ग्वालियर. मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने एक ही गोत्र में विवाह करने वाले एक दंपती को अंतरिम राहत देते हुए जरूरत पड़ने पर पुलिस सुरक्षा उपलब्ध कराने के निर्देश दिए हैं. मामला उस कथित सामाजिक बहिष्कार से जुड़ा है, जिसमें एक स्थानीय सामाजिक संगठन द्वारा दंपती और उनके परिवार के खिलाफ कार्रवाई किए जाने का आरोप लगाया गया है. जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करते हुए राज्य सरकार से भी जवाब मांगा है.
डिवीजन बेंच ने अपने अंतरिम आदेश में कहा कि प्रतिवादी क्रमांक 9 से 16 को प्रक्रिया शुल्क जमा होने के बाद सात कार्य दिवस के भीतर नोटिस जारी किए जाएं और वे छह सप्ताह के भीतर अपना जवाब प्रस्तुत करें. अदालत ने राज्य की ओर से पेश अधिवक्ता को भी जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया. साथ ही स्पष्ट किया कि यदि अपीलकर्ताओं को किसी प्रकार से परेशान किया जाता है और उन्हें पुलिस सुरक्षा की आवश्यकता होती है, तो संबंधित पुलिस अधिकारी कानून के अनुसार उचित सुरक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करें.
दंपती ने हाईकोर्ट में दायर अपनी रिट अपील में बताया कि उन्होंने विवाह से पहले अपनी वंशावली की दस पीढ़ियों तक जांच कराई थी ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि उनके बीच कोई साझा रक्त संबंध नहीं है. उनका कहना है कि साझा रक्त संबंध नहीं होने के कारण उनका विवाह हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 के प्रावधानों के अनुरूप वैध है. याचिका के अनुसार इससे पहले उन्होंने इसी मामले में एक रिट याचिका दायर की थी, जिसे सिंगल जज ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मामले में विवादित तथ्यों का प्रश्न शामिल है.
अपील में दंपती ने आरोप लगाया है कि विवाह के बाद उन्हें और उनके परिवार को संबंधित सामाजिक संगठन के पदाधिकारियों द्वारा लगातार परेशान किया जा रहा है. याचिका के अनुसार संगठन की ओर से पारित प्रस्तावों में दंपती और उनके परिवार का 11 वर्षों तक सामाजिक बहिष्कार करने, परिवारों पर 51 हजार रुपये का आर्थिक दंड लगाने तथा विवाह समारोह में शामिल होने वाले प्रत्येक व्यक्ति पर 2,100 रुपये का जुर्माना लगाने का उल्लेख किया गया. दंपती का कहना है कि ये निर्णय उन्हें सुनवाई का अवसर दिए बिना और उनके विवाह की कानूनी वैधता पर विचार किए बिना पारित किए गए.
याचिका में यह भी दावा किया गया है कि संगठन ने लोगों को चेतावनी दी थी कि यदि वे विवाह समारोह में शामिल होंगे तो उनका भी सामाजिक बहिष्कार किया जाएगा. दंपती ने यह भी कहा कि उन्होंने इस संबंध में पुलिस विभाग को कई बार शिकायतें दीं, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई.
अपील में यह महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न भी उठाया गया है कि क्या कोई जाति, समुदाय या सामाजिक संगठन कानूनी रूप से वैध विवाह करने वाले बालिगों और उनके परिवारों के विरुद्ध सामाजिक बहिष्कार, आर्थिक दंड या अन्य प्रकार की बाध्यकारी कार्रवाई कर सकता है. इसके साथ ही यह मुद्दा भी उठाया गया कि यदि राज्य के अधिकारी ऐसी कार्रवाइयों को रोकने में विफल रहते हैं, जिससे संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 के तहत प्राप्त मौलिक अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो क्या संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट का हस्तक्षेप उचित होगा.
दलीलें सुनने के बाद डिवीजन बेंच ने राज्य सरकार, बड़वानी के पुलिस अधीक्षक, जिला महिला सशक्तिकरण अधिकारी तथा संबंधित सामाजिक संगठन के पदाधिकारियों को नोटिस जारी करते हुए मामले की आगे की सुनवाई निर्धारित की है. यह मामला N v State of Madhya Pradesh, WA No. 2494 of 2026 के रूप में विचाराधीन है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

