तीन साल बाद आया पितरों की मुक्ति का दुर्लभ अवसर, अधिक मास की अमावस्या पर बन रहा विशेष संयोग

तीन साल बाद आया पितरों की मुक्ति का दुर्लभ अवसर, अधिक मास की अमावस्या पर बन रहा विशेष संयोग

प्रेषित समय :21:54:42 PM / Wed, Jun 10th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

ज्येष्ठ अधिक मास अपने अंतिम चरण में पहुंच चुका है और इसके साथ ही एक ऐसा दुर्लभ संयोग बनने जा रहा है, जिसे पितरों की शांति, तर्पण और श्राद्ध कर्म के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। इस वर्ष अधिक मास की अमावस्या 14 जून को पड़ रही है, जबकि 15 जून को उदया तिथि के कारण अमावस्या का प्रभाव रहेगा। विशेष बात यह है कि इस बार अमावस्या सोमवार के दिन होने से सोमवती अमावस्या का दुर्लभ योग भी बन रहा है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यह अवसर लगभग तीन वर्ष में एक बार प्राप्त होता है और इस दिन किए गए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान तथा दान-पुण्य का विशेष फल प्राप्त होता है।

धर्मशास्त्रों में अधिक मास को भगवान विष्णु का प्रिय मास माना गया है। इस दौरान किए गए जप, तप, दान और धार्मिक अनुष्ठानों का फल सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक माना जाता है। यही कारण है कि अधिक मास में आने वाली अमावस्या का महत्व और भी बढ़ जाता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार इस दिन पितृ तर्पण और श्राद्ध कर्म करने से पितरों की आत्मा को शांति प्राप्त होती है तथा परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है।

पंचांग के अनुसार अधिक मास की अमावस्या तिथि 14 जून को दोपहर 12 बजकर 19 मिनट से प्रारंभ होगी और 15 जून की सुबह 8 बजकर 23 मिनट तक रहेगी। हालांकि उदया तिथि के आधार पर अमावस्या 15 जून को मानी जाएगी, लेकिन श्राद्ध कर्म के लिए तिथि का दोपहर में होना आवश्यक माना गया है। यही कारण है कि पितरों के श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का प्रमुख दिन 14 जून को माना जा रहा है। धार्मिक विद्वानों के अनुसार श्राद्ध कर्म दोपहर में किया जाता है और 15 जून को दोपहर से पहले ही अमावस्या समाप्त हो जाने के कारण उस दिन श्राद्ध कर्म का विधान नहीं रहेगा।

धर्माचार्यों का कहना है कि जो लोग अपने पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, ब्राह्मण भोजन या अन्य धार्मिक कर्म करना चाहते हैं, वे 14 जून को अमावस्या तिथि लगने के बाद दोपहर 12 बजकर 19 मिनट से दोपहर लगभग 2 बजकर 30 मिनट तक यह कार्य संपन्न कर सकते हैं। इस अवधि को पितृ कर्म के लिए विशेष रूप से शुभ माना गया है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार अमावस्या के दिन पितृलोक से पूर्वज अपनी संतानों के पास आते हैं और उनसे तर्पण एवं श्राद्ध की अपेक्षा करते हैं। माना जाता है कि जब श्रद्धा और विधि-विधान से पितरों का तर्पण किया जाता है तो वे प्रसन्न होकर परिवार को सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और उन्नति का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। वहीं पितृ कर्मों की उपेक्षा करने पर पितृ दोष की स्थिति भी उत्पन्न हो सकती है।

तर्पण की विधि को लेकर भी धर्मशास्त्रों में विशेष निर्देश दिए गए हैं। स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण कर पितरों का स्मरण करते हुए जल, काला तिल और कुशा का उपयोग कर तर्पण देना चाहिए। विद्वानों का मानना है कि कुशा के बिना दिया गया तर्पण पितरों तक नहीं पहुंचता। इसलिए तर्पण करते समय विधि और नियमों का पालन करना आवश्यक माना गया है।

अधिक मास की अमावस्या पर दान-पुण्य का भी विशेष महत्व बताया गया है। इस दिन अन्न, वस्त्र, तिल, गुड़, दक्षिणा और जरूरतमंदों को भोजन कराने का विशेष फल प्राप्त होता है। कई लोग इस अवसर पर ब्राह्मण भोज, गौ सेवा और धार्मिक अनुष्ठान भी संपन्न कराते हैं। माना जाता है कि इससे पितरों की आत्मा को संतोष मिलता है और परिवार पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।

इस वर्ष सोमवती अमावस्या का संयोग बनने से इस तिथि का महत्व और बढ़ गया है। सोमवार का दिन भगवान शिव को समर्पित माना जाता है और अमावस्या के साथ इसका संयोग विशेष पुण्यदायी माना गया है। धार्मिक दृष्टि से यह दिन पितृ शांति, भगवान शिव की आराधना और दान-पुण्य के लिए अत्यंत शुभ माना जा रहा है।

धर्माचार्यों का कहना है कि अधिक मास की अमावस्या केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर भी है। इसलिए इस दिन श्रद्धा, आस्था और विधि-विधान के साथ किए गए धार्मिक कर्मों को विशेष महत्व दिया गया है। तीन वर्ष बाद प्राप्त हो रहे इस दुर्लभ अवसर को लेकर श्रद्धालुओं में विशेष उत्साह देखा जा रहा है और अनेक लोग अपने पितरों की शांति के लिए विशेष पूजा-अर्चना एवं तर्पण की तैयारी कर रहे हैं।

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-