अमेरिका में H-1B वीजा पर बड़ा झटका, 30 फीसदी ज्यादा सैलरी के बिना नौकरी मुश्किल, भारतीय प्रोफेशनल्स में बढ़ी चिंता

अमेरिका में H-1B वीजा पर बड़ा झटका, 30 फीसदी ज्यादा सैलरी के बिना नौकरी मुश्किल, भारतीय प्रोफेशनल्स में बढ़ी चिंता

प्रेषित समय :22:19:10 PM / Sun, May 10th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

वॉशिंगटन. अमेरिका में काम करने का सपना देखने वाले लाखों विदेशी प्रोफेशनल्स, खासकर भारतीय आईटी इंजीनियर्स और टेक कर्मचारियों के लिए बड़ा बदलाव सामने आ सकता है. अमेरिकी लेबर डिपार्टमेंट ने H-1B वीजा से जुड़े वेतन नियमों में बड़ा संशोधन प्रस्तावित किया है, जिसके तहत विदेशी कर्मचारियों के लिए न्यूनतम सैलरी सीमा लगभग 30 प्रतिशत तक बढ़ाई जा सकती है. यदि यह प्रस्ताव लागू होता है तो अमेरिका में नौकरी के लिए विदेशी कर्मचारियों को पहले से कहीं ज्यादा वेतन पर नियुक्त करना अनिवार्य हो जाएगा. इस प्रस्ताव ने भारतीय प्रोफेशनल्स, आईटी कंपनियों और ग्लोबल टेक इंडस्ट्री में बड़ी बहस छेड़ दी है.

अमेरिकी श्रम विभाग द्वारा पेश किए गए ड्राफ्ट प्रस्ताव का नाम “Improving Wage Protections for the Permanent Employment of Certain Foreign Nationals in the United States” रखा गया है. इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना बताया गया है कि विदेशी कर्मचारियों को कम वेतन पर नियुक्त कर अमेरिकी कर्मचारियों की मजदूरी और नौकरी के अवसर प्रभावित न हों. प्रस्ताव के अनुसार H-1B वीजा के तहत एंट्री लेवल कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन सीमा 73,279 डॉलर से बढ़ाकर 97,746 डॉलर करने की योजना है. इसके अलावा अन्य अनुभव स्तरों पर भी न्यूनतम वेतन सीमा में बड़ा बदलाव प्रस्तावित किया गया है.

विशेषज्ञों का कहना है कि यह प्रस्ताव लागू होने पर अमेरिकी कंपनियों के लिए विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करना महंगा हो जाएगा. खासकर वे कंपनियां जो बड़ी संख्या में भारतीय टेक प्रोफेशनल्स को H-1B वीजा पर नियुक्त करती हैं, उन्हें अपनी भर्ती रणनीति बदलनी पड़ सकती है. अमेरिका में कार्यरत भारतीय कर्मचारियों और वहां नौकरी की तैयारी कर रहे युवाओं के बीच इस प्रस्ताव को लेकर चिंता बढ़ गई है.

United States का श्रम विभाग मानता है कि वर्तमान वेतन ढांचा लगभग दो दशक पुराना हो चुका है और अब यह मौजूदा आर्थिक परिस्थितियों और अमेरिकी श्रम बाजार की वास्तविकता को नहीं दर्शाता. अधिकारियों के अनुसार मौजूदा व्यवस्था का फायदा उठाकर कुछ कंपनियां अमेरिकी कर्मचारियों की तुलना में विदेशी कर्मचारियों को कम वेतन पर रख रही हैं. इससे स्थानीय श्रमिकों के वेतन पर दबाव पड़ता है और रोजगार प्रतिस्पर्धा असंतुलित होती है.

अमेरिका में H-1B वीजा सबसे अधिक टेक और आईटी क्षेत्र में उपयोग किया जाता है. बड़ी टेक कंपनियों से लेकर आउटसोर्सिंग और कंसल्टिंग कंपनियां तक इस वीजा के जरिए विदेशी कर्मचारियों को अमेरिका बुलाती हैं. भारतीय पेशेवरों की इसमें सबसे बड़ी हिस्सेदारी मानी जाती है. हर साल जारी होने वाले H-1B वीजा में भारतीय नागरिकों की संख्या सबसे ज्यादा रहती है. ऐसे में प्रस्तावित बदलाव का सबसे बड़ा असर भारतीय आईटी सेक्टर और वहां काम करने वाले प्रोफेशनल्स पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है.

विशेषज्ञों का कहना है कि यदि नया नियम लागू हुआ तो अमेरिकी कंपनियां केवल अत्यधिक कुशल और अनुभवी विदेशी कर्मचारियों को प्राथमिकता दे सकती हैं. एंट्री लेवल और जूनियर प्रोफाइल पर विदेश से भर्ती कम हो सकती है क्योंकि कंपनियों को शुरुआती स्तर पर भी ज्यादा वेतन देना पड़ेगा. इससे अमेरिका में करियर शुरू करने की तैयारी कर रहे हजारों भारतीय छात्रों और युवा इंजीनियरों के अवसर प्रभावित हो सकते हैं.

हालांकि कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इसका एक सकारात्मक पक्ष भी हो सकता है. उनका कहना है कि उच्च वेतन सीमा के कारण अमेरिकी कंपनियां अब केवल वास्तव में प्रतिभाशाली और विशेष कौशल वाले विदेशी कर्मचारियों को चुनेंगी. इससे H-1B वीजा प्रणाली में गुणवत्ता आधारित चयन को बढ़ावा मिल सकता है. साथ ही पहले से अमेरिका में कार्यरत कुशल भारतीय प्रोफेशनल्स को अधिक वेतन और बेहतर सौदेबाजी की स्थिति मिल सकती है.

यह प्रस्ताव फिलहाल 26 मई तक सार्वजनिक टिप्पणियों के लिए खुला है. अमेरिकी नागरिक, कंपनियां, उद्योग संगठन और अन्य हितधारक इस पर अपनी राय दे सकते हैं. इसके बाद लेबर डिपार्टमेंट प्राप्त सुझावों की समीक्षा करेगा और फिर अंतिम नियम जारी किया जा सकता है. यदि नियम लागू होता है तो इसका असर केवल H-1B वीजा तक सीमित नहीं रहेगा. रिपोर्ट्स के मुताबिक H-1B1, E-3 और PERM लेबर सर्टिफिकेशन जैसे अन्य रोजगार आधारित वीजा कार्यक्रम भी इससे प्रभावित हो सकते हैं.

अमेरिकी टेक इंडस्ट्री में इस प्रस्ताव को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया सामने आ रही है. कुछ श्रमिक संगठनों और नीति विशेषज्ञों ने इसका समर्थन करते हुए कहा है कि यह अमेरिकी कर्मचारियों के हितों की रक्षा के लिए जरूरी कदम है. उनका कहना है कि कई कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को अपेक्षाकृत कम वेतन पर नियुक्त कर लागत घटाती रही हैं, जिससे स्थानीय श्रमिकों को नुकसान होता है.

दूसरी ओर टेक कंपनियों और उद्योग संगठनों का कहना है कि अत्यधिक वेतन सीमा बढ़ाने से कंपनियों के लिए वैश्विक प्रतिभाओं को नियुक्त करना कठिन हो सकता है. खासकर स्टार्टअप्स और मध्यम आकार की कंपनियों पर इसका अधिक असर पड़ सकता है क्योंकि उनके लिए ऊंचे वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को रखना महंगा साबित होगा. कुछ विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि इससे कंपनियां अमेरिका की बजाय दूसरे देशों में टेक ऑपरेशन बढ़ाने पर विचार कर सकती हैं.

भारतीय आईटी उद्योग पर भी इसके दूरगामी प्रभाव पड़ सकते हैं. भारत की कई बड़ी आईटी कंपनियां अमेरिका में अपने कर्मचारियों को H-1B वीजा के जरिए भेजती हैं. यदि वेतन सीमा बढ़ती है तो कंपनियों की लागत में भारी वृद्धि हो सकती है. इससे कंपनियां लोकल हायरिंग बढ़ाने, ऑटोमेशन पर जोर देने या रिमोट वर्क मॉडल को और विस्तार देने पर मजबूर हो सकती हैं.

विदेशी शिक्षा और करियर सलाहकारों का कहना है कि अमेरिका में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों को अब पहले से अधिक प्रतिस्पर्धा और कौशल आधारित तैयारी करनी होगी. केवल डिग्री के आधार पर नौकरी मिलना कठिन हो सकता है. AI, साइबर सिक्योरिटी, डेटा साइंस और क्लाउड टेक्नोलॉजी जैसे हाई-डिमांड क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले उम्मीदवारों की मांग भविष्य में ज्यादा बनी रह सकती है.

विशेषज्ञों का मानना है कि यह प्रस्ताव केवल वेतन नियमों का बदलाव नहीं बल्कि अमेरिकी रोजगार नीति में व्यापक परिवर्तन का संकेत भी है. अमेरिका अब ऐसी व्यवस्था की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है जहां विदेशी कर्मचारियों की नियुक्ति केवल लागत कम करने के लिए नहीं बल्कि विशेष कौशल और उच्च मूल्य वाले कार्यों के लिए की जाए.

यदि यह नियम लागू हो जाता है तो H-1B वीजा प्रणाली में पिछले कई वर्षों का सबसे बड़ा बदलाव माना जाएगा. इससे भारतीय प्रोफेशनल्स, अमेरिकी टेक कंपनियों और वैश्विक रोजगार बाजार पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है. फिलहाल दुनिया भर की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि सार्वजनिक टिप्पणियों और उद्योग के दबाव के बाद अमेरिकी प्रशासन अंतिम नियम में कितना बदलाव करता है.