बेंगलुरु। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पिछले एक दशक से अधिक समय से खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करने के मुद्दे पर भारतीय जनता पार्टी के सांसद तेजस्वी सूर्या का एक बयान राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चा का विषय बन गया है। एक कॉलेज कार्यक्रम के दौरान छात्र द्वारा पूछे गए सवाल के जवाब में सूर्या ने कहा कि आज के डिजिटल युग में पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंस की उपयोगिता पहले जैसी नहीं रह गई है, क्योंकि सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने जनप्रतिनिधियों को सीधे जनता से संवाद करने का अवसर उपलब्ध करा दिया है। उनके इस जवाब का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है और इसे लेकर विभिन्न राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी सामने आ रही हैं।
यह घटनाक्रम बेंगलुरु के एक कॉलेज में आयोजित संवाद कार्यक्रम के दौरान सामने आया, जहां छात्रों को विभिन्न समसामयिक विषयों पर सवाल पूछने का अवसर दिया गया था। इसी दौरान एक छात्र ने सांसद तेजस्वी सूर्या से सवाल किया कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले दस वर्षों से अधिक समय में कोई खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है। ऐसे में इस विषय पर उनका क्या दृष्टिकोण है।
छात्र के सवाल को सुनने के बाद तेजस्वी सूर्या ने पहले उसे एक महत्वपूर्ण और अच्छा सवाल बताया। इसके बाद उन्होंने कहा कि जिस प्रकार दुनिया तेजी से बदल रही है, उसी तरह संवाद के तरीके भी बदल रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि आज के समय में सोशल मीडिया, डिजिटल प्लेटफॉर्म और प्रत्यक्ष संवाद के अनेक माध्यम उपलब्ध हैं, जिनके जरिए कोई भी नेता सीधे जनता तक अपनी बात पहुंचा सकता है। उनके अनुसार प्रेस कॉन्फ्रेंस का पारंपरिक स्वरूप उस दौर की आवश्यकता था, जब संवाद के विकल्प सीमित हुआ करते थे।
सूर्या ने कहा कि प्रधानमंत्री संवाद नहीं कर रहे हैं, ऐसा कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि प्रधानमंत्री विभिन्न माध्यमों से प्रतिदिन देशवासियों तक अपनी बात पहुंचाते हैं। उन्होंने कहा कि आज तकनीक ने संचार की प्रकृति को पूरी तरह बदल दिया है और जनता सीधे अपने नेताओं से जुड़ सकती है। ऐसे में प्रेस कॉन्फ्रेंस को संवाद का एकमात्र माध्यम मानना वर्तमान समय की वास्तविकताओं से मेल नहीं खाता।
हालांकि उनके इस बयान के बाद राजनीतिक बहस तेज हो गई है। विपक्षी दल लंबे समय से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं किए जाने का मुद्दा उठाते रहे हैं। विपक्ष का तर्क है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में प्रेस कॉन्फ्रेंस जवाबदेही का एक महत्वपूर्ण माध्यम है, जहां पत्रकार सरकार और प्रधानमंत्री से सीधे सवाल पूछ सकते हैं। वहीं भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि प्रधानमंत्री विभिन्न मंचों, साक्षात्कारों, जनसभाओं, डिजिटल माध्यमों और ‘मन की बात’ जैसे कार्यक्रमों के जरिए लगातार जनता से संवाद करते हैं।
सूर्या के बयान का वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आने के बाद कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत सहित कई विपक्षी नेताओं ने इस पर प्रतिक्रिया दी। कांग्रेस नेताओं ने छात्र के सवाल को लोकतंत्र और जवाबदेही से जुड़ा विषय बताते हुए कहा कि जनता के प्रश्नों का सामना करना किसी भी लोकतांत्रिक नेतृत्व की जिम्मेदारी होती है। वहीं भाजपा समर्थकों ने सूर्या के तर्कों का समर्थन करते हुए कहा कि डिजिटल युग में संवाद के स्वरूप में व्यापक बदलाव आया है और जनता तक सीधे पहुंचने के कई नए माध्यम विकसित हुए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बहस केवल प्रधानमंत्री की प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक लोकतंत्र में राजनीतिक संवाद के बदलते स्वरूप से भी जुड़ी हुई है। एक ओर पारंपरिक मीडिया संस्थानों की भूमिका है, तो दूसरी ओर सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म के जरिए नेताओं और जनता के बीच सीधा संपर्क स्थापित हो रहा है। ऐसे में यह प्रश्न लगातार उठता रहा है कि क्या नए संचार माध्यम पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंस का स्थान ले सकते हैं या फिर दोनों की अपनी-अपनी अलग भूमिका है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में प्रेस कॉन्फ्रेंस का मुद्दा समय-समय पर चर्चा में आता रहा है। प्रधानमंत्री ने कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों को साक्षात्कार दिए हैं, लेकिन पत्रकारों के साथ खुला प्रश्नोत्तर सत्र बहुत कम देखने को मिला है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान आयोजित एक प्रेस वार्ता में भी अधिकतर सवालों के जवाब तत्कालीन भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने दिए थे। इसके बाद भी विपक्ष लगातार यह प्रश्न उठाता रहा है कि प्रधानमंत्री को नियमित रूप से पत्रकारों के सवालों का सामना करना चाहिए।
हाल के महीनों में विदेश दौरों के दौरान भी यह मुद्दा चर्चा में रहा। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कुछ विदेशी पत्रकारों द्वारा भी प्रधानमंत्री से प्रेस कॉन्फ्रेंस को लेकर सवाल पूछे गए थे। हालांकि सरकार का पक्ष रहा है कि सभी कार्यक्रमों का प्रारूप अलग-अलग होता है और हर सार्वजनिक आयोजन को खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं माना जा सकता।
इसी बीच कॉलेज कार्यक्रम में छात्र और सांसद के बीच हुआ यह संवाद एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गया है। जहां एक पक्ष इसे लोकतांत्रिक जवाबदेही से जोड़कर देख रहा है, वहीं दूसरा पक्ष इसे बदलते समय और आधुनिक संचार व्यवस्था के संदर्भ में समझने की बात कर रहा है। फिलहाल सोशल मीडिया पर यह वीडियो व्यापक रूप से साझा किया जा रहा है और इस पर राजनीतिक, सामाजिक तथा शैक्षणिक वर्गों में चर्चा जारी है। आने वाले दिनों में यह बहस और तेज हो सकती है कि लोकतंत्र में जनता और सत्ता के बीच संवाद का सबसे प्रभावी माध्यम क्या होना चाहिए तथा आधुनिक तकनीक के दौर में पारंपरिक प्रेस कॉन्फ्रेंस की भूमिका कितनी प्रासंगिक बनी हुई है।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

