अहमदाबाद. गुजरात हाई कोर्ट ने धनशोधन और कथित भूमि उपयोग परिवर्तन रिश्वतखोरी मामले में निलंबित आईएएस अधिकारी राजेंद्रकुमार पटेल की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी है. न्यायालय ने कहा कि प्रथम दृष्टया उपलब्ध साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि आरोपी की कथित भूमिका की गंभीरता को देखते हुए इस स्तर पर राहत नहीं दी जा सकती. अदालत ने यह भी माना कि धनशोधन जैसे आर्थिक अपराध देश की आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था को प्रभावित करते हैं, इसलिए ऐसे मामलों में जमानत पर विचार करते समय अलग दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है.
न्यायमूर्ति हसमुख डी. सुथार की एकलपीठ ने 29 जून को पारित अपने विस्तृत आदेश में कहा कि आरोपी धनशोधन निवारण अधिनियम के तहत जमानत के लिए निर्धारित कानूनी शर्तों को पूरा करने में सफल नहीं रहे. अदालत ने माना कि उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर इस स्तर पर यह मानने के पर्याप्त आधार नहीं हैं कि आरोपी प्रथम दृष्टया निर्दोष हैं.
प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार वर्ष 2015 बैच के आईएएस अधिकारी राजेंद्रकुमार पटेल फरवरी 2025 से सुरेंद्रनगर के कलेक्टर के रूप में पदस्थ थे. जांच एजेंसी का आरोप है कि उनके कार्यकाल के दौरान भूमि उपयोग परिवर्तन संबंधी आवेदनों के निस्तारण में एक संगठित रिश्वतखोरी नेटवर्क संचालित किया गया. एजेंसी का दावा है कि इस कथित नेटवर्क के माध्यम से रिश्वत की राशि का बंटवारा तय अनुपात में किया जाता था और इसमें कलेक्टर सहित अन्य अधिकारियों की भूमिका सामने आई है.
जांच एजेंसी ने अदालत को बताया कि आरोपी के कार्यकाल में 501 भूमि उपयोग परिवर्तन आवेदनों का निस्तारण किया गया, जिनसे कथित रूप से प्राप्त अवैध धन में आरोपी का हिस्सा लगभग 3.12 करोड़ रुपये आंका गया है. एजेंसी के अनुसार जांच के दौरान डिजिटल साक्ष्य भी एकत्र किए गए हैं, जिनमें आरोपी के ई-मेल खाते से लगभग 800 भूमि उपयोग परिवर्तन फाइलों और संबंधित दस्तावेजों के छायाचित्र मिलने का दावा किया गया है.
प्रवर्तन निदेशालय ने यह भी आरोप लगाया कि विभिन्न श्रेणी के आवेदनों के लिए प्रति वर्गमीटर के हिसाब से रिश्वत की दरें पहले से तय थीं. जांच के अनुसार कथित रूप से प्राप्त राशि का 50 प्रतिशत हिस्सा कलेक्टर, 25 प्रतिशत अतिरिक्त कलेक्टर तथा शेष राशि अन्य संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों में बांटी जाती थी. एजेंसी ने इस संबंध में कथित हिसाब-किताब की पर्चियां, डिजिटल रिकॉर्ड और धनशोधन अधिनियम के तहत दर्ज बयानों का भी हवाला दिया.
मामले की शुरुआत दिसंबर 2025 में उप मामलतदार चंद्रसिंह मोरी के आवास पर हुई प्रवर्तन निदेशालय की तलाशी से हुई थी. जांच एजेंसी के अनुसार वहां से 67.50 लाख रुपये नकद और कथित हिसाब-किताब से जुड़े दस्तावेज बरामद किए गए. इसी जानकारी के आधार पर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो ने राजेंद्रकुमार पटेल सहित अन्य अधिकारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार का प्रकरण दर्ज किया.
अदालत ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि जांच एजेंसी ने दावा किया है कि छापेमारी से एक दिन पहले आरोपी ने अपने मोबाइल फोन को रीसेट करने से संबंधित जानकारी इंटरनेट पर खोजी थी. एजेंसी ने इसे संभावित डिजिटल साक्ष्यों से छेड़छाड़ का प्रयास बताया, जिसे अदालत ने प्रथम दृष्टया गंभीर माना.
प्रवर्तन निदेशालय ने आगे आरोप लगाया कि आरोपी की पत्नी के नाम पर एक व्यावसायिक दुकान खरीदी गई, जिसमें पंजीयन दस्तावेज में केवल नौ लाख रुपये दर्शाए गए जबकि शेष राशि नकद दी गई. इसके अलावा पत्नी के लिए आभूषण खरीदने, परिवार के बैंक खातों के माध्यम से धन के लेन-देन और आयकर संबंधी सीमा से नीचे रहने के उद्देश्य से कई बार 49-49 हजार रुपये नकद जमा कराने के आरोप भी जांच का हिस्सा हैं.
जांच एजेंसी ने यह भी दावा किया कि एक अधिवक्ता ने अपने बयान में स्वीकार किया है कि भूमि उपयोग परिवर्तन की स्वीकृति दिलाने के लिए निर्धारित दरों के अनुसार रिश्वत की राशि संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाई गई. आरोप है कि जब तक कथित रिश्वत नहीं दी जाती थी, तब तक आवेदनों पर आपत्तियां लगाकर प्रक्रिया को लंबित रखा जाता था.
बचाव पक्ष ने अदालत में तर्क दिया कि भ्रष्टाचार के मूल मामले में अब तक आरोपपत्र प्रस्तुत नहीं किया गया है और आरोपी को उस मामले में गिरफ्तार भी नहीं किया गया. यह भी कहा गया कि आरोपी के निवास से कोई आपत्तिजनक सामग्री बरामद नहीं हुई तथा अधिकांश आरोप सह-आरोपियों के बयानों पर आधारित हैं. बचाव पक्ष ने घुटने की गंभीर चोट का हवाला देते हुए चिकित्सकीय आधार पर भी जमानत की मांग की.
हालांकि अदालत ने इन दलीलों को स्वीकार नहीं किया. न्यायालय ने कहा कि धनशोधन का अपराध स्वतंत्र प्रकृति का है और केवल इस आधार पर कि मूल मामले में आरोपपत्र दाखिल नहीं हुआ है, जमानत नहीं दी जा सकती. अदालत ने यह भी माना कि जिला कलेक्टर के रूप में अंतिम स्वीकृति देने का अधिकार आरोपी के पास था, इसलिए उनकी भूमिका अन्य अधिकारियों से अलग और अधिक महत्वपूर्ण थी.
घुटने की चोट संबंधी दलील पर भी अदालत ने कहा कि केवल चिकित्सकीय कारणों से नियमित जमानत देने का आधार नहीं बनता. यदि भविष्य में शल्य चिकित्सा की आवश्यकता होती है तो आरोपी कानून के अनुसार अलग से उचित राहत प्राप्त कर सकते हैं.
अपने आदेश में अदालत ने टिप्पणी की कि जिला प्रशासन के प्रमुख अधिकारी होने के नाते आवेदक से ईमानदारी, निष्पक्षता और जनहित में कार्य करने की अपेक्षा थी, लेकिन उपलब्ध सामग्री प्रथम दृष्टया इसके विपरीत संकेत देती है. इन सभी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए गुजरात हाई कोर्ट ने निलंबित आईएएस अधिकारी राजेंद्रकुमार पटेल की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

