अनिल मिश्र/पटना. बिहार विधानसभा के मानसून सत्र में शुक्रवार को उस समय राजनीतिक और सामाजिक बहस तेज हो गई, जब राज्य सरकार ने स्पष्ट कर दिया कि सरकारी दस्तावेजों, जाति प्रमाण पत्रों और अन्य आधिकारिक अभिलेखों में "भूमिहार ब्राह्मण" के स्थान पर केवल "भूमिहार" शब्द ही दर्ज किया जाएगा. सरकार के इस रुख का विरोध विपक्ष के साथ-साथ सत्ता पक्ष के कुछ भाजपा विधायकों ने भी किया, जिसके कारण सदन में तीखी नोकझोंक और गहमागहमी का माहौल बन गया. सरकार का कहना है कि जाति के नाम के साथ "ब्राह्मण" शब्द जोड़ने से प्रशासनिक भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है, जबकि विरोध करने वाले विधायकों का तर्क है कि ऐतिहासिक दस्तावेजों और पुराने सरकारी अभिलेखों में "भूमिहार ब्राह्मण" का उल्लेख मिलता रहा है, इसलिए रिकॉर्ड में एकरूपता बनाए रखना आवश्यक है.
मामला उस समय चर्चा का केंद्र बना जब दरभंगा जिले के जाले विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक जीवेश कुमार उर्फ जीवेश मिश्रा ने ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के माध्यम से यह मुद्दा सदन में उठाया. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के पुराने गजट, राजस्व अभिलेखों और कई ऐतिहासिक सरकारी दस्तावेजों में संबंधित समुदाय का उल्लेख "भूमिहार ब्राह्मण" के रूप में किया गया है, जबकि वर्तमान में जारी किए जा रहे जाति प्रमाण पत्रों और राज्य सरकार की जाति सूची में केवल "भूमिहार" लिखा जा रहा है. उनके अनुसार, इस अंतर के कारण विभिन्न सरकारी दस्तावेजों में विसंगति पैदा हो रही है, जिससे नागरिकों को भविष्य में प्रशासनिक और कानूनी कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है.
इस मुद्दे पर जवाब देते हुए बिहार के उपमुख्यमंत्री एवं सामान्य प्रशासन विभाग के मंत्री विजेंद्र प्रसाद यादव ने सरकार का पक्ष स्पष्ट किया. उन्होंने कहा कि राज्य सरकार के सरकारी अभिलेखों में केवल "भूमिहार" शब्द ही दर्ज किया जाएगा और "भूमिहार ब्राह्मण" शब्द का उपयोग नहीं किया जाएगा. उन्होंने बताया कि उच्च जाति आयोग द्वारा पूर्व में जारी दिशा-निर्देशों के अनुसार सवर्ण वर्ग में चार अलग-अलग जातियों का उल्लेख किया गया है, जिनमें ब्राह्मण, राजपूत, भूमिहार और कायस्थ शामिल हैं. आयोग ने इन सभी को स्वतंत्र जातीय पहचान के रूप में स्वीकार किया है, इसलिए "भूमिहार" के साथ "ब्राह्मण" जोड़ने का कोई औचित्य नहीं है और सरकार इस विषय पर अपने निर्णय में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं करेगी.
उपमुख्यमंत्री ने सदन में यह भी बताया कि वर्ष 2025 में विभिन्न सामाजिक संगठनों की ओर से प्राप्त आवेदनों के बाद सामान्य प्रशासन विभाग ने उच्च जाति आयोग से इस संबंध में विस्तृत राय मांगी थी. आयोग ने अपने जवाब में स्पष्ट किया कि जनवरी 2025 में हुई बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया था कि "भूमिहार" जाति के नाम में किसी प्रकार का परिवर्तन करने अथवा "भूमिहार ब्राह्मण" शब्द को सरकारी रूप से स्वीकार करने की कोई अनुशंसा नहीं की गई है. इसलिए राज्य सरकार वर्तमान व्यवस्था को ही लागू रखेगी.
सरकार के इस जवाब से भाजपा विधायक संतुष्ट नहीं दिखे. जीवेश मिश्रा ने सदन में कहा कि उनके मूल प्रश्न का उत्तर नहीं दिया गया और सरकार ने केवल आयोग के निर्णय का हवाला देकर विषय को समाप्त करने का प्रयास किया है. उनका कहना था कि यदि 1931 की जनगणना सहित अनेक पुराने राजस्व रिकॉर्ड और सरकारी दस्तावेजों में "भूमिहार ब्राह्मण" दर्ज है तो वर्तमान दस्तावेजों में अलग शब्दावली अपनाने से भ्रम उत्पन्न होना स्वाभाविक है. उन्होंने सरकार से इस विषय पर पुनर्विचार करने और सभी सरकारी अभिलेखों में एक समान व्यवस्था लागू करने की मांग की.
इसी दौरान तरारी विधानसभा क्षेत्र से भाजपा विधायक विशाल प्रशांत ने भी सरकार के निर्णय का विरोध किया. उन्होंने सदन में कहा कि यदि सरकार "भूमिहार ब्राह्मण" शब्द स्वीकार नहीं करना चाहती तो फिर भूमिहार समाज की सामाजिक स्थिति और उसकी चुनौतियों को देखते हुए उसे अनुसूचित जाति का दर्जा देने के प्रश्न पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. उन्होंने यह भी कहा कि इस समुदाय का एक बड़ा वर्ग आर्थिक और सामाजिक कठिनाइयों का सामना कर रहा है, इसलिए केवल औपचारिक उत्तर देकर इस विषय को समाप्त नहीं किया जा सकता. बाद में उन्होंने सोशल मीडिया के माध्यम से भी अपनी बात दोहराई और सरकार से इस विषय पर व्यापक चर्चा कराने की मांग की.
विधानसभा में चली इस बहस के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के सदस्यों के बीच कई बार तीखी टिप्पणियां भी हुईं. हालांकि सरकार अपने रुख पर अडिग दिखाई दी और स्पष्ट कर दिया कि सरकारी रिकॉर्ड में "भूमिहार" ही मान्य रहेगा. सरकार का कहना है कि अलग-अलग दस्तावेजों में अलग नाम लिखे जाने से प्रशासनिक स्तर पर भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है, इसलिए एक समान व्यवस्था बनाए रखना आवश्यक है.
इस विवाद के बाद भूमिहार समाज से जुड़े सामाजिक और ऐतिहासिक पहलुओं की चर्चा भी तेज हो गई है. कई इतिहासकारों और सामाजिक शोधकर्ताओं का मत रहा है कि भूमिहार समुदाय का संबंध ब्राह्मण परंपरा से रहा है. महापंडित राहुल सांकृत्यायन सहित कुछ विद्वानों ने अपने अध्ययन में भूमिहारों को ऐसे ब्राह्मणों का समुदाय बताया है जिन्होंने परंपरागत पुरोहिताई और दान स्वीकार करने की व्यवस्था छोड़कर कृषि को अपना मुख्य व्यवसाय बनाया. इसी कारण उन्हें "अयाचक ब्राह्मण" या "कृषक ब्राह्मण" जैसी संज्ञाओं से भी जोड़ा जाता रहा है. हालांकि यह ऐतिहासिक दृष्टिकोण है और इस पर अलग-अलग विद्वानों के मत भी मौजूद हैं.
समुदाय के भीतर प्रचलित पौराणिक मान्यताओं के अनुसार भूमिहार स्वयं को भगवान परशुराम का वंशज और ब्रह्मर्षि परंपरा से जुड़ा मानते हैं. कुछ परंपराओं में यह भी कहा जाता है कि भगवान परशुराम द्वारा भूमि के स्वामित्व की व्यवस्था ब्राह्मणों को सौंपे जाने के बाद कृषि और भूमि प्रबंधन से जुड़े ब्राह्मण आगे चलकर भूमिहार कहलाए. वहीं कुछ इतिहासकार सम्राट हर्षवर्धन के शासनकाल का उल्लेख करते हुए मानते हैं कि उस समय जिन ब्राह्मणों को अग्रहार के रूप में भूमि प्राप्त हुई और जिन्होंने कृषि एवं जमींदारी को अपनाया, वे बाद में भूमिहार समुदाय के रूप में पहचाने जाने लगे. हालांकि इन ऐतिहासिक और पौराणिक व्याख्याओं पर विभिन्न विद्वानों के अलग-अलग मत हैं और इन्हें लेकर अकादमिक स्तर पर बहस जारी रही है.
विधानसभा में उठे इस विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह केवल सरकारी अभिलेखों में प्रयुक्त शब्दावली का मामला नहीं रह गया है, बल्कि इससे सामाजिक पहचान, ऐतिहासिक संदर्भ और राजनीतिक विमर्श भी जुड़ गए हैं. फिलहाल राज्य सरकार ने अपने निर्णय में किसी प्रकार के बदलाव से इनकार कर दिया है और स्पष्ट किया है कि सरकारी रिकॉर्ड में केवल "भूमिहार" शब्द ही मान्य रहेगा. वहीं भाजपा के कुछ विधायक और समाज के विभिन्न वर्ग इस विषय पर आगे भी चर्चा और पुनर्विचार की मांग कर रहे हैं. ऐसे में आने वाले दिनों में यह मुद्दा बिहार की राजनीति और सामाजिक विमर्श में चर्चा का महत्वपूर्ण विषय बना रह सकता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

