स्वदेशी नेत्रा प्रणाली को मिली पूर्ण युद्धक मंजूरी, डीआरडीओ ने वायुसेना को सौंपा अंतिम परिचालन प्रमाणपत्र

स्वदेशी नेत्रा प्रणाली को मिली पूर्ण युद्धक मंजूरी, डीआरडीओ ने वायुसेना को सौंपा अंतिम परिचालन प्रमाणपत्र

प्रेषित समय :19:37:15 PM / Fri, Jun 26th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को बड़ी मजबूती देते हुए रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने स्वदेशी नेत्रा एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एंड कंट्रोल (एईडब्ल्यू एंड सी) प्रणाली का अंतिम परिचालन स्वीकृति प्रमाणपत्र भारतीय वायुसेना को सौंप दिया है. इस प्रमाणन के साथ ही नेत्रा प्रणाली को पूरी तरह युद्धक अभियानों के लिए तैयार घोषित कर दिया गया है. यह प्रमाणपत्र इस बात की पुष्टि करता है कि प्रणाली सभी आवश्यक सैन्य मानकों पर खरी उतरी है और वास्तविक युद्ध परिस्थितियों में प्रभावी ढंग से कार्य करने में सक्षम है.

बेंगलुरु स्थित डीआरडीओ के सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स में आयोजित समारोह में वायुसेना के उप प्रमुख एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती की मौजूदगी में अंतिम परिचालन स्वीकृति प्रमाणपत्र सौंपा गया. इस अवसर पर रक्षा वैज्ञानिकों और वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारियों ने स्वदेशी रक्षा तकनीक की इस उपलब्धि को देश के लिए महत्वपूर्ण मील का पत्थर बताया.

नेत्रा एईडब्ल्यू एंड सी प्रणाली आधुनिक सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक स्कैनिंग एरे रडार, इलेक्ट्रॉनिक निगरानी प्रणाली, सुरक्षित संचार नेटवर्क, सॉफ्टवेयर आधारित रेडियो, डेटा लिंक और स्व-सुरक्षा इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली जैसी अत्याधुनिक तकनीकों से लैस है. इन सभी प्रणालियों को एक विशेष रूप से संशोधित विमान पर एकीकृत किया गया है, जिससे यह दुश्मन की गतिविधियों पर लंबी दूरी तक नजर रखने और वायुसेना को वास्तविक समय में महत्वपूर्ण सूचनाएं उपलब्ध कराने में सक्षम बनती है.

नेत्रा परियोजना की शुरुआत वर्ष 2003 में भारतीय वायुसेना और डीआरडीओ द्वारा संयुक्त रूप से की गई थी. केंद्र सरकार की स्वीकृति मिलने के बाद सेंटर फॉर एयरबोर्न सिस्टम्स को इस परियोजना का प्रमुख संस्थान बनाया गया. इसके अलावा डीआरडीओ की अन्य प्रयोगशालाओं ने भी रडार, संचार प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली और डेटा लिंक जैसी तकनीकों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया.

इस परियोजना के लिए ब्राजील की कंपनी एम्ब्रेयर से तीन ईआरजे-145 विमान प्राप्त किए गए, जिन्हें सैन्य आवश्यकताओं के अनुरूप व्यापक रूप से संशोधित किया गया. इनमें हवा में ईंधन भरने की क्षमता, उपग्रह संचार प्रणाली, उन्नत एवियोनिक्स, विद्युत प्रणाली में सुधार तथा संरचनात्मक और वायुगतिकीय परिवर्तन किए गए. पहला नेत्रा विमान वर्ष 2017 में भारतीय वायुसेना को सौंपा गया था, जबकि दूसरा और तीसरा विमान क्रमशः वर्ष 2019 और 2023 में शामिल किए गए.

नेत्रा मार्क-1 में स्वदेशी रूप से विकसित सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक स्कैनिंग एरे रडार लगाया गया है, जो लगभग 240 डिग्री तक निगरानी करने और 250 से 300 किलोमीटर की दूरी तक लक्ष्य का पता लगाने में सक्षम है. यह प्रणाली अंतरराष्ट्रीय सीमा पार किए बिना शत्रु क्षेत्र के भीतर की गतिविधियों पर भी निगरानी रख सकती है. इसके अलावा इसमें द्वितीयक निगरानी रडार, इलेक्ट्रॉनिक प्रतिरोधक प्रणाली, सुरक्षित वॉयस संचार तथा दृष्टि सीमा और उससे आगे तक डेटा साझा करने की आधुनिक व्यवस्था भी उपलब्ध है. हवा में ईंधन भरने की सुविधा के कारण इसकी उड़ान अवधि आठ घंटे से अधिक तक बढ़ाई जा सकती है.

भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो गया है जिन्होंने इस श्रेणी की एयरबोर्न अर्ली वार्निंग एवं नियंत्रण प्रणाली का स्वदेशी विकास किया है. रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह प्रणाली भारतीय वायुसेना की निगरानी क्षमता, हवाई संचालन और नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणाली को नई मजबूती प्रदान करेगी.

नेत्रा प्रणाली पहले भी कई महत्वपूर्ण सैन्य अभियानों में अपनी उपयोगिता साबित कर चुकी है. वर्ष 2019 के बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान इसने हवाई निगरानी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी. इसके बाद पाकिस्तान के एफ-16 लड़ाकू विमानों की गतिविधियों की समय रहते जानकारी देकर भारतीय लड़ाकू विमानों को सतर्क करने में भी यह प्रणाली प्रभावी रही. वर्ष 2020 में भारत-चीन सीमा पर तनाव के दौरान भी नेत्रा को तैनात किया गया था. वहीं मई 2025 में संचालित ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी इसके परीक्षण संस्करण का सफलतापूर्वक परिचालन किया गया.

समारोह को संबोधित करते हुए एयर मार्शल अवधेश कुमार भारती ने कहा कि स्वदेशी रक्षा प्रणालियां भारतीय सशस्त्र बलों को आवश्यकता के अनुसार तकनीकी बदलाव और उन्नयन की स्वतंत्रता प्रदान करती हैं, जो आयातित प्रणालियों में आसानी से संभव नहीं होती. वहीं डीआरडीओ के इलेक्ट्रॉनिक्स समूह के महानिदेशक डॉ. बी. के. दास ने कहा कि नेत्रा एईडब्ल्यू एंड सी कार्यक्रम वैज्ञानिक संस्थानों, रक्षा उत्पादन इकाइयों और भारतीय वायुसेना के समन्वित प्रयासों का उत्कृष्ट उदाहरण है तथा यह भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ी उपलब्धि है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-