भोपाल गैस त्रासदी मामले में हाई कोर्ट सख्त, यूनियन कार्बाइड क्षेत्र के भूजल की होगी नई वैज्ञानिक जांच

भोपाल गैस त्रासदी मामले में हाई कोर्ट सख्त, यूनियन कार्बाइड क्षेत्र के भूजल की होगी नई वैज्ञानिक जांच

प्रेषित समय :16:31:35 PM / Thu, Jul 23rd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जबलपुर. भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े पर्यावरणीय और जनस्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर सुनवाई करते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने यूनियन कार्बाइड संयंत्र के आसपास के भूजल की स्थिति को लेकर महत्वपूर्ण निर्देश जारी किए हैं. अदालत ने परिसर और उसके आसपास भूजल अब भी दूषित होने के आरोपों को गंभीरता से लेते हुए मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मंडल (एमपीपीसीबी) को विशेषज्ञ समिति गठित कर मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला से स्वतंत्र एवं वैज्ञानिक जांच कराने का आदेश दिया है. हाई कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि भूजल की वास्तविक स्थिति का पता केवल निष्पक्ष वैज्ञानिक परीक्षण से ही लगाया जा सकता है. अदालत ने जांच रिपोर्ट 13 अगस्त तक प्रस्तुत करने के निर्देश दिए हैं, जबकि मामले की अगली सुनवाई 3 सितंबर को निर्धारित की गई है.

यह आदेश न्यायमूर्ति विवेक अग्रवाल और न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने वर्ष 2004 से लंबित जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिया. यह जनहित याचिका स्वर्गीय आलोक प्रताप सिंह द्वारा दायर की गई थी, जिसमें भोपाल गैस त्रासदी के बाद पर्यावरणीय प्रभावों और प्रभावित क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों का मुद्दा उठाया गया था. दो दशक से अधिक समय से लंबित इस मामले में हाई कोर्ट लगातार पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों और प्रदूषण नियंत्रण से जुड़े पहलुओं की निगरानी कर रहा है.

सुनवाई के दौरान हस्तक्षेपकर्ताओं ने न्यायालय के समक्ष कहा कि यूनियन कार्बाइड परिसर से जहरीले अपशिष्ट के निष्पादन की प्रक्रिया पूरी होने के बावजूद आसपास के कई वार्डों में भूजल दूषित होने की शिकायतें अब भी लगातार मिल रही हैं. उनका कहना था कि प्रभावित क्षेत्रों के निवासी वर्षों से दूषित पानी के उपयोग को लेकर चिंतित हैं और इससे स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर खतरा बना हुआ है. हस्तक्षेपकर्ताओं ने अदालत से स्वतंत्र एजेंसी के माध्यम से वैज्ञानिक परीक्षण कराने का अनुरोध किया, ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके.

इन दलीलों पर विचार करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि भूजल प्रदूषण जैसे संवेदनशील विषय पर केवल दावों या आशंकाओं के आधार पर निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता. यदि आसपास के क्षेत्रों में प्रदूषण के आरोप लगाए जा रहे हैं तो उनकी पुष्टि अथवा खंडन वैज्ञानिक परीक्षण से ही संभव है. इसी कारण अदालत ने एमपीपीसीबी को निर्देश दिया कि विशेषज्ञों की समिति गठित कर मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला से विभिन्न स्थानों के भूजल नमूनों की जांच कराई जाए और विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाए.

अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि जांच प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष, पारदर्शी और वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप होनी चाहिए. विशेषज्ञ समिति यह सुनिश्चित करेगी कि नमूने निर्धारित प्रक्रिया के तहत एकत्र किए जाएं और उनकी जांच मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में कराई जाए. रिपोर्ट में यह भी स्पष्ट किया जाए कि यदि किसी क्षेत्र में प्रदूषण पाया जाता है तो उसका स्तर क्या है और उससे स्थानीय आबादी पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ सकता है.

भोपाल गैस त्रासदी विश्व की सबसे बड़ी औद्योगिक दुर्घटनाओं में गिनी जाती है. वर्ष 1984 में हुई इस त्रासदी के बाद हजारों लोगों की जान गई थी और बड़ी संख्या में लोग गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से प्रभावित हुए थे. इसके बाद से यूनियन कार्बाइड संयंत्र परिसर में मौजूद रासायनिक अपशिष्ट और उससे संभावित पर्यावरणीय प्रदूषण को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं. विशेष रूप से भूजल प्रदूषण का मुद्दा लंबे समय से न्यायालय और विभिन्न सरकारी एजेंसियों के समक्ष विचाराधीन रहा है.

सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता खालिद नूर फखरुद्दीन ने पक्ष रखा. उन्होंने अदालत को बताया कि प्रभावित क्षेत्रों के लोगों की ओर से लगातार शिकायतें मिल रही हैं और कई स्थानों पर भूजल की गुणवत्ता को लेकर गंभीर चिंताएं बनी हुई हैं. दूसरी ओर मध्य प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण मंडल की ओर से अधिवक्ता सिद्धार्थ सेठ ने न्यायालय के समक्ष मंडल का पक्ष प्रस्तुत किया.

हाई कोर्ट ने निर्देश दिया कि एमपीपीसीबी विशेषज्ञ समिति का गठन कर जल्द से जल्द नमूने एकत्र करने की प्रक्रिया शुरू करे और वैज्ञानिक परीक्षण पूरा कर 13 अगस्त तक अपनी विस्तृत रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करे. रिपोर्ट प्राप्त होने के बाद अदालत यह तय करेगी कि आगे किन अतिरिक्त कदमों की आवश्यकता है और यदि भूजल प्रदूषण की पुष्टि होती है तो प्रभावित क्षेत्रों के लोगों की सुरक्षा तथा पर्यावरण संरक्षण के लिए क्या निर्देश जारी किए जाएं.

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई 3 सितंबर को निर्धारित की है. उस दिन विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट के आधार पर पूरे मामले की समीक्षा की जाएगी और आवश्यकता पड़ने पर आगे के निर्देश जारी किए जाएंगे. हाई कोर्ट के इस आदेश को भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े पर्यावरणीय मुद्दों की निगरानी की दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है. अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया है कि जनस्वास्थ्य और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े मामलों में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी और वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए वैज्ञानिक एवं निष्पक्ष जांच को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-