सुप्रीम कोर्ट का आदेश : एमपी लोकायुक्त की एसपीई कोई इंटेलिजेंस विभाग नहीं, आरटीआई के दायरे में रहना होगा

सुप्रीम कोर्ट का आदेश : एमपी लोकायुक्त की एसपीई कोई इंटेलिजेंस विभाग नहीं, आरटीआई के दायरे में रहना होगा

प्रेषित समय :11:25:49 AM / Tue, Jun 16th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

भोपाल/नई दिल्ली. मध्य प्रदेश लोकायुक्त की एसपीई यानी स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट को आरटीआई में छूट नहीं मिलेगी. ये फैसला सुनाया है सर्वोच्च न्यायालय ने. सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लोकायुक्त की एसपीई कोई इंटेलिजेंस या खुफिया विभाग नहीं है, जो उसपर आरटीआई लागू न हो.

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को जस्टिस जे के माहेश्वरी और ए एस चंदुरकर की बैंच ने इस फैसले पर मुहर लगाई. कोर्ट ने कहा कि मध्य प्रदेश लोकायुक्त की स्पेशल पुलिस एस्टेबलिशमेंट (एसपीई), लोकायुक्त की जांच करने वाली एक शाखा है. इसलिए इसे इंटेलिंजेंस या खुफिया विभाग की तरह राइट टू इन्फॉर्मेशन एक्ट (आरटीआई) से छूट नहीं मिल सकती.

एमपी हाईकोर्ट का फैसला बरकरार

इस मामले पर फैसला देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के 20 दिसंबर 2021 के फैसले को बरकरार रखा है. दरअसल, इससे पहले राज्य सरकार ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था, जिसमें एसपीई को आरटीआई से बाहर रखना गलत माना गया. सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब मध्य प्रदेश लोकायुक्त की एसपीई ब्रांच से भी आरटीआई द्वारा जानकारियां मांगी जा सकेंगी.

सरकार का 2011 का आदेश रद्द

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस जेके माहेश्वरी और एएस चंदूरकर की पीठ ने मध्य प्रदेश सरकार की उस अधिसूचना को रद्द कर दिया है, जिसमें लोकायुक्त की स्पेशल पुलिस एस्टेबलिशमेंट (एसपीई) को आरटीआई कानून के दायरे से बाहर किया गया था. मध्य प्रदेश सरकार ने 25 अगस्त 2011 को ये अधिसूचना जारी की थी. इसपर सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ये अधिसूचना कानून के हिसाब से गलत है. कोर्ट ने आगे कहा, हमारी राय है कि मध्य प्रदेश राज्य के जीएडी (जनरल एडमिनिस्ट्रेशन डिपार्टमेंट) का 25.08.2011 का नोटिफिकेशन, जिसमें एसपीई को 2005 के एक्ट के सेक्शन 24(4) के तहत उसके दायरे से बाहर करने की मांग की गई थी, कानून के हिसाब से गलत होने के कारण रद्द किया जा सकता है, क्योंकि इसमें उन मामलों के लिए भी प्रावधान है जो 1947 के एक्ट के सेक्शन 7 के तहत नहीं आते हैं.

इसलिए उठी लोकायुक्त एसपीई पर आरटीआई की मांग

दरअसल, इस पूरे मामले की शुरुआत याचिकाकर्ता कामता प्रसाद मिश्रा के मामले से हुई. कामता प्रसाद मिश्रा मध्य प्रदेश के कटनी जिले के माधव नगर थाने के प्रभारी थे. 11 अप्रैल 2017 को उन पर भ्रष्टाचार मामले में एफआईआर हुई. इसके बाद 2020 में अभियोजन की स्वीकृति मिली. इस दौरान कामता प्रसाद मिश्रा ने आरटीआई आवेदन दायर कर लोकायुक्त से जानकारियां मांगी, जिसे एसपीई ने खारिज कर दिया.

हाईकोर्ट का खटखटाया दरवाजा

इसके बाद याचिकाकर्ता कामता प्रसाद मिश्रा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट पहुंचे. 2021 में हाईकोर्ट ने एसपीई के आदेश को रद्द कर याचिकाकर्ता को मांगी गई जानकारी प्रदान करने के निर्देश दिए, लेकिन एसपीई ने हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर कर दी. हालांकि, 15 जून 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहरा दिया.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-