देहरादून. उत्तराखंड हाईकोर्ट ने नशे में वाहन चलाने से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल किसी व्यक्ति के मुंह से शराब की गंध आने मात्र से यह साबित नहीं किया जा सकता कि वह शराब के नशे में वाहन चला रहा था. अदालत ने स्पष्ट किया कि नशे में ड्राइविंग का आरोप तभी सिद्ध माना जाएगा, जब रक्त परीक्षण (ब्लड टेस्ट) या ब्रीथ एनालाइजर जांच जैसी वैज्ञानिक जांच से यह प्रमाणित हो कि चालक के शरीर में शराब की मात्रा मोटर वाहन अधिनियम, 1988 में निर्धारित सीमा से अधिक थी.
न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ ने बुधवार को एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका की सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. अदालत ने सत्र न्यायालय के उस आदेश को आंशिक रूप से निरस्त कर दिया, जिसमें आरोपी अमर सिंह के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 105 (गैर इरादतन हत्या), धारा 125(ए), 125(बी) तथा धारा 281 के तहत आरोप तय किए गए थे.
मामला बदरीनाथ धाम से चमोली की ओर जा रही एक जीप दुर्घटना से जुड़ा है. हादसे के दौरान जीप अनियंत्रित होकर पलट गई थी, जिसमें एक यात्री की मौत हो गई थी, जबकि कई अन्य घायल हो गए थे. दुर्घटना के बाद चालक अमर सिंह का चिकित्सकीय परीक्षण कराया गया, जिसमें डॉक्टर ने उसकी सांस से शराब की गंध आने का उल्लेख किया था. हालांकि पुलिस ने न तो उसका ब्लड सैंपल लिया और न ही ब्रीथ एनालाइजर टेस्ट कराया.
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में दलील दी गई कि मोटर वाहन अधिनियम की धारा 185 के अनुसार किसी व्यक्ति को नशे में वाहन चलाने का दोषी तभी ठहराया जा सकता है, जब वैज्ञानिक जांच में उसके रक्त में प्रति 100 मिलीलीटर में 30 मिलीग्राम से अधिक अल्कोहल की पुष्टि हो. बचाव पक्ष ने यह भी तर्क दिया कि दुर्घटना चालक की लापरवाही से नहीं, बल्कि जीप का अगला टायर फट जाने के कारण हुई थी.
सभी तथ्यों और उपलब्ध साक्ष्यों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि जांच के दौरान ऐसा कोई वैज्ञानिक प्रमाण प्रस्तुत नहीं किया गया, जिससे यह साबित हो सके कि चालक कानूनन निर्धारित सीमा से अधिक नशे की हालत में था. इसलिए केवल शराब की गंध के आधार पर गैर इरादतन हत्या जैसी गंभीर धारा के तहत आरोप तय नहीं किए जा सकते. हालांकि अदालत ने स्पष्ट किया कि लापरवाही और तेज गति से वाहन चलाने से संबंधित भारतीय न्याय संहिता की धारा 125(ए), 125(बी) और 281 के तहत लगाए गए आरोप यथावत बने रहेंगे. यह फैसला नशे में वाहन चलाने से जुड़े मामलों में वैज्ञानिक साक्ष्यों के महत्व को रेखांकित करने वाला महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय माना जा रहा है.
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