नई दिल्ली. कक्षा 9 की नई सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में मनुस्मृति के एक श्लोक को शामिल किए जाने को लेकर देशभर में चर्चा तेज हो गई है. इस बीच राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) के पूर्व निदेशक जे. एस. राजपूत ने इस निर्णय का समर्थन करते हुए कहा है कि प्राचीन साहित्य का अध्ययन और समझ आवश्यक है, भले ही उसके कुछ विचार आज के समय में विवादित या अस्वीकार्य माने जाते हों.
पूर्व एनसीईआरटी निदेशक जे. एस. राजपूत ने कहा कि वह मनुस्मृति को विवादित ग्रंथ मानने से सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि विश्व के अनेक प्राचीन ग्रंथों में ऐसे विचार मिलते हैं जिन्हें आधुनिक समाज पूरी तरह स्वीकार नहीं करता, लेकिन इसके बावजूद उनका अध्ययन और शोध जारी रहता है. उन्होंने कहा कि मनुस्मृति का भी वर्षों से विद्वानों द्वारा अध्ययन किया जाता रहा है और इसे केवल विवाद के नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए.
राजपूत ने बताया कि उन्होंने स्वयं मनुस्मृति का अध्ययन किया है, जिसमें वे हिस्से भी शामिल हैं जिन पर अक्सर विवाद होता है. उनके अनुसार इस ग्रंथ में ऐसे अनेक विचार हैं जो उस समय के समाज, शासन और चिंतन को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. उनका मानना है कि किसी भी प्राचीन साहित्य को केवल इसलिए नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि उसके कुछ अंश वर्तमान समय के सामाजिक मूल्यों से मेल नहीं खाते. इतिहास और संस्कृति को समझने के लिए ऐसे ग्रंथों का अध्ययन आवश्यक है.
दरअसल, एनसीईआरटी ने कक्षा 9 की नई सामाजिक विज्ञान की पुस्तक के "1000 ईस्वी तक राज्य और समाज" अध्याय में मनुस्मृति का एक श्लोक उद्धृत किया है. पुस्तक में इस श्लोक का उल्लेख यह दर्शाने के लिए किया गया है कि वैदिक काल में महिलाओं को सम्मानजनक स्थान प्राप्त था. साथ ही पाठ्यपुस्तक में यह भी स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि समय के साथ महिलाओं की सामाजिक स्थिति में उतार-चढ़ाव आया और बाद के कालखंडों में उसमें गिरावट भी दर्ज की गई.
पाठ्यपुस्तक में यह भी बताया गया है कि वैदिक काल में महिलाएं शिक्षा प्राप्त करती थीं, वैदिक अनुष्ठानों में भाग लेती थीं, सार्वजनिक सभाओं में उपस्थित होती थीं तथा ऋग्वेद के अनेक सूक्तों की रचना अपाला, घोषा, विश्ववारा और लोपामुद्रा जैसी महिला ऋषियों द्वारा की गई मानी जाती है. इसी संदर्भ में मनुस्मृति के एक श्लोक का उल्लेख किया गया है, जिसके माध्यम से महिलाओं के सम्मान की परंपरा का संदर्भ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया है.
मनुस्मृति के इस उद्धरण को पाठ्यपुस्तक में शामिल किए जाने के बाद शिक्षा और इतिहास से जुड़े विभिन्न वर्गों में बहस शुरू हो गई है. जहां कुछ लोग इसे भारतीय बौद्धिक और सांस्कृतिक परंपरा को समझने का प्रयास मान रहे हैं, वहीं कुछ वर्ग इस निर्णय पर आपत्ति भी जता रहे हैं. फिलहाल पूर्व एनसीईआरटी निदेशक के समर्थन के बाद यह विषय एक बार फिर राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का केंद्र बन गया है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

