नई दिल्ली. विदेश मंत्रालय की उस टिप्पणी के बाद देश में पासपोर्ट को लेकर नई बहस छिड़ गई है, जिसमें स्पष्ट किया गया कि भारतीय पासपोर्ट यात्रा के लिए जारी किया जाने वाला एक आधिकारिक दस्तावेज है, लेकिन इसे नागरिकता का अंतिम और निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता. इस बयान ने राजनीतिक और कानूनी विमर्श को तेज कर दिया है. इसी बीच वैश्विक स्तर पर भारतीय पासपोर्ट की स्थिति से जुड़ा ताजा आंकड़ा भी सामने आया है, जिसमें भारत ने एक वर्ष के भीतर उल्लेखनीय सुधार दर्ज करते हुए वैश्विक रैंकिंग में 10 स्थानों की छलांग लगाई है.
हेनले पासपोर्ट इंडेक्स 2026 के अनुसार भारत का पासपोर्ट अब दुनिया में 75वें स्थान पर पहुंच गया है. वर्ष 2025 में भारत 85वें स्थान पर था. इस तरह महज एक वर्ष में भारत ने दस स्थानों का सुधार दर्ज किया है. इस रैंकिंग के अनुसार भारतीय पासपोर्ट धारक अब 56 देशों या क्षेत्रों में बिना पहले से वीजा प्राप्त किए यात्रा कर सकते हैं. इसमें वीजा-फ्री प्रवेश, आगमन पर वीजा, विजिटर परमिट और इलेक्ट्रॉनिक ट्रैवल ऑथराइजेशन जैसी सुविधाएं शामिल हैं.
पासपोर्ट की रैंकिंग ऐसे समय चर्चा में आई है जब विदेश मंत्रालय के बयान के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में यह सवाल उठने लगा कि यदि पासपोर्ट अंतरराष्ट्रीय यात्रा, विदेशी धरती पर दूतावासीय सहायता और वैश्विक स्तर पर पहचान का आधार है, तो फिर इसे नागरिकता का अंतिम प्रमाण क्यों नहीं माना जाता. इस विवाद के बढ़ने के बाद केंद्र सरकार ने भी अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए कहा कि यह कोई नई नीति नहीं है, बल्कि दशकों से लागू कानूनी व्यवस्था का हिस्सा है.
सरकार का कहना है कि यह स्थिति न तो हाल में तय की गई है और न ही पिछले कुछ वर्षों में बदली है. अधिकारियों के अनुसार भारतीय नागरिकता का निर्धारण संबंधित कानूनों और निर्धारित प्रक्रियाओं के आधार पर होता है. पासपोर्ट किसी व्यक्ति को यात्रा की अनुमति देने वाला सरकारी दस्तावेज है, लेकिन नागरिकता के अंतिम प्रमाण के रूप में उसकी कानूनी स्थिति अलग है. सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि यह व्यवस्था लंबे समय से लागू है और इसमें कोई नया बदलाव नहीं किया गया है.
कानूनी विशेषज्ञों का भी मानना है कि भारतीय कानून में नागरिकता का निर्धारण अलग अधिनियमों और दस्तावेजों के आधार पर किया जाता है. पासपोर्ट जारी करते समय नागरिकता से जुड़े दस्तावेजों की जांच अवश्य की जाती है, लेकिन स्वयं पासपोर्ट को नागरिकता का अंतिम प्रमाण नहीं माना जाता. यही कारण है कि विदेश मंत्रालय ने चिप आधारित ई-पासपोर्ट की नई व्यवस्था प्रस्तुत करते समय भी इस कानूनी स्थिति को दोहराया.
विवाद के बीच भारतीय पासपोर्ट की वैश्विक स्थिति में लगातार हो रहा सुधार सरकार के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है. वर्ष 2021 में भारत हेनले पासपोर्ट इंडेक्स में 90वें स्थान पर था, जो हाल के वर्षों में उसकी सबसे कमजोर स्थिति मानी गई. इसके बाद वर्ष 2023 में भारत 84वें, वर्ष 2024 में 80वें स्थान पर पहुंचा. हालांकि वर्ष 2025 में रैंकिंग गिरकर 85वें स्थान पर आ गई थी, लेकिन वर्ष 2026 में भारत ने उल्लेखनीय वापसी करते हुए 75वां स्थान हासिल कर लिया. यह सुधार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय पासपोर्ट की स्वीकार्यता और यात्रा सुविधाओं में बढ़ोतरी का संकेत माना जा रहा है.
हेनले पासपोर्ट इंडेक्स दुनिया के 199 देशों और क्षेत्रों के पासपोर्ट का मूल्यांकन करता है. यह रैंकिंग अंतरराष्ट्रीय वायु परिवहन संघ के आंकड़ों के आधार पर तैयार की जाती है. इसमें देखा जाता है कि किसी देश का नागरिक कितने देशों में बिना पूर्व वीजा के प्रवेश कर सकता है. यदि किसी देश में आगमन पर वीजा, इलेक्ट्रॉनिक यात्रा अनुमति या विजिटर परमिट की सुविधा उपलब्ध है तो उसे भी इस रैंकिंग में शामिल किया जाता है.
वैश्विक रैंकिंग में इस वर्ष भी सिंगापुर का पासपोर्ट दुनिया का सबसे शक्तिशाली पासपोर्ट बना हुआ है. सिंगापुर के नागरिक 192 देशों में बिना पूर्व वीजा के यात्रा कर सकते हैं. इसके बाद जापान 187 देशों की यात्रा सुविधा के साथ दूसरे और दक्षिण कोरिया 186 देशों के साथ तीसरे स्थान पर है. दूसरी ओर अफगानिस्तान का पासपोर्ट सूची में सबसे नीचे है, जिसके धारकों को केवल 24 देशों में ऐसी यात्रा सुविधा उपलब्ध है.
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी देश के पासपोर्ट की वैश्विक रैंकिंग केवल यात्रा सुविधा का संकेतक होती है. इसका संबंध उस देश के कूटनीतिक रिश्तों, द्विपक्षीय समझौतों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग से भी होता है. इसलिए भारत की रैंकिंग में हुआ सुधार उसकी वैश्विक पहुंच और अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विस्तार का भी संकेत माना जा रहा है.
फिलहाल पासपोर्ट की कानूनी स्थिति को लेकर राजनीतिक बहस जारी है, लेकिन वैश्विक स्तर पर भारतीय पासपोर्ट की स्थिति मजबूत होने से यह स्पष्ट है कि अंतरराष्ट्रीय यात्रा की दृष्टि से भारतीय नागरिकों के लिए अवसर बढ़ रहे हैं. अब बहस इस बात पर केंद्रित है कि नागरिकता के प्रमाण और यात्रा दस्तावेज के बीच कानूनी अंतर को लेकर आम लोगों में स्पष्टता कैसे लाई जाए, ताकि किसी प्रकार का भ्रम पैदा न हो. वहीं दूसरी ओर भारतीय पासपोर्ट की वैश्विक रैंकिंग में हुई उल्लेखनीय बढ़त भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता के रूप में भी देखी जा रही है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

