बीजापुर. छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के एक दूरस्थ वनांचल क्षेत्र से आत्मनिर्भरता, सामुदायिक एकजुटता और जनसहभागिता की ऐसी मिसाल सामने आई है, जिसने विकास और बुनियादी सुविधाओं को लेकर चल रही बहस के बीच लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. ग्राम पंचायत पेद्दाकोड़ेपाल के आश्रित गांव कोयाईटपाल-डोगरीपारा के ग्रामीणों ने वर्षों पुरानी आवागमन की समस्या का समाधान सरकारी सहायता की प्रतीक्षा किए बिना स्वयं कर दिखाया. लगभग 200 ग्रामीणों ने सामूहिक श्रमदान कर बहते नाले पर लकड़ी का अस्थायी पुल तैयार कर दिया, जिससे अब बरसात के दिनों में गांव का संपर्क पूरी तरह टूटने की आशंका काफी हद तक कम हो गई है.
यह इलाका लंबे समय से बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझता रहा है. ग्रामीणों का कहना है कि स्वतंत्रता के दशकों बाद भी उनके गांव तक पहुंचने के लिए स्थायी पुलिया का निर्माण नहीं हो पाया. हर वर्ष मानसून के दौरान नाले और छोटी नदियां उफान पर आ जाती थीं, जिससे गांव का संपर्क बाहरी दुनिया से लगभग कट जाता था. स्थिति इतनी गंभीर हो जाती थी कि बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती थी, स्कूल जाना बंद हो जाता था और बीमार, बुजुर्ग तथा गर्भवती महिलाओं को अस्पताल तक पहुंचाना जोखिम भरा कार्य बन जाता था.
स्थानीय निवासियों के अनुसार बरसात के मौसम में लोगों को आवश्यक कार्यों के लिए कई किलोमीटर लंबा और कठिन रास्ता तय करना पड़ता था. कई बार तेज बहाव के कारण लोगों को घंटों इंतजार करना पड़ता था. ग्रामीण वर्षों से इस समस्या के स्थायी समाधान की मांग कर रहे थे, लेकिन जब समय पर कोई व्यवस्था नहीं बन सकी तो उन्होंने स्वयं पहल करने का निर्णय लिया.
मानसून की सक्रियता बढ़ने और बारिश शुरू होने से पहले गांव के लोगों ने बैठक कर सामूहिक श्रमदान का फैसला किया. इसके बाद युवाओं, बुजुर्गों और महिलाओं सहित लगभग 200 ग्रामीणों ने मिलकर लकड़ी, बांस और अन्य स्थानीय संसाधनों की मदद से नाले पर एक मजबूत अस्थायी पुल तैयार कर दिया. कई दिनों की मेहनत के बाद तैयार हुए इस पुल ने गांव के लोगों को राहत दी है और अब दैनिक आवागमन पहले की तुलना में काफी आसान हो गया है.
ग्रामीणों का कहना है कि यह केवल एक पुल नहीं बल्कि उनकी सामूहिक शक्ति और आत्मनिर्भरता का प्रतीक है. उन्होंने बताया कि यदि वे सरकारी मदद का इंतजार करते रहते तो इस वर्ष भी बरसात के दौरान वही पुरानी परेशानियां झेलनी पड़तीं. इसलिए सभी लोगों ने मिलकर अपने संसाधनों और श्रम से यह समाधान तैयार किया.
ग्रामीणों के इस प्रयास की चर्चा धीरे-धीरे पूरे क्षेत्र में फैल गई. इसकी जानकारी मिलने के बाद कई जनप्रतिनिधि और राजनीतिक कार्यकर्ता गांव पहुंचे. भाजपा सोशल मीडिया जिला संयोजक के.जी. सुधाकर, अनुसूचित जनजाति मोर्चा के जिलाध्यक्ष संदीप तेलम तथा सहसंयोजक जितेंद्र तेलम ने मौके पर पहुंचकर ग्रामीणों के प्रयासों की सराहना की. उन्होंने पुल का निरीक्षण किया और ग्रामीणों से उनकी समस्याओं की जानकारी ली.
ग्रामीणों ने जनप्रतिनिधियों को बताया कि अस्थायी पुल तत्काल राहत तो दे सकता है, लेकिन स्थायी समाधान के लिए पक्की पुलिया का निर्माण बेहद जरूरी है. बरसात के दौरान तेज बहाव में लकड़ी का पुल क्षतिग्रस्त होने का खतरा बना रहता है. इसलिए लंबे समय से क्षेत्र के लोग एक मजबूत और स्थायी पुलिया की मांग कर रहे हैं.
मामले की जानकारी पूर्व मंत्री महेश गागड़ा तक भी पहुंचाई गई. बताया गया कि ग्रामीणों की समस्या और उनके श्रमदान से तैयार पुल की जानकारी मिलने के बाद उन्होंने इस विषय को गंभीरता से लिया. ग्रामीणों के अनुसार पूर्व मंत्री ने उन्हें आश्वस्त किया है कि वर्षा ऋतु समाप्त होते ही छह मीटर लंबी नई पक्की पुलिया के निर्माण की प्रक्रिया को प्राथमिकता के आधार पर शुरू कराया जाएगा.
पूर्व मंत्री के इस आश्वासन के बाद गांव के लोगों में उम्मीद की नई किरण जगी है. ग्रामीणों का कहना है कि यदि पक्की पुलिया का निर्माण हो जाता है तो दशकों पुरानी समस्या का स्थायी समाधान हो जाएगा. इससे न केवल गांव का संपर्क बेहतर होगा, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विकास गतिविधियों को भी गति मिलेगी.
क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यह घटना केवल एक गांव की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि सामूहिक प्रयासों से बड़ी से बड़ी चुनौतियों का सामना किया जा सकता है. जब समुदाय एकजुट होकर कार्य करता है तो सीमित संसाधनों में भी उल्लेखनीय परिणाम हासिल किए जा सकते हैं. हालांकि वे यह भी कहते हैं कि बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराना सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी है, इसलिए ऐसे क्षेत्रों में स्थायी समाधान के लिए शीघ्र कार्रवाई होनी चाहिए.
बीजापुर जैसे दूरस्थ और वनांचल क्षेत्रों में सड़क, पुल और संचार जैसी आधारभूत सुविधाओं का विकास लंबे समय से चुनौती बना हुआ है. ऐसे में कोयाईटपाल-डोगरीपारा के ग्रामीणों द्वारा तैयार किया गया यह पुल विकास की आवश्यकता और जनसहभागिता की शक्ति दोनों को एक साथ सामने लाता है. ग्रामीणों ने साबित कर दिया है कि यदि संकल्प मजबूत हो तो कठिन परिस्थितियों में भी रास्ते बनाए जा सकते हैं.
अब सभी की निगाहें उस वादे पर टिकी हैं, जिसमें क्षेत्र में स्थायी पुलिया निर्माण का भरोसा दिया गया है. यदि यह परियोजना समय पर पूरी होती है तो न केवल ग्रामीणों की वर्षों पुरानी समस्या समाप्त होगी, बल्कि यह सुदूर वनांचल क्षेत्र विकास की मुख्यधारा से जुड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम भी साबित होगा. फिलहाल गांव के लोगों द्वारा श्रमदान से तैयार किया गया लकड़ी का पुल आत्मनिर्भरता, सहयोग और सामुदायिक एकता की प्रेरक मिसाल बन गया है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

