फिर बजा गारमेंट हब का जुमला वर्षों से वादों में उलझा जबलपुर आखिर कब जमीन पर उतरेगा एक्सपोर्ट का सपना

फिर बजा गारमेंट हब का जुमला वर्षों से वादों में उलझा जबलपुर आखिर कब जमीन पर उतरेगा एक्सपोर्ट का सपना

प्रेषित समय :17:39:04 PM / Sun, May 17th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. जबलपुर को देश का बड़ा गारमेंट एक्सपोर्ट हब बनाने का सपना एक बार फिर सरकारी बैठकों और घोषणाओं के मंच से बाहर निकाला गया है. भारत सरकार के वस्त्र मंत्रालय ने निर्यात संभावनाओं वाले देश के 100 जिलों में जबलपुर को शामिल किया है. जिला प्रशासन और उद्योग विभाग इसे बड़ी उपलब्धि बताकर नए गारमेंट क्लस्टर, कॉमन फैसिलिटी सेंटर, प्रशिक्षण केंद्र और निर्यात बढ़ाने की योजनाओं की बात कर रहे हैं, लेकिन शहर के उद्योग जगत और कारोबारियों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही गूंज रहा है कि आखिर यह सपना कब जमीन पर उतरेगा. क्योंकि “जबलपुर गारमेंट हब बनेगा” जैसी घोषणाएं पिछले कई वर्षों से बार-बार सुनाई जा रही हैं, लेकिन हकीकत अब भी अधूरी योजनाओं, फाइलों और बैठकों से आगे नहीं बढ़ सकी है.

शहर में गारमेंट कारोबार लंबे समय से मौजूद है. खासतौर पर सलवार सूट निर्माण में जबलपुर का नाम दक्षिण भारत समेत कई राज्यों में जाना जाता है. गोहलपुर गारमेंट क्लस्टर में करीब 200 इकाइयां संचालित हैं और पूरे जिले में लगभग 600 छोटी-बड़ी इकाइयां काम कर रही हैं. दावा किया जा रहा है कि सालाना 400 से 500 करोड़ रुपये का कारोबार हो रहा है और प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से 20 हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिला है. हथकरघा और हस्तशिल्प उत्पादों को जोड़ दिया जाए तो निर्यात का आंकड़ा 600 से 700 करोड़ रुपये तक पहुंचने की बात कही जा रही है. लेकिन सवाल यह है कि यदि जबलपुर में इतनी क्षमता पहले से मौजूद है तो फिर अब तक इसे राष्ट्रीय स्तर का गारमेंट एक्सपोर्ट हब क्यों नहीं बनाया जा सका.

स्थानीय कारोबारी खुलकर कहते हैं कि हर कुछ वर्षों में कोई न कोई नई योजना, नई समिति और नया एक्शन प्लान सामने आता है. कभी टेक्सटाइल पार्क की बात होती है, कभी मेगा क्लस्टर की, कभी निर्यात नीति की और अब “देश के 100 जिलों” की सूची में शामिल होने का नया जुमला सामने आया है. लेकिन शहर के उद्योगों को आज भी मूलभूत सुविधाओं के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है. कई औद्योगिक क्षेत्रों में सड़कें खराब हैं, बिजली की समस्या बनी रहती है, आधुनिक मशीनरी के लिए पर्याप्त सहायता नहीं है और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए जरूरी लॉजिस्टिक नेटवर्क भी कमजोर है.

गोहलपुर और आसपास संचालित गारमेंट इकाइयों के संचालकों का कहना है कि सरकार केवल बैठकों और प्रस्तुतियों में जबलपुर को “भविष्य का एक्सपोर्ट हब” बताती है, लेकिन जमीनी स्तर पर उद्योगों की समस्याएं सुनने वाला कोई नहीं है. कई छोटे उद्योगपति बैंक ऋण, जीएसटी प्रक्रियाओं और बढ़ती लागत के दबाव में काम कर रहे हैं. युवाओं को रोजगार देने वाले इन उद्योगों को न तो पर्याप्त तकनीकी प्रशिक्षण मिल पा रहा है और न ही निर्यात स्तर की ब्रांडिंग सहायता.

सबसे बड़ा सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या जबलपुर को वास्तव में विकसित करने की गंभीर इच्छा है या फिर यह केवल राजनीतिक और प्रशासनिक बयानबाजी का हिस्सा बनकर रह गया है. हर चुनाव से पहले या बड़े सरकारी आयोजनों के दौरान “गारमेंट हब”, “इंडस्ट्रियल कॉरिडोर”, “आईटी पार्क” और “निर्यात केंद्र” जैसे शब्द अचानक सुर्खियों में आ जाते हैं. स्थानीय नेता और अधिकारी बड़े-बड़े दावे करते हैं, लेकिन कुछ समय बाद पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है. अब लोगों के बीच यह धारणा मजबूत होती जा रही है कि विकास की घोषणाएं यहां अक्सर “झुनझुना राजनीति” बनकर रह जाती हैं.

कलेक्टर कार्यालय में हाल ही में जिला स्तरीय लघु उद्योग संवर्धन बोर्ड की बैठक आयोजित की गई, जिसमें नए औद्योगिक क्लस्टर, औद्योगिक भूमि आवंटन, निवेश संभावनाओं और जिला निर्यात कार्य योजना पर चर्चा हुई. बैठक में अधिकारियों और उद्योग प्रतिनिधियों ने सुझाव भी दिए. लेकिन उद्योग जगत के लोगों का कहना है कि ऐसी बैठकें पहले भी कई बार हो चुकी हैं. सवाल यह है कि पिछले वर्षों में बनी योजनाओं का क्या हुआ. कितने प्रस्तावों पर अमल हुआ. कितनी इकाइयों को वास्तविक लाभ मिला. और कितने युवाओं को स्थायी रोजगार प्राप्त हुआ.

एमपीआईडीसी को नोडल एजेंसी बनाकर जबलपुर और छिंदवाड़ा में निर्यात को बढ़ावा देने की बात कही जा रही है. कॉमन फैसिलिटी सेंटर, प्रदर्शनी केंद्र और प्रशिक्षण संस्थान विकसित करने की योजना है. लेकिन स्थानीय उद्योगपतियों का कहना है कि जब तक उद्योगों को जमीन, बिजली, परिवहन और निर्यात प्रक्रियाओं में वास्तविक राहत नहीं मिलेगी, तब तक केवल घोषणाओं से कुछ नहीं बदलेगा. उनका कहना है कि शहर के कई पुराने औद्योगिक क्षेत्र खुद बुनियादी सुविधाओं के अभाव में जूझ रहे हैं.

शहर के आर्थिक जानकारों का मानना है कि जबलपुर में गारमेंट सेक्टर के विस्तार की क्षमता जरूर है, लेकिन इसके लिए गंभीर नीति, पारदर्शी निवेश और दीर्घकालिक योजना की जरूरत है. सिर्फ बैठकों में आंकड़े गिनाने और “बड़ा हब बनेगा” कह देने से उद्योग नहीं बढ़ते. शहर को आधुनिक टेक्सटाइल मशीनरी, स्किल डेवलपमेंट सेंटर, अंतरराष्ट्रीय मार्केटिंग नेटवर्क और निर्यात सहायता प्रणाली की आवश्यकता है.

युवा उद्यमियों का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में जबलपुर को गारमेंट एक्सपोर्ट हब बनाना चाहती है तो सबसे पहले यहां की स्थानीय इकाइयों को मजबूत करना होगा. उन्हें आसान ऋण, टैक्स राहत, तकनीकी सहायता और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय बाजार से जोड़ने की रणनीति बनानी होगी. लेकिन फिलहाल स्थिति यह है कि उद्योगपति खुद अपने स्तर पर संघर्ष कर रहे हैं और सरकारी योजनाएं केवल दस्तावेजों में ज्यादा दिखाई देती हैं.

राजनीतिक गलियारों में भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज है. विपक्षी दल सवाल उठा रहे हैं कि जबलपुर को वर्षों से औद्योगिक विकास के नाम पर सिर्फ आश्वासन क्यों दिए जा रहे हैं. शहर के लोग पूछ रहे हैं कि आखिर हर बार “अबकी बार बड़ा विकास” का दावा करने वाले नेता और अधिकारी पिछले वादों का हिसाब क्यों नहीं देते. यदि जबलपुर वास्तव में इतना बड़ा गारमेंट केंद्र था और है, तो फिर उसे राष्ट्रीय पहचान दिलाने में इतना लंबा समय क्यों लग गया.

जबलपुर के लोगों को अब घोषणाओं से ज्यादा जमीन पर परिणाम चाहिए. शहर के युवा रोजगार चाहते हैं, उद्योगपति स्थिर नीति चाहते हैं और कारोबारी ठोस सुविधाएं चाहते हैं. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या इस बार “गारमेंट एक्सपोर्ट हब” का सपना फाइलों और बैठकों से बाहर निकल पाएगा, या फिर यह भी आने वाले वर्षों में एक और अधूरी सरकारी घोषणा बनकर रह जाएगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-