मोजाम्बिक में जन्मी राजकोट की बेटी भारत में ही बन गई विदेशी, शादी के बाद पासपोर्ट ने खड़ी कर दी जिंदगी की सबसे बड़ी दीवार

मोजाम्बिक में जन्मी राजकोट की बेटी भारत में ही बन गई विदेशी, शादी के बाद पासपोर्ट ने खड़ी कर दी जिंदगी की सबसे बड़ी दीवार

प्रेषित समय :21:36:51 PM / Thu, May 14th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

अहमदाबाद. गुजरात के राजकोट की रहने वाली 26 वर्षीय एक युवती इन दिनों ऐसी कानूनी उलझन में फंस गई है, जिसने उसकी पूरी जिंदगी को ठहरा दिया है. भारत में पली-बढ़ी, भारतीय स्कूलों में पढ़ाई करने वाली, वोट डालने का अधिकार रखने वाली और आयकर चुकाने वाली यह युवती आज खुद अपने ही देश में नागरिकता साबित करने के संघर्ष से गुजर रही है. हालात ऐसे बन गए हैं कि शादी के बाद भी वह अपने पति के पास कनाडा नहीं जा पा रही, क्योंकि उसके पास भारतीय पासपोर्ट नहीं है. वजह केवल एक पुरानी कानूनी चूक है, जो उसके माता-पिता से 26 साल पहले हुई थी.

यह युवती मूल रूप से राजकोट की रहने वाली है, लेकिन उसका जन्म वर्ष 2000 में अफ्रीकी देश मोजाम्बिक में हुआ था. उस समय उसके माता-पिता वहां कामकाज के सिलसिले में रह रहे थे. जन्म के कुछ ही दिनों बाद मोजाम्बिक में भीषण बाढ़ आ गई थी. हालात इतने खराब हो गए कि वहां रहना मुश्किल हो गया. परिवार किसी तरह मोजाम्बिक सरकार द्वारा जारी ‘इमरजेंसी सर्टिफिकेट’ के आधार पर भारत लौट आया. उस समय यह बच्ची महज 18 दिन की थी. इसके बाद वह कभी मोजाम्बिक नहीं गई और पूरी जिंदगी भारत में ही बीती.

समय के साथ उसने भारत में पढ़ाई की, यहीं उसका पालन-पोषण हुआ और सामान्य भारतीय नागरिक की तरह उसकी पहचान बनती चली गई. उसके पास आधार कार्ड, पैन कार्ड, वोटर आईडी, ड्राइविंग लाइसेंस जैसे तमाम भारतीय दस्तावेज मौजूद हैं. वह नियमित रूप से आयकर भी जमा करती है. परिवार और समाज के बीच भी उसे कभी यह एहसास नहीं हुआ कि उसकी नागरिकता भविष्य में उसके सामने इतनी बड़ी परेशानी बन सकती है.

असल संकट तब शुरू हुआ जब वर्ष 2023 में उसकी शादी कनाडा के कैलगरी में रहने वाले एक एनआरआई युवक से हुई. शादी के बाद पति के साथ कनाडा जाने के लिए उसने भारतीय पासपोर्ट के लिए आवेदन किया. यहीं से उसकी जिंदगी अचानक कानूनी दांवपेंच में उलझ गई. पासपोर्ट कार्यालय ने उसका आवेदन खारिज कर दिया. अधिकारियों का कहना था कि चूंकि उसका जन्म भारत के बाहर हुआ था, इसलिए नागरिकता अधिनियम की धारा-4 के तहत उसके जन्म का एक वर्ष के भीतर मोजाम्बिक स्थित भारतीय दूतावास में पंजीकरण कराया जाना जरूरी था. लेकिन उसके माता-पिता ने उस समय यह प्रक्रिया पूरी नहीं कराई.

पासपोर्ट कार्यालय के इस फैसले के बाद युवती ने मोजाम्बिक हाई कमीशन और वहां स्थित भारतीय दूतावास से संपर्क किया. मोजाम्बिक प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया कि वह उनकी नागरिक नहीं है. भारतीय दूतावास ने उसके जन्म प्रमाण पत्र का सत्यापन भी कर दिया, लेकिन इसके बावजूद पासपोर्ट जारी नहीं किया गया. अब उससे गृह मंत्रालय द्वारा जारी भारतीय नागरिकता पंजीकरण प्रमाण पत्र या प्राकृतिकरण प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने को कहा गया.

इसके बाद युवती राजकोट कलेक्टर कार्यालय पहुंची और नागरिकता प्रमाणपत्र के लिए आवेदन करने की कोशिश की. लेकिन यहां भी उसके सामने एक नई कानूनी समस्या खड़ी हो गई. अधिकारियों ने उससे उसका विदेशी पासपोर्ट जमा करने को कहा. नियमों के अनुसार किसी विदेशी नागरिक को भारतीय नागरिकता देने से पहले उसके मूल देश का पासपोर्ट देखा जाता है. लेकिन युवती के पास कोई विदेशी पासपोर्ट था ही नहीं. वह तो महज 18 दिन की उम्र में इमरजेंसी सर्टिफिकेट पर भारत आ गई थी और फिर कभी मोजाम्बिक नहीं गई.

कानूनी दफ्तरों और सरकारी प्रक्रियाओं के इस जाल में फंसकर आखिरकार युवती ने गुजरात हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. उसने अदालत से मांग की कि उसे भारतीय नागरिक मानते हुए पासपोर्ट जारी करने के निर्देश दिए जाएं. हालांकि, हाई कोर्ट ने इस मामले में सख्त रुख अपनाया. अदालत ने कहा कि नागरिकता अधिनियम की धारा-3 और धारा-4 के तहत तय कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किए बिना केवल भारत में रहने के आधार पर किसी व्यक्ति को भारतीय नागरिक नहीं माना जा सकता.

कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि उस समय युवती के माता-पिता द्वारा आवश्यक कानूनी प्रक्रिया पूरी नहीं की गई, जिसका खामियाजा अब उनकी बेटी भुगत रही है. अदालत ने साफ कहा कि कानून अपनी प्रक्रिया के अनुसार ही चलेगा और भावनात्मक आधार पर नियमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता.

हालांकि, अदालत ने युवती को कुछ राहत भी दी. याचिकाकर्ता के वकील एस.पी. मजूमदार के अनुसार गुजरात हाई कोर्ट ने सीधे पासपोर्ट जारी करने का आदेश तो नहीं दिया, लेकिन उसे दोबारा पासपोर्ट कार्यालय में आवेदन करने की अनुमति दे दी है. साथ ही पासपोर्ट प्राधिकरण को निर्देश दिया गया है कि वह कानून के तहत सभी पहलुओं पर विचार कर उचित निर्णय ले.

यह मामला अब केवल एक युवती की परेशानी भर नहीं रह गया है, बल्कि यह उन हजारों भारतीय परिवारों के लिए भी चेतावनी बन गया है, जो विदेशों में रहते हैं और बच्चों के जन्म के बाद जरूरी कानूनी प्रक्रियाओं को गंभीरता से नहीं लेते. एक छोटी सी प्रशासनिक चूक ने आज एक भारतीय परिवार की बेटी को अपने ही देश में पहचान के संकट में खड़ा कर दिया है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-