अपरा एकादशी पर पितरों की मुक्ति और भगवान विष्णु की कृपा पाने का दुर्लभ संयोग

अपरा एकादशी पर पितरों की मुक्ति और भगवान विष्णु की कृपा पाने का दुर्लभ संयोग

प्रेषित समय :21:34:41 PM / Tue, May 12th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

ज्येष्ठ माह के कृष्ण पक्ष की पावन अपरा एकादशी इस वर्ष 13 मई 2026, बुधवार को श्रद्धा और आस्था के साथ मनाई जाएगी। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि को भगवान विष्णु की उपासना के लिए अत्यंत शुभ माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अपरा एकादशी का व्रत करने से व्यक्ति को अपार पुण्य, पापों से मुक्ति और पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यही कारण है कि इस एकादशी को “अचला एकादशी” और कई क्षेत्रों में “भद्रकाली एकादशी” के नाम से भी जाना जाता है। इस बार अपरा एकादशी को लेकर मंदिरों और धार्मिक स्थलों पर विशेष तैयारियां शुरू हो गई हैं। श्रद्धालु भगवान विष्णु की पूजा, व्रत और कथा श्रवण की तैयारियों में जुटे हुए हैं।

पंचांग के अनुसार एकादशी तिथि का प्रारंभ 12 मई 2026 को दोपहर 2 बजकर 52 मिनट से हुआ है, जबकि इसका समापन 13 मई 2026 को दोपहर 1 बजकर 29 मिनट पर होगा। उदया तिथि के अनुसार व्रत 13 मई को रखा जाएगा। वहीं व्रत का पारण 14 मई को सुबह 5 बजकर 31 मिनट से 8 बजकर 14 मिनट के बीच किया जाएगा। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस दौरान विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा करने और व्रत रखने से जीवन में सुख-समृद्धि तथा आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।

धार्मिक ग्रंथों में अपरा एकादशी का विशेष महत्व बताया गया है। मान्यता है कि इस दिन किए गए व्रत, दान और पूजा का फल कई यज्ञों और तीर्थों के बराबर प्राप्त होता है। विशेष रूप से पितरों की शांति और प्रेत योनि से मुक्ति के लिए यह व्रत अत्यंत फलदायी माना जाता है। इसी कारण इस दिन राजा महीध्वज की कथा सुनने और सुनाने की परंपरा भी प्रचलित है।

पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन काल में राजा महीध्वज अत्यंत धर्मात्मा और न्यायप्रिय शासक थे। उनके छोटे भाई वज्रध्वज को उनसे गहरी ईर्ष्या थी। एक दिन उसने षड्यंत्र रचकर राजा की हत्या कर दी और उनके शव को जंगल में पीपल के वृक्ष के नीचे दबा दिया। मृत्यु के बाद राजा महीध्वज की आत्मा प्रेत योनि में भटकने लगी और राहगीरों को कष्ट देने लगी। कुछ समय बाद वहां से गुजर रहे ऋषि Dhaumya Rishi ने अपने तपोबल से राजा की पीड़ा को जाना। ऋषि ने अपरा एकादशी का व्रत कर उसका समस्त पुण्य राजा महीध्वज को अर्पित कर दिया। भगवान विष्णु की कृपा से राजा को प्रेत योनि से मुक्ति मिली और उन्हें दिव्य शरीर प्राप्त हुआ। इसके बाद वे स्वर्ग लोक को प्रस्थान कर गए। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस कथा को सुनने से पितरों का उद्धार होता है और व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है।

उत्तर भारत के कई राज्यों विशेषकर पंजाब, हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में इस एकादशी को भद्रकाली एकादशी के रूप में भी मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन देवी Bhadrakali प्रकट हुई थीं। इसलिए इस दिन भगवान विष्णु के साथ मां भद्रकाली की पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। श्रद्धालु मानते हैं कि मां भद्रकाली की उपासना से भय, शत्रु और संकटों से रक्षा होती है। वहीं ओडिशा में यह पर्व जलक्रीड़ा एकादशी के रूप में मनाया जाता है, जहां भगवान Jagannath की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।

धर्माचार्यों के अनुसार अपरा एकादशी का व्रत करने वालों को सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र स्थापित कर उन्हें पीले पुष्प, तुलसी दल, पंचामृत और फल अर्पित किए जाते हैं। पूजा के दौरान “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करना अत्यंत शुभ माना गया है। साथ ही विष्णु सहस्त्रनाम और श्रीमद्भगवद्गीता का पाठ भी विशेष फलदायी बताया गया है। श्रद्धालु दिनभर फलाहार या निर्जल व्रत रखकर शाम को भगवान विष्णु की आरती करते हैं और गरीबों व जरूरतमंदों को दान देते हैं।

ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि यह व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं बल्कि आत्मशुद्धि और संयम का भी प्रतीक है। अपरा एकादशी व्यक्ति को बुरे कर्मों से दूर रहने और आध्यात्मिक मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है। मान्यता है कि इस दिन श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत रखने से जीवन के कष्ट दूर होते हैं, आर्थिक परेशानियों से राहत मिलती है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-