कर्नाटक में हिजाब पर बड़ा फैसला, यूनिफॉर्म के साथ धार्मिक प्रतीकों को मिली फिर अनुमति

कर्नाटक में हिजाब पर बड़ा फैसला, यूनिफॉर्म के साथ धार्मिक प्रतीकों को मिली फिर अनुमति

प्रेषित समय :20:27:43 PM / Wed, May 13th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

बेंगलुरु. कर्नाटक सरकार ने बुधवार को वर्ष 2022 में जारी उस विवादित आदेश को तत्काल प्रभाव से वापस ले लिया जिसके आधार पर स्कूलों और कॉलेजों में यूनिफॉर्म के साथ हिजाब पहनने पर रोक लागू की गई थी. राज्य सरकार के इस फैसले के बाद अब छात्र-छात्राएं निर्धारित यूनिफॉर्म के साथ सीमित धार्मिक और पारंपरिक प्रतीकों को पहन सकेंगे. सरकार ने स्पष्ट किया है कि हिजाब, पगड़ी, जनेऊ, रुद्राक्ष और अन्य धार्मिक प्रतीकों को यूनिफॉर्म के साथ पहनने की अनुमति होगी, बशर्ते वे अनुशासन, सुरक्षा और पहचान प्रक्रिया में बाधा न बनें. इस फैसले के बाद एक बार फिर कर्नाटक की राजनीति और शिक्षा व्यवस्था में हिजाब विवाद चर्चा के केंद्र में आ गया है.

राज्य के स्कूल शिक्षा एवं साक्षरता विभाग द्वारा जारी नए आदेश में कहा गया है कि 5 फरवरी 2022 को जारी सरकारी आदेश को तत्काल प्रभाव से निरस्त किया जाता है. सरकार ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि किसी भी छात्र को धार्मिक या पारंपरिक प्रतीक पहनने या उन्हें हटाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता. सरकार ने कहा कि शैक्षणिक संस्थान ऐसे स्थान हैं जहां वैज्ञानिक दृष्टिकोण, तार्किकता, समानता, गरिमा, बंधुत्व, अनुशासन, आपसी सम्मान और सामाजिक सौहार्द जैसे संवैधानिक मूल्यों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए.

सरकार ने अपने आदेश में यह भी कहा कि संवैधानिक अर्थों में धर्मनिरपेक्षता का मतलब व्यक्तिगत आस्थाओं का विरोध नहीं बल्कि सभी धर्मों के प्रति समान सम्मान, संस्थागत निष्पक्षता और भेदभाव रहित व्यवहार सुनिश्चित करना है. इसी आधार पर राज्य सरकार ने यह निर्णय लिया कि सीमित धार्मिक और पारंपरिक प्रतीकों को यूनिफॉर्म के साथ पहनने की अनुमति दी जानी चाहिए.

यह फैसला उस लंबे विवाद के बाद आया है जिसने वर्ष 2022 में पूरे देश का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था. हिजाब विवाद की शुरुआत जनवरी 2022 में उडुपी के एक सरकारी प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेज से हुई थी जहां कुछ मुस्लिम छात्राओं ने आरोप लगाया था कि उन्हें हिजाब पहनकर कक्षा में प्रवेश करने से रोका गया. इसके बाद राज्य के कई जिलों में इसी तरह के विवाद सामने आने लगे. देखते ही देखते यह मामला राज्यव्यापी आंदोलन में बदल गया. कुछ छात्र हिजाब के समर्थन में सामने आए तो दूसरी ओर कुछ समूहों ने भगवा गमछा पहनकर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया. कई शैक्षणिक संस्थानों में तनाव की स्थिति बन गई और कुछ जगहों पर कक्षाएं तक अस्थायी रूप से बंद करनी पड़ी थीं.

विवाद बढ़ने के बाद तत्कालीन भारतीय जनता पार्टी सरकार ने 5 फरवरी 2022 को एक आदेश जारी किया था जिसमें कहा गया था कि जहां यूनिफॉर्म निर्धारित है वहां छात्रों को उसी का पालन करना होगा. जिन संस्थानों में यूनिफॉर्म तय नहीं है वहां छात्रों को ऐसे कपड़े पहनने होंगे जो समानता, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था की भावना के अनुरूप हों. इसी आदेश के आधार पर कई कॉलेजों और स्कूलों में हिजाब पहनने पर रोक लगा दी गई थी.

मामला बाद में कानूनी लड़ाई में बदल गया. मुस्लिम छात्राओं ने कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका दायर करते हुए कहा था कि हिजाब पहनना उनके धार्मिक अधिकार और निजता की स्वतंत्रता का हिस्सा है. हालांकि मार्च 2022 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के फैसले को सही ठहराया था. अदालत ने अपने फैसले में कहा था कि हिजाब इस्लाम की अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है और शैक्षणिक संस्थानों को ड्रेस कोड लागू करने का अधिकार है.

इसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जहां अक्टूबर 2022 में दो जजों की बेंच ने विभाजित फैसला सुनाया. एक न्यायाधीश ने राज्य सरकार के फैसले को सही माना जबकि दूसरे न्यायाधीश ने छात्राओं के पक्ष में फैसला दिया. इसके बाद मामला बड़ी बेंच को भेज दिया गया जहां यह अभी भी लंबित है.

वर्ष 2022 में विपक्ष में रही कांग्रेस पार्टी ने उस समय हिजाब प्रतिबंध का विरोध किया था और सत्ता में आने पर इस मुद्दे पर पुनर्विचार का वादा किया था. अब सरकार ने अपने नए आदेश में कहा है कि उसे विभिन्न धर्मों और परंपराओं से जुड़े छात्रों द्वारा पहने जाने वाले प्रतीकों को लेकर लगातार प्रतिनिधित्व और शिकायतें मिल रही थीं. सरकार ने कहा कि दोबारा समीक्षा करने के बाद यह महसूस किया गया कि शैक्षणिक संस्थानों में अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखते हुए भी सीमित धार्मिक और पारंपरिक प्रतीकों की अनुमति दी जा सकती है.

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य के सभी सरकारी स्कूलों, सहायता प्राप्त शिक्षण संस्थानों, निजी शिक्षण संस्थानों और प्री-यूनिवर्सिटी कॉलेजों में यूनिफॉर्म अनिवार्य रूप से लागू रहेगी. यानी यूनिफॉर्म की व्यवस्था समाप्त नहीं की गई है बल्कि उसके साथ सीमित धार्मिक प्रतीकों को अनुमति दी गई है. आदेश में साफ कहा गया है कि धार्मिक और पारंपरिक प्रतीक यूनिफॉर्म के मूल स्वरूप को नहीं बदल सकते और न ही उसके उद्देश्य को प्रभावित कर सकते हैं.

सरकार ने जिन प्रतीकों को अनुमति दी है उनमें पगड़ी, जनेऊ, शिवधारा, रुद्राक्ष और हिजाब विशेष रूप से शामिल हैं. साथ ही यह भी निर्देश दिया गया है कि किसी भी छात्र को केवल इन प्रतीकों को पहनने के कारण स्कूल, कॉलेज, कक्षा, परीक्षा कक्ष या अन्य शैक्षणिक गतिविधियों में प्रवेश से नहीं रोका जाएगा. सरकार ने कहा कि यदि कोई संस्थान या प्रबंधन इस नए आदेश के खिलाफ कोई अलग निर्देश जारी करता है तो उसे अमान्य माना जाएगा.

राज्य सरकार के इस फैसले के बाद राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आने लगी हैं. कांग्रेस नेताओं ने इसे संविधान और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की जीत बताया है. उनका कहना है कि शिक्षा संस्थानों में छात्रों को समान अवसर मिलना चाहिए और किसी भी छात्र को उसके पहनावे या धार्मिक पहचान के आधार पर अलग नहीं किया जाना चाहिए. वहीं भारतीय जनता पार्टी ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इससे शैक्षणिक संस्थानों में फिर से विवाद की स्थिति पैदा हो सकती है और सरकार वोट बैंक की राजनीति कर रही है.

इधर मुस्लिम संगठनों और छात्र संगठनों ने सरकार के फैसले का स्वागत किया है. कई छात्राओं ने कहा कि यह फैसला उनके आत्मसम्मान और शिक्षा के अधिकार से जुड़ा हुआ था. उनका कहना है कि अब वे बिना किसी डर और भेदभाव के अपनी पढ़ाई जारी रख सकेंगी. वहीं कुछ संगठनों ने सरकार से यह भी मांग की है कि भविष्य में ऐसी परिस्थितियां दोबारा न बनें इसके लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश तैयार किए जाएं.

कर्नाटक सरकार के इस फैसले ने एक बार फिर देशभर में धर्म, शिक्षा और संवैधानिक अधिकारों को लेकर बहस तेज कर दी है. आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और कानूनी हलकों में और अधिक चर्चा होने की संभावना है, खासकर तब जब मामला अभी भी सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच में लंबित है. फिलहाल राज्य सरकार के इस फैसले को हिजाब विवाद में एक बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-