केतु दोष से मुक्ति के लिए शिव और गणपति उपासना को माना गया सबसे प्रभावशाली उपाय

केतु दोष से मुक्ति के लिए शिव और गणपति उपासना को माना गया सबसे प्रभावशाली उपाय

प्रेषित समय :21:25:47 PM / Sat, May 16th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

वैदिक ज्योतिष में केतु को रहस्यमयी, आध्यात्मिक और मोक्ष प्रदान करने वाला ग्रह माना गया है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार केतु व्यक्ति को वैराग्य, आत्मिक जागरण, गूढ़ ज्ञान और ईश्वर की ओर ले जाने का कार्य करता है। हालांकि जब कुंडली में केतु अशुभ स्थिति में होता है, तब यह मानसिक अस्थिरता, भ्रम, अचानक हानि, अवसाद, भय और जीवन में बाधाओं का कारण भी बन सकता है। ऐसे में शास्त्रों में केतु को शांत करने के लिए भगवान शिव और श्रीगणेश की उपासना को सबसे प्रभावशाली और दुर्लभ वैदिक उपाय बताया गया है।

शास्त्रों में केतु का ध्यान करते हुए यह मंत्र बताया गया है —

“पलाशपुष्पसंकाशं तारकाग्रहमस्तकम्।
रौद्रं रौद्रात्मकं घोरं तं केतुं प्रणमाम्यहम्॥”

अर्थात पलाश पुष्प के समान लाल आभा वाले, ताराग्रहों के अधिपति और रौद्र स्वरूप केतु को मैं प्रणाम करता हूँ।

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार जिन लोगों का जन्म केतु के नक्षत्र अश्विनी, मघा और मूल में हुआ हो, उनके लिए मूल शांति कराना अत्यंत आवश्यक माना गया है। मान्यता है कि यदि समय पर यह शांति न कराई जाए तो व्यक्ति को जीवन में लगातार संघर्ष और मानसिक परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है।

ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि केतु की शांति के लिए प्रत्येक रविवार दोपहर 11:40 से 12:30 बजे के बीच शिवलिंग पर नारियल का जल अर्पित करना अत्यंत शुभ माना गया है। इस दौरान “ॐ शेषनागाय नमः शिवाय” मंत्र का उच्चारण करने से केतु के अशुभ प्रभाव कम होते हैं और सकारात्मक परिणाम मिलने लगते हैं। यह उपाय विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी माना जाता है जिनकी कुंडली में केतु कमजोर या पीड़ित स्थिति में हो।

इसके अलावा पूर्णिमा या अमावस्या के दिन किसी गणेश, दुर्गा, काली या शिव मंदिर के शिखर पर ध्वजा चढ़ाने का भी विशेष महत्व बताया गया है। ज्योतिष मान्यता के अनुसार यह उपाय जीवन में शांति, समृद्धि और मानसिक संतुलन लाने में सहायक माना जाता है।

केतु की महादशा को भी अत्यंत प्रभावशाली माना जाता है, जिसकी अवधि सात वर्ष की होती है। शास्त्रों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति पर केतु की महादशा चल रही हो तो उसे स्नान के बाद माथे पर चंदन या भस्म का त्रिपुंड अवश्य लगाना चाहिए। मान्यता है कि इससे नकारात्मक विचार, भय और मानसिक तनाव कम होते हैं तथा मन शांत रहता है।

ज्योतिष में यह भी कहा गया है कि केतु पूर्ण रूप से अशुभ ग्रह नहीं होता। यदि कुंडली में केतु शुभ स्थिति में हो तो व्यक्ति को अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति, तंत्र-मंत्र सिद्धि, गहरी अंतर्दृष्टि और ईश्वर अनुभूति प्राप्त हो सकती है। वहीं राहु जहां भौतिक सुख, राजनीति, पद और सांसारिक इच्छाओं का कारक माना जाता है, वहीं केतु व्यक्ति को आध्यात्मिकता और मोक्ष की ओर ले जाने वाला ग्रह माना गया है।

ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार केतु की कृपा पाने के लिए अहंकार त्यागना और भगवान शिव के चरणों में समर्पण सबसे बड़ा उपाय माना गया है। दक्षिण भारत के प्रसिद्ध स्वयंभू श्रीगणेश मंदिरों, विशेषकर कानीपाकम गणपति मंदिर के दर्शन को भी केतु दोष शांति के लिए अत्यंत लाभकारी बताया गया है।

रात्रि के समय दीपक जलाकर केतु देव से यह प्रार्थना करने की भी सलाह दी जाती है-

“हे केतु देव, यदि आप मेरे कर्मों का दर्पण बनकर आए हैं, तो मुझे दंड नहीं दिशा दीजिए। भ्रम नहीं, ब्रह्म का बोध दीजिए।”

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार यही केतु का वास्तविक उपाय है — अहंकार का विसर्जन और शिवचरणों में पूर्ण समर्पण।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-