सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, अब हर लापता व्यक्ति और बच्चे के मामले में दर्ज होगी अपहरण की एफआईआर

सुप्रीम कोर्ट का बड़ा आदेश, अब हर लापता व्यक्ति और बच्चे के मामले में दर्ज होगी अपहरण की एफआईआर

प्रेषित समय :20:11:36 PM / Fri, May 22nd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. देशभर में बढ़ते मानव तस्करी और लापता बच्चों के मामलों पर गंभीर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा और सख्त आदेश जारी किया है. शीर्ष अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि अब देश के हर पुलिस थाने में किसी भी लापता बच्चे या व्यक्ति के मामले में अनिवार्य रूप से अपहरण की एफआईआर दर्ज की जाएगी. कोर्ट ने कहा कि पुलिस किसी भी हाल में प्रारंभिक जांच के नाम पर मामला दर्ज करने में देरी नहीं कर सकती और न ही परिवार वालों को खुद तलाश करने के लिए छोड़ सकती है.

सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम निर्देश उस समय दिया जब अदालत के सामने देशभर में वर्षों से लापता करीब 47 हजार बच्चों का चौंकाने वाला आंकड़ा रखा गया. अदालत ने इस स्थिति को बेहद गंभीर बताते हुए कहा कि समाज और प्रशासन इस समस्या की भयावहता को समझ ही नहीं रहा है. कोर्ट ने कहा कि लोगों को इस कठोर सच्चाई से झकझोरने की जरूरत है.

जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ तमिलनाडु के एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी जिसमें एक बच्चा वर्ष 2011 से लापता है. सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि किसी भी लापता व्यक्ति या बच्चे के मामले में संबंधित पुलिस थाने को तुरंत एफआईआर दर्ज करनी होगी और उसमें भारतीय न्याय संहिता की अपहरण से संबंधित धाराएं अनिवार्य रूप से शामिल करनी होंगी.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पुलिस अब किसी भी मामले को सामान्य गुमशुदगी मानकर हल्के में नहीं ले सकती. अदालत ने कहा कि यदि किसी मामले में मानव तस्करी की आशंका दिखाई देती है तो उसे तुरंत एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट को सौंपा जाए. कोर्ट ने इस दिशा में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की पुलिस को सक्रिय भूमिका निभाने के निर्देश दिए हैं.

यह निर्देश उस समिति की सिफारिशों के बाद जारी किए गए हैं जिसे सुप्रीम कोर्ट ने पूरे देश के लिए एक समान मानक संचालन प्रक्रिया यानी एसओपी तैयार करने के लिए गठित किया था. इस समिति की अध्यक्षता दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व न्यायाधीश जस्टिस मुक्ता गुप्ता कर रही थीं. समिति में पूर्व आईपीएस अधिकारी पी.एम. नायर और गृह मंत्रालय के अधिकारी वीरेंद्र कुमार मिश्रा भी शामिल थे.

सुनवाई के दौरान पूर्व आईपीएस अधिकारी पी.एम. नायर ने अदालत को कई चौंकाने वाले उदाहरण बताए. उन्होंने एक ऐसे बच्चे का मामला रखा जिसे केरल के बाल संरक्षण गृह में बरामद किया गया था, जबकि वह तीन साल पहले बिहार से लापता हुआ था. इस उदाहरण के जरिए समिति ने बताया कि राज्यों के बीच समन्वय की कमी के कारण कई बच्चे वर्षों तक अपने परिवारों से दूर रह जाते हैं.

समिति ने सुझाव दिया कि बरामद या बचाए गए बच्चों का आधार सत्यापन अनिवार्य किया जाए. अदालत ने इस सुझाव को स्वीकार करते हुए आदेश दिया कि जैसे ही कोई बच्चा या व्यक्ति बरामद होता है, उसका आधार सत्यापन या आधार कार्ड बनवाने की प्रक्रिया तुरंत शुरू की जाए. कोर्ट ने कहा कि बायोमेट्रिक जानकारी के जरिए ऐसे बच्चों की पहचान तेजी से हो सकेगी और उन्हें जल्द परिवार से मिलाया जा सकेगा.

सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय को यह भी निर्देश दिया कि पूरे देश के पुलिस थानों को जोड़ने वाला एक राष्ट्रीय डाटा ग्रिड तैयार किया जाए. यह पोर्टल मानव तस्करी, लापता बच्चों और महिलाओं से जुड़े मामलों की निगरानी करेगा. अदालत ने कहा कि इस व्यवस्था से राज्यों के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान आसान होगा और जांच में तेजी आएगी.

अदालत ने सभी राज्यों के पुलिस महानिदेशकों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस प्रमुखों को निर्देश दिया कि एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट्स को पूरी तरह सक्रिय किया जाए और उन्हें प्रभावी कार्रवाई के लिए पर्याप्त अधिकार दिए जाएं. कोर्ट ने यह भी कहा कि केवल बच्चे को बरामद करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे सुरक्षित तरीके से उसके परिवार तक पहुंचाना भी पुलिस और प्रशासन की जिम्मेदारी है.

सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार देश में अब भी 47 हजार बच्चे ऐसे हैं जिनका कोई पता नहीं चल पाया है. अदालत ने इस पर गहरी चिंता जताते हुए कहा कि पुलिस अक्सर ऐसे मामलों में मानव तस्करी के एंगल की गंभीरता से जांच नहीं करती.

कोर्ट ने कहा कि कई मामलों में पुलिस केवल औपचारिकता पूरी कर अपने कर्तव्य से मुक्त हो जाती है और आगे की जिम्मेदारी बाल संरक्षण संस्थाओं पर छोड़ देती है. अदालत ने ऐसी लापरवाही को अस्वीकार्य बताते हुए कहा कि प्रशासनिक उदासीनता अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी.

इस दौरान अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस.डी. संजय ने अदालत को बताया कि सुप्रीम कोर्ट की अन्य पीठों में भी बाल तस्करी से जुड़े मामलों पर सुनवाई चल रही है. एक मामला एनजीओ गुरिया स्वयंसेवी संस्थान द्वारा दायर किया गया है, जबकि दूसरा मामला उत्तर प्रदेश में एक बच्चे की तस्करी से जुड़ा हुआ है.

वरिष्ठ अधिवक्ता अपर्णा भट्ट ने अदालत को बताया कि बाल तस्करी अब संगठित अंतरराज्यीय गिरोहों के जरिए बड़े स्तर पर संचालित हो रही है. उन्होंने कहा कि यह केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा नहीं बल्कि मानवाधिकार और बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर संकट है.

सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई अगस्त में तय की है. तब तक समिति को और सुझाव देने के लिए समय दिया गया है. फिलहाल अदालत के इस ऐतिहासिक आदेश को बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा के लिए एक बड़ा कदम माना जा रहा है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इन निर्देशों का सख्ती से पालन हुआ तो देश में मानव तस्करी और लापता बच्चों के मामलों की जांच में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-