ग्वालियर. मध्य प्रदेश में सजायाफ्ता अपराधियों के पैरोल पर जेल से बाहर आने के बाद निर्धारित अवधि समाप्त होने पर वापस जेल नहीं लौटने के मामलों ने पुलिस और जेल प्रशासन की चिंता बढ़ा दी है. ग्वालियर समेत भोपाल, इंदौर और प्रदेश के अन्य जिलों से लगातार ऐसे प्रकरण सामने आ रहे हैं, जिनमें हत्या, दुष्कर्म और अन्य गंभीर अपराधों में सजा काट रहे कैदी पैरोल पर रिहा होने के बाद तय समय पर जेल वापस नहीं पहुंचे. पिछले एक वर्ष के दौरान केवल ग्वालियर केंद्रीय जेल से ही 12 कैदी पैरोल पर बाहर जाने के बाद वापस नहीं लौटे. इन घटनाओं ने न केवल पुलिस और जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि पैरोल व्यवस्था के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है.
जानकारी के अनुसार जेल से फरार होने के तौर-तरीकों में अब बदलाव देखने को मिल रहा है. पहले जहां अपराधी जेल से भागने के लिए दीवार फांदने, सुरंग खोदने या सुरक्षा व्यवस्था को चकमा देने जैसे तरीके अपनाते थे, वहीं अब कुछ सजायाफ्ता अपराधी कानूनी प्रक्रिया का लाभ उठाकर पैरोल के माध्यम से जेल से बाहर आ रहे हैं और निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद वापस लौटने के बजाय फरार हो जा रहे हैं. इससे पुलिस और जेल प्रशासन के सामने ऐसे अपराधियों की तलाश और गिरफ्तारी की चुनौती लगातार बढ़ती जा रही है.
प्रदेश के विभिन्न जिलों से सामने आए मामलों में यह तथ्य सामने आया है कि हत्या, दुष्कर्म सहित गंभीर अपराधों में सजा काट रहे कई कैदी पैरोल की अवधि समाप्त होने के बाद भी जेल वापस नहीं पहुंचे. ऐसे मामलों में संबंधित कैदियों के विरुद्ध आवश्यक कानूनी कार्रवाई की जा रही है, वहीं उनकी तलाश के लिए पुलिस लगातार प्रयास कर रही है. हालांकि कई मामलों में आरोपी लंबे समय से गिरफ्तारी से बाहर हैं, जिससे कानून-व्यवस्था को लेकर चिंता बढ़ी है.
सबसे अधिक मामले ग्वालियर केंद्रीय जेल से सामने आए हैं. उपलब्ध जानकारी के अनुसार पिछले एक वर्ष के दौरान इस जेल से पैरोल पर बाहर गए 12 अपराधी निर्धारित अवधि पूरी होने के बाद भी वापस जेल नहीं लौटे. यह आंकड़ा जेल प्रशासन की निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है. सामान्य प्रक्रिया के अनुसार किसी भी सजायाफ्ता कैदी को पैरोल तभी प्रदान की जाती है, जब जेल में उसका व्यवहार संतोषजनक पाया जाता है और यह माना जाता है कि वह निर्धारित अवधि पूरी होने पर स्वयं जेल लौट आएगा. इसके बावजूद लगातार सामने आ रहे ऐसे मामलों ने पैरोल व्यवस्था की निगरानी और उसके क्रियान्वयन को लेकर चिंता बढ़ा दी है.
पैरोल व्यवस्था का उद्देश्य विशेष परिस्थितियों में कैदियों को सीमित अवधि के लिए जेल से बाहर रहने की अनुमति देना है. यह सुविधा निर्धारित नियमों और शर्तों के अधीन प्रदान की जाती है. पैरोल पर बाहर आने वाले कैदियों को तय समय के भीतर वापस जेल में उपस्थित होना अनिवार्य होता है. लेकिन हाल के मामलों में कई कैदियों ने इस व्यवस्था का पालन नहीं किया और अवधि समाप्त होने के बाद भी जेल वापस नहीं लौटे. इससे संबंधित जिलों की पुलिस और जेल प्रशासन को उनकी तलाश के लिए अतिरिक्त प्रयास करने पड़ रहे हैं.
इन घटनाओं के बाद जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है. चूंकि पैरोल उन्हीं कैदियों को दी जाती है जिनका जेल के भीतर का व्यवहार संतोषजनक माना जाता है, इसलिए लगातार बढ़ती फरारी की घटनाओं ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या कैदियों के आचरण का सही आकलन किया जा रहा है या फिर निगरानी व्यवस्था में कहीं न कहीं कमी रह जा रही है. ऐसे मामलों ने जेल प्रशासन की जवाबदेही पर भी चर्चा तेज कर दी है.
पुलिस के लिए भी ऐसे फरार कैदियों की तलाश आसान नहीं है. पैरोल अवधि समाप्त होने के बाद जब कोई कैदी वापस नहीं लौटता तो संबंधित जेल प्रशासन स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना देता है. इसके बाद विभिन्न जिलों में आरोपी की तलाश शुरू की जाती है. कई मामलों में फरार कैदी अपने पुराने ठिकाने छोड़ देते हैं या अन्य स्थानों पर चले जाते हैं, जिससे उनकी गिरफ्तारी में समय लगता है. इस कारण पुलिस को लगातार विशेष अभियान चलाने पड़ते हैं.
गंभीर अपराधों में सजा काट रहे कैदियों के फरार होने की घटनाओं ने आम लोगों के बीच भी चिंता पैदा की है. ऐसे मामलों में पुलिस और जेल प्रशासन दोनों पर दबाव बढ़ जाता है, क्योंकि फरार अपराधियों की गिरफ्तारी सुनिश्चित करना कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए आवश्यक माना जाता है. लगातार सामने आ रहे मामलों ने पैरोल के बाद निगरानी व्यवस्था को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता की ओर भी ध्यान आकर्षित किया है.
जानकारों का मानना है कि पैरोल व्यवस्था का उद्देश्य कैदियों को विशेष परिस्थितियों में मानवीय आधार पर सीमित अवधि के लिए राहत उपलब्ध कराना है, लेकिन यदि इस सुविधा का दुरुपयोग किया जाता है तो पूरी व्यवस्था प्रभावित होती है. इसलिए ऐसे मामलों में निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने और समय-समय पर समीक्षा करने की आवश्यकता महसूस की जा रही है. पैरोल पर बाहर रहने वाले कैदियों की गतिविधियों पर प्रभावी निगरानी और संबंधित एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय से ऐसी घटनाओं को कम किया जा सकता है.
ग्वालियर केंद्रीय जेल से एक वर्ष में 12 कैदियों के वापस नहीं लौटने का मामला प्रदेश में सबसे अधिक चर्चा का विषय बना हुआ है. लगातार सामने आ रही ऐसी घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पैरोल व्यवस्था के क्रियान्वयन और निगरानी तंत्र को और अधिक सुदृढ़ बनाने की आवश्यकता है. वहीं पुलिस फरार कैदियों की तलाश में लगातार कार्रवाई कर रही है और संबंधित मामलों में कानूनी प्रक्रिया भी जारी है.
फिलहाल ग्वालियर समेत प्रदेश के अन्य जिलों में पैरोल पर बाहर गए और वापस नहीं लौटे कैदियों की तलाश जारी है. इन मामलों ने कानून-व्यवस्था, जेल प्रशासन की जवाबदेही और पैरोल व्यवस्था के प्रभावी संचालन को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं. आने वाले समय में इन घटनाओं के मद्देनजर निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने और पैरोल प्रक्रिया की समीक्षा को लेकर क्या कदम उठाए जाते हैं, इस पर सभी की नजर बनी हुई है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

