मुख्य सचिव की पेशी पर हाई कोर्ट ने लगाई रोक, वेतनमान अवमानना मामले में राज्य सरकार को अंतरिम राहत

मुख्य सचिव की पेशी पर हाई कोर्ट ने लगाई रोक, वेतनमान अवमानना मामले में राज्य सरकार को अंतरिम राहत

प्रेषित समय :18:47:40 PM / Thu, Jun 25th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के तृतीय एवं चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को उच्च वेतनमान का लाभ दिए जाने से जुड़े बहुचर्चित अवमानना प्रकरण में राज्य सरकार को बड़ी अंतरिम राहत मिली है. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश विवेक रूसिया की अध्यक्षता वाली युगलपीठ ने राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए मुख्य सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है. इसके साथ ही उस आदेश के प्रभाव पर अंतरिम विराम लग गया है, जिसके तहत एकलपीठ ने मुख्य सचिव को न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने के निर्देश दिए थे.

यह मामला हाई कोर्ट के तृतीय और चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को उच्च वेतनमान का लाभ दिए जाने से जुड़ा है, जिसकी शुरुआत वर्ष 2016 में दायर एक याचिका से हुई थी. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि कर्मचारियों को उच्च वेतनमान देने संबंधी प्रस्ताव लंबे समय से राज्य शासन के समक्ष लंबित पड़ा है, जिसके कारण उन्हें वैधानिक लाभ नहीं मिल पा रहा है. मामले की सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने 28 अप्रैल 2017 को राज्य सरकार को चार सप्ताह के भीतर इस संबंध में निर्णय लेने के निर्देश दिए थे.

निर्धारित समय सीमा के भीतर आदेश का पालन नहीं होने पर वर्ष 2018 में अवमानना याचिका दायर की गई. इसके बाद भी वर्षों तक अपेक्षित प्रगति नहीं होने पर मामले की सुनवाई कर रही एकलपीठ ने 26 मार्च 2026 को मुख्य सचिव को व्यक्तिगत रूप से न्यायालय में उपस्थित होने का आदेश जारी किया था. अदालत का उद्देश्य यह जानना था कि लंबे समय से लंबित आदेश के पालन में देरी क्यों हो रही है और कर्मचारियों को उनका वैधानिक लाभ अब तक क्यों नहीं मिल सका.

मुख्य सचिव की व्यक्तिगत पेशी के आदेश को चुनौती देते हुए राज्य शासन ने युगलपीठ के समक्ष अपील दायर की. राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता प्रशांत सिंह और अतिरिक्त महाधिवक्ता ब्रह्मदत्त सिंह ने पक्ष रखा. वहीं कर्मचारियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता नमन नागरथ तथा अधिवक्ता हिमांशु मिश्रा ने न्यायालय में अपना पक्ष प्रस्तुत किया.

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद युगलपीठ ने मुख्य सचिव की व्यक्तिगत उपस्थिति संबंधी आदेश के क्रियान्वयन पर फिलहाल रोक लगा दी. इसका अर्थ यह है कि अंतिम निर्णय होने तक मुख्य सचिव को न्यायालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होगी. हालांकि इससे मूल विवाद समाप्त नहीं हुआ है और उच्च वेतनमान से संबंधित प्रकरण की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी.

यह मामला पिछले लगभग एक दशक से न्यायालय में लंबित है और हजारों कर्मचारियों के हितों से जुड़ा माना जा रहा है. कर्मचारियों का दावा है कि शासन स्तर पर प्रस्ताव लंबित रहने के कारण उन्हें वर्षों से उच्च वेतनमान का लाभ नहीं मिल पाया है. दूसरी ओर राज्य सरकार का पक्ष है कि मामले के विभिन्न प्रशासनिक और वित्तीय पहलुओं पर विचार किया जा रहा है.

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि युगलपीठ द्वारा दी गई यह राहत केवल अंतरिम प्रकृति की है. इसका सीधा संबंध मुख्य सचिव की व्यक्तिगत पेशी से है, जबकि मूल विवाद—यानी कर्मचारियों को उच्च वेतनमान का लाभ दिए जाने का प्रश्न—अभी भी न्यायिक विचाराधीन है. इसलिए आने वाली सुनवाई में इस मामले की दिशा और आगे की प्रक्रिया स्पष्ट होगी.

फिलहाल हाई कोर्ट के ताजा आदेश से राज्य सरकार को तत्काल राहत मिली है, लेकिन कर्मचारियों के उच्च वेतनमान का मुद्दा अभी भी अनिर्णीत बना हुआ है. अब सभी की निगाहें आगामी सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि वर्ष 2017 के न्यायालयीन निर्देशों के पालन और कर्मचारियों के लंबित वैधानिक लाभ के संबंध में आगे क्या कार्रवाई की जाएगी.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-