भोपाल. गरीबों के कल्याण के लिए बनाई गई बीपीएल व्यवस्था में कथित अनियमितताओं का एक बड़ा मामला सामने आया है. मध्य प्रदेश के मेहर जिले की जनपद पंचायत मैहर में अपात्र व्यक्तियों को गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों की सूची में शामिल कर फर्जी बीपीएल प्रमाण पत्र जारी किए जाने तथा उनके माध्यम से वर्षों तक विभिन्न शासकीय योजनाओं का लाभ दिलाने के आरोप में आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) ने आपराधिक प्रकरण दर्ज किया है. प्रारंभिक जांच में 111 अपात्र हितग्राहियों के नाम बीपीएल सूची में पाए जाने के बाद यह मामला अब व्यापक जांच के दायरे में आ गया है.
प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार शिकायत मिलने के बाद प्रारंभिक स्तर पर किए गए सत्यापन में यह तथ्य सामने आए कि बीपीएल सूची तैयार करने और उसमें नाम जोड़ने की निर्धारित प्रक्रिया का कथित रूप से पालन नहीं किया गया. आरोप है कि आवश्यक पटवारी सर्वे रिपोर्ट और तहसीलदार के सत्यापन के बिना ही अनेक अपात्र व्यक्तियों के नाम बीपीएल सूची में दर्ज कर दिए गए. इन्हीं नामों के आधार पर फर्जी बीपीएल प्रमाण पत्र जारी किए गए और उनका उपयोग विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने के लिए किया गया. जांच एजेंसी का कहना है कि इस पूरी प्रक्रिया से शासन को आर्थिक क्षति पहुंची है.
मामले की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि अब तक की जांच में 111 ऐसे हितग्राही चिन्हित किए गए हैं, जिन्हें कथित रूप से फर्जी बीपीएल प्रमाण पत्र जारी किए गए. आरोप है कि वर्ष 2018 से वर्तमान तक इन प्रमाण पत्रों के आधार पर कई सरकारी योजनाओं का अनुचित लाभ लिया गया. यदि जांच में ये आरोप प्रमाणित होते हैं तो इसका सीधा प्रभाव उन वास्तविक गरीब परिवारों पर पड़ा होगा, जो पात्र होने के बावजूद योजनाओं से वंचित रह गए होंगे.
जांच में यह भी सामने आया है कि बीपीएल सूची के विधिवत संशोधन और सत्यापन की प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया. शासन के दिशा-निर्देशों के अनुसार सूची में नाम जोड़ने से पहले राजस्व विभाग की जांच और सक्षम अधिकारी की स्वीकृति आवश्यक होती है, लेकिन शिकायत में आरोप लगाया गया है कि इन प्रक्रियाओं की अनदेखी करते हुए अपात्र व्यक्तियों को पात्र दर्शा दिया गया. यही कारण है कि शिकायत के सत्यापन के बाद मामला आपराधिक जांच तक पहुंच गया.
आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो ने प्रथम दृष्टया अपराध प्रमाणित पाए जाने पर तत्कालीन और वर्तमान अधिकारियों सहित संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध भारतीय न्याय व्यवस्था के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत अपराध दर्ज किया है. इनमें भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 409 और 120-बी के साथ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित 2018) की धाराएं भी शामिल हैं. फिलहाल मामले की विवेचना जारी है और दस्तावेजों, सरकारी अभिलेखों तथा अन्य साक्ष्यों की जांच की जा रही है.
ग्रामीण विकास और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के जानकारों का कहना है कि बीपीएल सूची किसी भी कल्याणकारी व्यवस्था की आधारशिला होती है. इसी सूची के आधार पर गरीब परिवारों को राशन, आवास, स्वास्थ्य, शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा पेंशन और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ मिलता है. यदि इस सूची में अपात्र लोगों के नाम शामिल हो जाते हैं तो सरकारी संसाधनों का वितरण प्रभावित होता है और वास्तविक जरूरतमंद परिवार अपने अधिकारों से वंचित रह जाते हैं. इसलिए इस प्रकार की अनियमितताओं को केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि सार्वजनिक संसाधनों के दुरुपयोग के रूप में भी देखा जाता है.
यह मामला कई गंभीर सवाल भी खड़े कर रहा है. यदि कथित अनियमितताएं वर्ष 2018 से लगातार चल रही थीं तो समय-समय पर होने वाले सत्यापन, सामाजिक अंकेक्षण और विभागीय निरीक्षण के दौरान इन्हें क्यों नहीं पकड़ा जा सका. क्या निगरानी व्यवस्था कमजोर रही या शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई? अब जांच एजेंसियों की पड़ताल से इन सवालों के जवाब सामने आने की उम्मीद है.
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में केवल दोषियों के खिलाफ कार्रवाई पर्याप्त नहीं होती, बल्कि पूरी बीपीएल सूची का स्वतंत्र पुनरीक्षण भी आवश्यक होता है. यदि सूची में बड़ी संख्या में अपात्र लोगों के नाम शामिल पाए जाते हैं तो सभी लाभार्थियों का पुनः सत्यापन कराया जाना चाहिए, ताकि वास्तविक गरीब परिवारों को उनका अधिकार मिल सके और भविष्य में इस प्रकार की अनियमितताओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके.
फिलहाल ईओडब्ल्यू की कार्रवाई के बाद संबंधित विभागों में भी हलचल बढ़ गई है. जांच एजेंसी अब दस्तावेजी साक्ष्यों, प्रशासनिक निर्णयों और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की विस्तार से जांच कर रही है. विवेचना पूरी होने के बाद यदि आरोप पुष्ट होते हैं तो मामले में आगे और भी कार्रवाई हो सकती है. वहीं आरोपित पक्षों को भी कानून के अनुसार अपना पक्ष रखने और न्यायिक प्रक्रिया के तहत अपनी सफाई प्रस्तुत करने का पूरा अवसर मिलेगा.
मेहर का यह मामला एक बार फिर यह संकेत देता है कि गरीबों के लिए संचालित योजनाओं की पारदर्शिता और जवाबदेही को और अधिक मजबूत बनाने की आवश्यकता है. क्योंकि बीपीएल सूची में दर्ज प्रत्येक नाम केवल एक सरकारी रिकॉर्ड नहीं, बल्कि किसी परिवार के जीवन, उसके अधिकार और उसके भविष्य से जुड़ा होता है. ऐसे में यदि पात्रता की प्रक्रिया में किसी प्रकार की अनियमितता होती है तो उसका असर सीधे उन लोगों पर पड़ता है, जिनके लिए ये योजनाएं बनाई गई हैं. अब पूरे मामले पर निगाहें जांच एजेंसी की अगली कार्रवाई और विवेचना के अंतिम निष्कर्ष पर टिकी हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

