स्वामित्व योजना में बड़ी चूक से बढ़ी चिंता, अधूरे अधिकार पत्रों से हजारों ग्रामीणों की रजिस्ट्री पर संकट

स्वामित्व योजना में बड़ी चूक से बढ़ी चिंता, अधूरे अधिकार पत्रों से हजारों ग्रामीणों की रजिस्ट्री पर संकट

प्रेषित समय :19:55:38 PM / Sun, Jul 12th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

इंदौर. प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी स्वामित्व योजना के तहत ग्रामीण परिवारों को आबादी भूमि का कानूनी स्वामित्व देने की प्रक्रिया अंतिम चरण में पहुंच रही है, लेकिन इंदौर जिले में सामने आई गंभीर खामियों ने इस पूरी कवायद पर सवाल खड़े कर दिए हैं. ड्रोन सर्वे, ग्राउंड ट्रुथिंग और दावे-आपत्ति जैसी प्रक्रियाओं के बावजूद बड़ी संख्या में जारी किए गए स्वामित्व अधिकार पत्रों और कम्प्यूटरीकृत खसरों में संपत्ति धारकों की जानकारी अधूरी दर्ज होने से भविष्य में रजिस्ट्री, स्वामित्व विवाद और कानूनी प्रक्रियाओं में बड़ी परेशानियां आने की आशंका जताई जा रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन त्रुटियों का सुधार नहीं किया गया तो सरकार की यह महत्वपूर्ण योजना ग्रामीणों को राहत देने के बजाय नए विवादों का कारण बन सकती है.

स्वामित्व योजना का उद्देश्य गांवों की आबादी भूमि पर वर्षों से निवास कर रहे परिवारों को कानूनी रूप से संपत्ति का मालिकाना हक प्रदान करना है. इसके लिए ड्रोन तकनीक के माध्यम से गांवों का विस्तृत सर्वे कराया गया, नक्शे तैयार किए गए और प्रत्येक संपत्ति का रिकॉर्ड डिजिटल स्वरूप में दर्ज किया गया. इसके बाद ग्राउंड ट्रुथिंग और दावे-आपत्ति की प्रक्रिया भी पूरी कराई गई, ताकि रिकॉर्ड में किसी प्रकार की त्रुटि न रहे. लेकिन इंदौर जिले में सामने आए मामलों से पता चला है कि अनेक अधिकार पत्रों में केवल संपत्ति धारक का नाम दर्ज है, जबकि पिता का नाम, पति का नाम, उपनाम, पूरा पता और अन्य आवश्यक पहचान संबंधी विवरण दर्ज ही नहीं किए गए हैं.

जानकारों का कहना है कि किसी भी संपत्ति संबंधी दस्तावेज में व्यक्ति की स्पष्ट पहचान सबसे महत्वपूर्ण होती है. यदि केवल नाम लिखा हो और अन्य पहचान संबंधी विवरण न हों, तो भविष्य में वास्तविक स्वामी की पहचान करना कठिन हो सकता है. यही स्थिति रजिस्ट्री के दौरान सबसे बड़ी चुनौती बन सकती है, क्योंकि आधार कार्ड, समग्र आईडी या अन्य दस्तावेजों से मिलान करने में भी कठिनाई आएगी. ऐसी स्थिति में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा गलत तरीके से संपत्ति पर दावा करने या दस्तावेजों का दुरुपयोग करने की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता.

जानकारी के अनुसार इंदौर जिले में स्वामित्व योजना के तहत कुल 522 गांवों में सर्वे का लक्ष्य निर्धारित किया गया था. इनमें 541 गांवों में सर्वे का कार्य पूरा बताया गया है, जबकि शेष गांवों में प्रक्रिया जारी है. हालांकि सर्वे पूरा होने और अधिकार पत्र जारी होने के बावजूद रिकॉर्ड में कई प्रकार की विसंगतियां सामने आ रही हैं. कई गांवों में एक ही परिवार की अलग-अलग संपत्तियों को एक साथ दर्ज कर दिया गया है, तो कहीं दो भाइयों की संयुक्त संपत्ति में केवल एक सदस्य का नाम दर्ज है. कई ऐसे परिवार भी सामने आए हैं जिनके सदस्य शहरों में रहते हैं, लेकिन उनका नाम रिकॉर्ड में शामिल ही नहीं किया गया.

स्वामित्व योजना के तहत संपत्ति धारकों का डाटा समग्र पोर्टल से लिया गया था. इसके बाद दावे और आपत्तियां दर्ज कराने का अवसर भी दिया गया, लेकिन अनेक मामलों में त्रुटियों का सुधार नहीं हो सका. परिणामस्वरूप अब वही अधूरी जानकारी अंतिम अधिकार पत्रों और कम्प्यूटरीकृत खसरों का हिस्सा बन गई है. इससे ग्रामीणों के सामने भविष्य में अपनी ही संपत्ति पर अधिकार साबित करने की चुनौती खड़ी हो सकती है.

तिल्लौर खुर्द गांव का उदाहरण इस समस्या की गंभीरता को स्पष्ट करता है. यहां अधिकार पत्रों में दो महिलाओं का नाम केवल "अनिता" दर्ज है. न तो उनके पिता या पति का नाम दर्ज किया गया है और न ही उपनाम. दोनों के प्लॉट और ब्लॉक नंबर अलग-अलग हैं, लेकिन केवल नाम के आधार पर यह तय करना कठिन होगा कि कौन-सी संपत्ति किस अनिता की है. इसी प्रकार एक ही गांव में दो "शोरमबाई" का नाम भी बिना किसी अतिरिक्त पहचान के दर्ज है. ऐसे मामलों में भविष्य में रजिस्ट्री, नामांतरण या न्यायालयीन विवाद की स्थिति बनने की पूरी संभावना है.

सरकार ने हाल ही में निर्णय लिया है कि स्वामित्व अधिकार पत्र प्राप्त करने वाले ग्रामीण परिवारों की संपत्तियों की रजिस्ट्री निशुल्क कराई जाएगी. इसके लिए तहसीलदार और नायब तहसीलदारों को उप-पंजीयक के अधिकार भी प्रदान किए गए हैं. संभावना है कि अगस्त माह से रजिस्ट्री की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी. लेकिन यदि दस्तावेजों में नाम और पहचान अधूरी रही तो रजिस्ट्री के समय संबंधित व्यक्ति अपनी पहचान कैसे स्थापित करेगा, यह सबसे बड़ा प्रश्न बन गया है. विशेषज्ञों का कहना है कि केवल नाम के आधार पर किसी भी संपत्ति का पंजीयन करना भविष्य में गंभीर कानूनी विवादों को जन्म दे सकता है.

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रमोद कुमार द्विवेदी का कहना है कि अधिकार पत्रों में अधूरी जानकारी भविष्य में फर्जीवाड़े, संपत्ति विवाद और लंबी कानूनी उलझनों का कारण बन सकती है. उनका कहना है कि जब सरकार ने आधुनिक ड्रोन तकनीक और ग्राउंड ट्रुथिंग जैसी वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाई, तब रिकॉर्ड तैयार करते समय इतनी बड़ी लापरवाही नहीं होनी चाहिए थी. उनके अनुसार रजिस्ट्री शुरू होने से पहले सभी रिकॉर्ड का पुनः सत्यापन कराया जाना चाहिए और जहां भी त्रुटियां हैं, उन्हें तत्काल सुधारा जाना आवश्यक है.

हालांकि जिला प्रशासन का कहना है कि यदि किसी अधिकार पत्र या भू-अभिलेख में त्रुटि है तो उसके सुधार का कानूनी प्रावधान उपलब्ध है. इंदौर कलेक्टर शिवम वर्मा के अनुसार संपत्ति धारक निर्धारित प्रक्रिया के तहत आवेदन देकर अपने दस्तावेजों में सुधार करा सकते हैं. प्रशासन का दावा है कि पात्र व्यक्तियों की समस्याओं का समाधान नियमानुसार किया जाएगा, ताकि भविष्य में किसी प्रकार की असुविधा न हो.

फिर भी ग्रामीणों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि रजिस्ट्री प्रक्रिया शुरू होने से पहले रिकॉर्ड का व्यापक सत्यापन किया जाना अधिक प्रभावी होगा. यदि अधूरी जानकारी के साथ ही रजिस्ट्री की प्रक्रिया आगे बढ़ती है तो हजारों परिवारों को दस्तावेजी पहचान, स्वामित्व विवाद, नामांतरण और न्यायालयीन प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ सकता है. ऐसे में स्वामित्व योजना का मूल उद्देश्य, यानी ग्रामीणों को सुरक्षित और निर्विवाद संपत्ति अधिकार प्रदान करना, प्रभावित हो सकता है. अब सभी की नजर प्रशासन पर है कि वह इन त्रुटियों को कितनी तेजी और प्रभावी ढंग से दूर कर योजना को विवादों से बचाने में सफल होता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-