इंदौर. वंदे मातरम के कथित अपमान से जुड़े मामले में कांग्रेस पार्षद फौजिया अलीम की मुश्किलें बढ़ गई हैं. जिला अदालत ने उनकी अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी है. कोर्ट ने प्रारंभिक तौर पर माना कि मामले में आपसी सद्भाव बिगाड़ने से संबंधित अपराध का तत्व प्रतीत होता है. हालांकि जमानत याचिका निरस्त होने के बावजूद फिलहाल उनकी तत्काल गिरफ्तारी नहीं होगी, क्योंकि अदालत ने पुलिस को सुप्रीम कोर्ट की निर्धारित गाइडलाइन का पालन करने के निर्देश भी दिए हैं.
यह मामला 8 अप्रैल को आयोजित नगर निगम सम्मेलन से जुड़ा है. आरोप है कि सम्मेलन के दौरान कांग्रेस पार्षद फौजिया अलीम ने वंदे मातरम गाने से इंकार किया था. बताया जाता है कि कांग्रेस पार्षद रुबिना खान ने भी उनका समर्थन किया था. इस घटना के बाद मामला राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर चर्चा का विषय बन गया था. शिकायत के आधार पर एमजी रोड थाना पुलिस ने दोनों पार्षदों के खिलाफ आपसी सौहार्द बिगाड़ने और विभिन्न समूहों के बीच शत्रुता फैलाने से संबंधित धाराओं में प्रकरण दर्ज किया था.
मामले में गिरफ्तारी की आशंका को देखते हुए फौजिया अलीम ने जिला अदालत में अग्रिम जमानत याचिका दायर की थी. अपनी याचिका में उन्होंने कहा कि उन्होंने कभी भी वंदे मातरम गाने से इंकार नहीं किया. उनका कहना था कि वे पिछले लगभग 20 वर्षों से पार्षद हैं और पांच वर्षों तक नगर निगम में नेता प्रतिपक्ष की जिम्मेदारी भी निभा चुकी हैं. उन्होंने अदालत को बताया कि अपने 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन में उन्होंने हमेशा राष्ट्रीय प्रतीकों और वंदे मातरम का सम्मान किया है तथा कभी भी धार्मिक या सामुदायिक वैमनस्य फैलाने का कोई कार्य नहीं किया.
फौजिया अलीम ने यह भी तर्क दिया कि पूरे मामले में उन्होंने पुलिस जांच में सहयोग किया है और उन्हें राजनीतिक कारणों से झूठे प्रकरण में फंसाया जा रहा है. उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि वे एलएलबी अंतिम वर्ष की छात्रा हैं और उनकी परीक्षाएं 10 जून से प्रारंभ होने वाली हैं. ऐसे में यदि उन्हें जेल भेजा जाता है तो उनकी पढ़ाई और भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है.
वहीं शासन की ओर से पैरवी कर रहे लोक अभियोजक अभिजीत सिंह राठौर ने अदालत में जमानत का विरोध किया. उन्होंने तर्क दिया कि फौजिया अलीम एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि हैं और उनके प्रभावशाली पद को देखते हुए यह आशंका बनी रहती है कि वे गवाहों को प्रभावित कर सकती हैं या साक्ष्यों पर असर डालने का प्रयास कर सकती हैं. अभियोजन पक्ष ने मामले की गंभीरता का हवाला देते हुए अग्रिम जमानत नहीं दिए जाने की मांग की.
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने फौजिया अलीम की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी. कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि मामले में आपसी सद्भाव बिगाड़ने से संबंधित अपराध का तत्व मौजूद है. अदालत ने यह भी माना कि आरोपित धाराएं गैर-जमानती श्रेणी की हैं और इनमें दोष सिद्ध होने पर तीन वर्ष तक के कारावास का प्रावधान है.
हालांकि अदालत ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के चर्चित अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में जारी दिशा-निर्देशों का पालन करने पर भी जोर दिया. कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया कि सात वर्ष से कम सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी को अंतिम विकल्प के रूप में देखा जाए और यदि गिरफ्तारी आवश्यक समझी जाए तो उसके कारणों को लिखित रूप में दर्ज किया जाए.
अदालत के इस फैसले के बाद राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है. फिलहाल मामले की जांच जारी है और आगे की कानूनी प्रक्रिया पुलिस जांच तथा उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर आगे बढ़ेगी.
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