नई दिल्ली. पर्यावरणीय कानूनों और संपत्ति स्वामियों की जिम्मेदारी से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि किसी किरायेदार द्वारा किए गए पर्यावरणीय उल्लंघनों के लिए मकान मालिक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) के उस आदेश को बरकरार रखा है, जिसमें कहा गया था कि गुजरात में एक व्यावसायिक संपत्ति के मालिक से उसके किरायेदार द्वारा किए गए पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई नहीं वसूली जा सकती.
न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति संजीव सचदेवा की खंडपीठ ने गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (जीपीसीबी) की ओर से दायर अपील को खारिज करते हुए एनजीटी के नवंबर 2025 के फैसले को सही ठहराया. इस फैसले के साथ ही अदालत ने पर्यावरणीय मामलों में जिम्मेदारी तय करने को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत स्थापित किया है, जिसका प्रभाव भविष्य के अनेक मामलों पर पड़ सकता है.
मामला गुजरात के सूरत जिले के मंगरोल क्षेत्र में स्थित एक व्यावसायिक परिसर से जुड़ा है. संपत्ति के मालिक जगमोहन लच्छीराम जालान ने यह परिसर सितंबर 2020 में सूर्यप्रकाश सीलाराम सोमानी को किराये पर दिया था. किरायानामे में स्पष्ट रूप से यह शर्त शामिल थी कि परिसर का उपयोग किसी भी अवैध गतिविधि के लिए नहीं किया जाएगा. सोमानी, एम/एस सत्यम केमिकल्स का निदेशक था और वह हर वर्ष किरायानामा नवीनीकृत कराता रहा.
बाद में संबंधित परिसर में एम/एस जीनियल केमी नामक इकाई संचालित होने लगी. जांच के दौरान गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पाया कि यह इकाई आवश्यक वैधानिक अनुमतियों और ‘कंसेंट टू एस्टैब्लिश’ जैसी जरूरी स्वीकृतियों के बिना संचालित की जा रही थी. बोर्ड के अनुसार इकाई द्वारा रंग आधारित रासायनिक उत्पादन किया जा रहा था, जिससे निकलने वाले प्रदूषित अपशिष्ट जल को निर्धारित मानकों से अधिक मात्रा में जल स्रोतों में छोड़ा जा रहा था. इसे पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा माना गया.
16 अक्टूबर 2021 को बोर्ड ने इकाई संचालक सूर्यप्रकाश सोमानी को पर्यावरणीय नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए 25 लाख रुपये की अंतरिम पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति राशि जमा करने का आदेश दिया. यह कार्रवाई एनजीटी के पूर्व निर्देशों के आधार पर की गई थी. हालांकि सोमानी ने न तो यह राशि जमा की और न ही जांच एजेंसियों के संपर्क में रहा. समय बीतने के साथ वह फरार हो गया और उसका कोई पता नहीं चल सका.
मार्च 2022 में प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने परिसर की बिजली आपूर्ति भी काट दी. इसी दौरान संपत्ति मालिक जगमोहन जालान को पहली बार यह जानकारी मिली कि उनके किरायेदार के खिलाफ पर्यावरणीय उल्लंघन का मामला दर्ज है और उस पर 25 लाख रुपये की पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति लगाई गई है. जालान ने दावा किया कि उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं थी कि परिसर में संचालित इकाई ने आवश्यक पर्यावरणीय अनुमति प्राप्त नहीं की थी या वह अवैध रूप से कार्य कर रही थी.
किरायेदार के फरार होने के बाद जालान ने उसके खिलाफ धोखाधड़ी, आपराधिक षड्यंत्र और अन्य आरोपों को लेकर पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. इसके साथ ही उन्होंने प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा उनकी संपत्ति को सील किए जाने और उन पर क्षतिपूर्ति राशि का भार डालने के निर्णय को भी चुनौती दी. हालांकि बोर्ड ने दिसंबर 2024 में उनकी आपत्ति खारिज करते हुए परिसर को बंद रखने का आदेश जारी रखा.
इसके बाद मामला राष्ट्रीय हरित अधिकरण पहुंचा. सुनवाई के दौरान एनजीटी के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या किसी किरायेदार द्वारा किए गए अवैध कार्यों के लिए मकान मालिक को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है. अधिकरण ने मामले के तथ्यों, किरायानामे की शर्तों और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण करने के बाद स्पष्ट कहा कि किरायेदार के अवैध कृत्यों के लिए मकान मालिक को उत्तरदायी नहीं माना जा सकता.
एनजीटी ने अपने आदेश में कहा कि संपत्ति का वास्तविक उपयोग और संचालन किरायेदार के नियंत्रण में था तथा पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन भी उसी के द्वारा किया गया. ऐसे में केवल संपत्ति का स्वामी होने के आधार पर मकान मालिक से पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की वसूली करना न्यायसंगत नहीं होगा. अधिकरण ने 25 लाख रुपये की अंतरिम पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की वसूली संबंधी आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि यह राशि संपत्ति मालिक से नहीं वसूली जा सकती क्योंकि वह वास्तविक संचालक या अधिभोगी नहीं था.
गुजरात प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. बोर्ड का तर्क था कि पर्यावरणीय नुकसान की भरपाई सुनिश्चित करने के लिए संपत्ति मालिक को पूरी तरह जिम्मेदारी से मुक्त नहीं किया जा सकता. बोर्ड ने यह भी कहा कि कई मामलों में उद्योग संचालक या किरायेदार फरार हो जाते हैं, जिससे पर्यावरणीय क्षति की भरपाई करना कठिन हो जाता है. इसलिए संपत्ति मालिकों की भी कुछ जिम्मेदारी तय की जानी चाहिए.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने बोर्ड के इन तर्कों को स्वीकार नहीं किया और एनजीटी के निष्कर्षों को सही माना. अदालत ने माना कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर संपत्ति मालिक की प्रत्यक्ष संलिप्तता या अवैध गतिविधियों की जानकारी होने का कोई प्रमाण नहीं है. ऐसे में उसे पर्यावरणीय उल्लंघनों के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता.
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में उन मामलों के लिए महत्वपूर्ण नजीर साबित होगा, जहां किसी किरायेदार या संचालक द्वारा कानून का उल्लंघन किए जाने पर संपत्ति मालिक की जिम्मेदारी तय करने का प्रश्न उठता है. साथ ही यह निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि पर्यावरणीय मामलों में जवाबदेही उसी व्यक्ति या संस्था की होगी, जो वास्तव में गतिविधियों का संचालन कर रही हो और जिसके कारण पर्यावरण को नुकसान पहुंचा हो.
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले को संपत्ति मालिकों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, वहीं प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों के लिए यह संकेत भी है कि पर्यावरणीय अपराधों में वास्तविक दोषियों की पहचान और जवाबदेही सुनिश्चित करना ही कानून की मूल भावना है. अब इस निर्णय के बाद पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति और दायित्व निर्धारण से जुड़े मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण और अधिक स्पष्ट होने की उम्मीद है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

