सनातन धर्म में त्रयोदशी तिथि का विशेष महत्व माना गया है और जब यह तिथि शनिवार के दिन पड़ती है, तो इसका धार्मिक महत्व कई गुना बढ़ जाता है. इस वर्ष ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की अंतिम त्रयोदशी तिथि का एक अत्यंत दुर्लभ और पवित्र संयोग शनिवार को बनने जा रहा है, जिसके कारण इसे 'शनि प्रदोष व्रत' के रूप में श्रद्धापूर्वक मनाया जाएगा. ज्योतिष गणना के अनुसार, ज्येष्ठ शुक्ल त्रयोदशी तिथि आगामी 27 जून को पड़ रही है, जो शनिवार का दिन होने की वजह से शिव भक्तों के साथ-साथ शनि देव की कृपा पाने का एक महासंयोग लेकर आई है. हिंदू शास्त्रों में शनि देव को भगवान शिव का परम भक्त और न्याय का देवता माना गया है, इसलिए मान्यता है कि इस विशेष दिन पर की गई पूजा-अर्चना से महादेव और शनि देव दोनों एक साथ प्रसन्न होते हैं और जातकों के जीवन से सभी प्रकार के कष्टों का निवारण करते हैं.
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, हिंदू कैलेंडर के प्रत्येक महीने के कृष्ण और शुक्ल, दोनों पक्षों की त्रयोदशी तिथि पूर्ण रूप से भगवान शिव को समर्पित होती है. इस पावन तिथि पर श्रद्धालु दिन भर व्रत रखते हैं और शाम के समय, जिसे प्रदोष काल कहा जाता है, भगवान शिव और माता पार्वती की पूरे विधि-विधान से पूजा-उपासना करते हैं. प्रदोष काल सूर्यास्त के ठीक बाद का वह समय होता है जब महादेव अत्यंत प्रसन्न मुद्रा में होते हैं और अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करते हैं. चूंकि यह व्रत वार के अनुसार अपना नाम बदलता है, इसलिए शनिवार को आने के कारण इसे शनि प्रदोष व्रत कहा जाता है, जो विशेष रूप से उन लोगों के लिए एक वरदान की तरह है जो लंबे समय से शनि जनित दोषों और परेशानियों से जूझ रहे हैं.
इस पावन अवसर पर शनि देव को प्रसन्न करने और कुंडली में बैठे कमजोर शनि के अशुभ प्रभावों को शांत करने के लिए शास्त्रों में कुछ विशेष और अचूक उपायों का वर्णन किया गया है. वर्तमान समय में जो लोग शनि की साढ़ेसाती और ढैय्या के विभिन्न चरणों से पीड़ित हैं, उनके लिए इस दिन 'दशरथकृत शनि स्तोत्र' का पाठ करना अत्यंत फलदायी और चमत्कारी माना गया है. प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, राजा दशरथ द्वारा रचित इस स्तोत्र का पाठ करने से शनि देव का क्रोध शांत होता है और वे जातक को मानसिक व शारीरिक कष्टों से मुक्ति प्रदान करते हैं. इसके अतिरिक्त, इस व्रत के दिन प्रदोष काल में एक पात्र में शुद्ध जल लेकर उसमें काले तिल मिलाकर भगवान शिव का जलाभिषेक करने का विधान है. ऐसा करने से न केवल भोलेनाथ की असीम कृपा प्राप्त होती है, बल्कि शनि देव भी शांत होते हैं और जातक के जीवन के मार्ग में आने वाली बाधाएं समाप्त होने लगती हैं.
पूजा की इस कड़ी में एक महत्वपूर्ण उपाय यह भी है कि इस दिन शिव आराधना के दौरान महादेव को बेलपत्र, शमी के पत्ते और चंदन अवश्य अर्पित किए जाने चाहिए. शमी के पत्तों का संबंध सीधे तौर पर शनि देव से माना जाता है, इसलिए भगवान शिव को शमी पत्र चढ़ाने से शनि देव के अशुभ और क्रूर प्रभावों से तत्काल राहत मिलती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है. इसके साथ ही, शनिवार की शाम को किसी नजदीकी शनि मंदिर में जाकर अथवा पवित्र पीपल के वृक्ष के नीचे सरसों के तेल का एक दीपक जलाना अत्यंत लाभकारी और दोष निवारक माना गया है. मान्यता है कि पीपल के पेड़ में त्रिदेवों के साथ-साथ शनि देव का भी वास होता है, इसलिए वहां दीपदान करने से जीवन का अंधकार दूर होता है. इस दिन का एक और सबसे प्रभावी उपाय पवनपुत्र हनुमान जी की आराधना करना है; शनि प्रदोष के दिन हनुमान चालीसा या बजरंग बाण का पाठ करने से शनि देव कभी भी उस जातक को प्रताड़ित नहीं करते, क्योंकि उन्होंने हनुमान जी को यह वचन दिया था कि वे उनके भक्तों को कभी परेशान नहीं करेंगे.
ज्योतिषीय दृष्टिकोण से यह शनि प्रदोष व्रत कुछ विशेष राशियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी साबित होने वाला है. इस समय कर्म फलदाता और न्याय के देवता शनि देव मीन राशि में गोचर कर रहे हैं. शनि के मीन राशि में उपस्थित होने के कारण वर्तमान में मेष राशि, कुंभ राशि और मीन राशि के जातकों पर शनि की साढ़ेसाती का प्रभाव चल रहा है, जिसके कारण इन राशियों के लोगों को कड़ी मेहनत के बाद भी मनचाहा परिणाम नहीं मिल पा रहा है. वहीं दूसरी ओर, सिंह राशि और धनु राशि के जातकों पर इस समय शनि की ढैय्या का साया मंडरा रहा है. ज्योतिष शास्त्र में माना जाता है कि साढ़ेसाती और ढैय्या के इस कठिन कालखंड के दौरान प्रभावित व्यक्तियों को भारी आर्थिक तंगी, अत्यधिक मानसिक तनाव, पारिवारिक कलह और गंभीर शारीरिक व्याधियों का सामना करना पड़ता है.
ऐसे में ज्योतिषविदों और पंडितों का स्पष्ट मानना है कि जिन राशियों पर इस समय शनि की टेढ़ी नजर या भारी दशा चल रही है, वे यदि 27 जून को पड़ने वाले इस ज्येष्ठ माह के अंतिम शनि प्रदोष व्रत के दिन पूरी निष्ठा और श्रद्धा के साथ इन बताए गए उपायों को अपनाते हैं, तो उन्हें शनि के क्रूर और नकारात्मक प्रभावों से बहुत बड़ी राहत मिलेगी. यह दिन केवल व्रत रखने का नहीं, बल्कि अपने कर्मों की समीक्षा करने और दान-पुण्य के माध्यम से शनि देव के न्याय चक्र को अपने अनुकूल करने का एक स्वर्णिम अवसर है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

