में भारतीय जनता पार्टी के उभार ने न केवल राजनीतिक समीकरण बदले हैं, बल्कि यह संकेत भी दिया है कि बंगाल की राजनीति में एक युग का अंत हो सकता है.

मतगणना के रुझानों के अनुसार Bharatiya Janata Party राज्य में स्पष्ट बढ़त बनाए हुए है और पहली बार बंगाल की सत्ता पर काबिज होने की ओर अग्रसर है. यदि अंतिम परिणाम इसी दिशा में जाते हैं तो यह लगभग पांच दशकों में पहली बार होगा जब केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही दल की सरकार होगी. दूसरी ओर All India Trinamool Congress की प्रमुख और मुख्यमंत्री रहीं बनर्जी की 15 साल पुरानी सरकार को तीव्र सत्ता-विरोधी लहर का सामना करना पड़ा है.

71 वर्षीय बनर्जी ने चुनाव प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी थी. उन्होंने दो महीनों में करीब 90 रैलियां और 20 से अधिक रोड शो किए, जो किसी भी नेता के लिए असाधारण माना जाता है. उनका यह नारा—“मैं सभी सीटों की उम्मीदवार हूं”—उनकी राजनीति की पहचान रहा है, जिसमें वह हर क्षेत्र में व्यक्तिगत रूप से सक्रिय दिखने की कोशिश करती थीं. इसके बावजूद चुनावी नतीजों ने यह साफ कर दिया कि इस बार मतदाता बदलाव के मूड में थे.

राज्य की राजनीति में बनर्जी का उदय एक संघर्षशील नेता के रूप में हुआ था. उन्होंने 1984 में पहली बार लोकसभा चुनाव जीतकर Somnath Chatterjee जैसे दिग्गज को हराया था. बाद में कांग्रेस से अलग होकर उन्होंने अपनी पार्टी तृणमूल कांग्रेस बनाई और 2000 के दशक में वाम मोर्चा सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ा. नंदीग्राम और सिंगूर जैसे भूमि अधिग्रहण विरोधी आंदोलनों ने उन्हें जनता के बीच लोकप्रिय बनाया और 2011 में उन्होंने 34 साल पुरानी वाम सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया.

हालांकि सत्ता में आने के बाद बनर्जी की सरकार पर कई चुनौतियां खड़ी हुईं. बेरोजगारी, औद्योगिक विकास की कमी और भ्रष्टाचार के आरोप लगातार विपक्ष के निशाने पर रहे. सारधा और नारदा जैसे घोटालों ने उनकी सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया, भले ही इन मुद्दों का तत्काल चुनावी असर पहले नहीं दिखा. लेकिन समय के साथ इन आरोपों ने जनता के बीच असंतोष को बढ़ाया.

2026 के चुनावों में एक बड़ा मुद्दा मतदाता सूची का पुनरीक्षण भी रहा. चुनाव आयोग द्वारा किए गए विशेष पुनरीक्षण में लाखों नाम हटाए गए, जिसे बनर्जी ने अपने समर्थकों के खिलाफ साजिश बताया. हालांकि चुनाव आयोग ने इस प्रक्रिया को नियमों के तहत बताया. इस विवाद ने चुनावी माहौल को और अधिक तीखा बना दिया.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस बार दो तरह की सत्ता-विरोधी लहर काम कर रही थी—एक पारंपरिक एंटी-इन्कम्बेंसी और दूसरी रोजगार व विकास से जुड़ी नाराजगी. इसके अलावा धार्मिक ध्रुवीकरण भी चुनावी परिणामों को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण कारक रहा. भाजपा ने जहां घुसपैठ और पहचान की राजनीति को मुद्दा बनाया, वहीं बनर्जी ने सांस्कृतिक और धार्मिक परियोजनाओं के जरिए संतुलन साधने की कोशिश की, जैसे दीघा में जगन्नाथ मंदिर और उत्तर बंगाल में महाकाल मंदिर परियोजना.

महिला मतदाता, जो लंबे समय तक बनर्जी की सबसे बड़ी ताकत माने जाते थे, इस बार निर्णायक रूप से उनके साथ नहीं दिखे. लक्ष्मी भंडार जैसी योजनाओं के बावजूद भाजपा द्वारा किए गए अधिक आर्थिक सहायता के वादों ने मतदाताओं को प्रभावित किया. इससे यह संकेत मिला कि कल्याणकारी योजनाओं के बावजूद आर्थिक अपेक्षाएं पूरी नहीं होने पर मतदाता विकल्प तलाशने लगते हैं.

चुनाव के दौरान भाजपा समर्थकों द्वारा “परिवर्तन जरूरी है” जैसे नारों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि जनता के एक बड़े वर्ग में बदलाव की इच्छा है. यही कारण रहा कि कभी अजेय मानी जाने वाली बनर्जी इस बार संघर्ष करती नजर आईं.

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बनर्जी की सबसे बड़ी रणनीतिक भूल विपक्ष को कमजोर करने की कोशिश रही, जिससे भाजपा को राज्य में अपनी जगह बनाने का मौका मिला. 2011 के बाद कांग्रेस और वाम दलों के कमजोर होने से भाजपा ने धीरे-धीरे अपना आधार मजबूत किया और अब वह सत्ता के करीब पहुंच गई है.

बंगाल के ये चुनाव परिणाम न केवल एक नेता के उत्थान और पतन की कहानी बताते हैं, बल्कि यह भी दिखाते हैं कि भारतीय राजनीति में मतदाता कितनी तेजी से अपना रुख बदल सकते हैं. ममता बनर्जी, जिन्हें कभी जुझारू और अडिग नेता के रूप में देखा जाता था, अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी हैं जहां उन्हें अपनी राजनीतिक रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है.

फिलहाल के रुझान यह संकेत दे रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में एक नया राजनीतिक अध्याय शुरू होने जा रहा है, जिसमें भाजपा का उदय और ममता बनर्जी के लंबे शासन का अंत इतिहास का हिस्सा बन सकता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-