आमरस का भोग लगते ही ‘बीमार’ पड़ जाते हैं भगवान कोटा के 250 साल पुराने मंदिर की अनोखी परंपरा

आमरस का भोग लगते ही ‘बीमार’ पड़ जाते हैं भगवान कोटा के 250 साल पुराने मंदिर की अनोखी परंपरा

प्रेषित समय :21:22:41 PM / Wed, May 27th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

कोटा. जगदीश मंदिर  में सदियों पुरानी एक अनोखी धार्मिक परंपरा आज भी पूरी श्रद्धा और विधि-विधान के साथ निभाई जाती है। राजस्थान के कोटा शहर के रामपुरा क्षेत्र में स्थित इस लगभग 250 साल पुराने मंदिर में ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर भगवान जगदीश, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा को 14 दिनों का “बीमारी अवकाश” दिया जाता है। मान्यता है कि भीषण गर्मी में ठंडे जल से स्नान और आमरस का भोग लगाने के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं, इसलिए उन्हें विश्राम कराया जाता है।

हर वर्ष की तरह इस बार भी ज्येष्ठ पूर्णिमा पर मंदिर में भगवान का विशेष अभिषेक किया गया। 51 जलकलशों और पंचामृत से स्नान कराने के बाद भगवान को करीब 200 किलो आमरस का भोग अर्पित किया गया। महाआरती के बाद रात 9 बजे मंदिर के पट बंद कर दिए गए। अब अगले 14 दिनों तक भगवान विश्राम अवस्था में रहेंगे और इस दौरान आम श्रद्धालुओं के लिए दर्शन पूरी तरह बंद रहेंगे।

मंदिर प्रशासन इस अवधि में विशेष सावधानियां बरतता है ताकि भगवान के आराम में किसी प्रकार की बाधा न पहुंचे। मंदिर परिसर की घंटियों और झालरों तक को कपड़ों से ढक दिया जाता है, जिससे किसी तरह की आवाज न हो। पूरे मंदिर में शांति और सादगी का वातावरण बनाए रखा जाता है। श्रद्धालु मंदिर परिसर तक पहुंचते हैं, लेकिन गर्भगृह के दर्शन नहीं कर पाते।

मंदिर के पुजारी Jagannath के अनुसार इन 14 दिनों के दौरान भगवान का प्रतिदिन “स्वास्थ्य परीक्षण” भी किया जाता है। नियमित भोग के स्थान पर भगवान को दूध, मेवे और काली मिर्च से तैयार विशेष काढ़ा अर्पित किया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस काढ़े से भगवान शीघ्र स्वस्थ हो जाते हैं। इस दौरान केवल मुख्य पुजारी को ही गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति होती है।

इस अनोखी परंपरा के पीछे गहरी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है। स्थानीय श्रद्धालुओं का मानना है कि भगवान भी अपने भक्तों की तरह ऋतु परिवर्तन और मौसम के प्रभाव को अनुभव करते हैं। इसलिए गर्मी के मौसम में उन्हें विश्राम और विशेष देखभाल दी जाती है। यही वजह है कि यह परंपरा पीढ़ियों से बिना किसी बदलाव के निभाई जा रही है।

मंदिर का इतिहास भी बेहद दिलचस्प माना जाता है। बताया जाता है कि लगभग ढाई सौ वर्ष पहले दक्षिण भारत से आए महाराज Apalachari Swami ने इस मंदिर की स्थापना की थी। उस समय हाड़ौती क्षेत्र के लोगों के लिए ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर तक पहुंचना आसान नहीं था। इसी कारण कोटा में भगवान जगदीश का यह मंदिर स्थापित किया गया ताकि स्थानीय श्रद्धालु भी भगवान जगन्नाथ की पूजा और दर्शन कर सकें।

मंदिर में भगवान जगदीश यानी भगवान कृष्ण, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा की प्रतिमाएं विराजमान हैं। वर्तमान में मंदिर की सेवा अपलाचारी स्वामी के परिवार की छठी पीढ़ी द्वारा की जा रही है। मंदिर की व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी एस.के. श्रीनिवास संभाल रहे हैं। पूजा-पाठ, भोग, भजन-कीर्तन और साफ-सफाई सहित विभिन्न कार्यों के लिए नियमित रूप से सेवक नियुक्त हैं।

रामपुरा स्थित यह प्राचीन मंदिर आज भी कोटा की धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। हर वर्ष निभाई जाने वाली यह अनूठी परंपरा न केवल श्रद्धालुओं की आस्था को मजबूत करती है, बल्कि भारतीय मंदिर परंपराओं की विविधता और सांस्कृतिक समृद्धि को भी दर्शाती है।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-