मुंबई। निर्देशक चेत्तन डीके की फिल्म 'द इंडिया स्टोरी' सिनेमाघरों में रिलीज हो गई है। श्रेयस तलपड़े और काजल अग्रवाल किचलू अभिनीत यह फिल्म एक सामाजिक विषय को केंद्र में रखती है और कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के पीछे छिपे उन पहलुओं पर सवाल उठाने की कोशिश करती है, जिन पर आमतौर पर सार्वजनिक चर्चा कम होती है। फिल्म एक ऐसे परिवार की कहानी के माध्यम से यह दिखाने का प्रयास करती है कि जब तक कोई बड़ी समस्या सीधे किसी व्यक्ति या उसके परिवार को प्रभावित नहीं करती, तब तक अधिकांश लोग उसके वास्तविक कारणों को जानने की कोशिश नहीं करते। इसी विचार को आधार बनाकर फिल्म एक भावनात्मक और संवेदनशील कहानी प्रस्तुत करती है।
फिल्म की कहानी पूर्व सैन्य अधिकारी मेजर योगेश पाटिल के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनकी जिंदगी उनकी छोटी बेटी की कैंसर से असमय मृत्यु के बाद पूरी तरह बदल जाती है। बेटी की मौत के बाद वह इस मामले में कानूनी कार्रवाई करना चाहते हैं, लेकिन पुलिस उनकी शिकायत दर्ज करने से इनकार कर देती है। ऐसे कठिन समय में अधिवक्ता अर्चना पाटिल उनके साथ खड़ी होती हैं और न्याय की लड़ाई लड़ने का निर्णय लेती हैं। इसके बाद दोनों मिलकर अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं और उन लोगों को बेनकाब करने की कोशिश करते हैं, जिन्हें वे इस पूरे घटनाक्रम के लिए जिम्मेदार मानते हैं। फिल्म का आगे का घटनाक्रम इसी कानूनी संघर्ष और सच्चाई तक पहुंचने की कोशिश के इर्द-गिर्द आगे बढ़ता है।
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके मुख्य कलाकारों का अभिनय माना जा रहा है। श्रेयस तलपड़े ने मेजर योगेश पाटिल की भूमिका में एक ऐसे पिता के दर्द, संघर्ष और मानसिक पीड़ा को प्रभावशाली ढंग से पर्दे पर उतारा है, जिसने अपनी बेटी को खो दिया है। एक पूर्व सैनिक और बेबस पिता के रूप में उनके भावनात्मक दृश्य कहानी को मजबूती प्रदान करते हैं। कई दृश्यों में उनका अभिनय स्वाभाविक और प्रभावशाली दिखाई देता है, जिससे दर्शकों के लिए उनके किरदार से जुड़ना आसान हो जाता है।
वहीं काजल अग्रवाल किचलू ने अधिवक्ता अर्चना पाटिल की भूमिका निभाई है। फिल्म में उन्होंने एक ऐसी वकील का किरदार निभाया है जो अपने पेशेवर दायित्वों के साथ-साथ मानवीय संवेदनाओं को भी बराबर महत्व देती है। अदालत में संघर्ष करने वाली वकील और निजी जीवन के बीच संतुलन बनाते हुए उनका अभिनय कहानी को विश्वसनीय बनाता है। फिल्म में श्रेयस और काजल की जोड़ी पूरे कथानक को मजबूती देती है और दोनों कलाकार अपनी भूमिकाओं में प्रभाव छोड़ने में सफल नजर आते हैं।
सहायक कलाकारों ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ न्याय करने का प्रयास किया है। विशेष रूप से बाल कलाकार तृषा सरदा का अभिनय भावनात्मक दृश्यों में प्रभाव छोड़ता है। इसके अलावा मुरली शर्मा, मनीष वाधवा, अतुल तिवारी, कमलेश सावंत और शाम माशिलकर ने भी अपने किरदारों को संतुलित तरीके से निभाया है, जिससे कहानी की गंभीरता बनी रहती है।
निर्देशक चेत्तन डीके ने फिल्म को वास्तविकता के करीब रखने की कोशिश की है। उन्होंने कहानी को अत्यधिक नाटकीय बनाने या तथ्यों को अनावश्यक रूप से सजाने-संवारने से बचने का प्रयास किया है। यही कारण है कि फिल्म कई जगह वास्तविक घटनाओं जैसी गंभीरता का एहसास कराती है। हालांकि कुछ दृश्य, विशेषकर कोर्टरूम ड्रामा, अपेक्षित प्रभाव छोड़ने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाते। इन दृश्यों में पटकथा की गति कुछ धीमी महसूस होती है और नाटकीय प्रभाव अपेक्षा से कम नजर आता है।
पटकथा लेखक सागर बी. शिंदे ने कहानी को एक गंभीर सामाजिक मुद्दे के इर्द-गिर्द विकसित करने का प्रयास किया है। हालांकि पटकथा कुछ स्थानों पर कमजोर महसूस होती है, लेकिन फिल्म के संवाद इस कमी की काफी हद तक भरपाई करते हैं। कई संवाद कहानी के भावनात्मक पक्ष को मजबूती देते हैं और दर्शकों को सोचने पर मजबूर करते हैं।
फिल्म का तकनीकी पक्ष भी संतोषजनक माना जा सकता है। सिनेमैटोग्राफर निशांत भागवत ने कई दृश्यों को प्रभावी तरीके से फिल्माया है, जिससे कहानी का भावनात्मक असर बढ़ता है। वहीं संपादक आशीष म्हात्रे ने फिल्म को संतुलित गति देने का प्रयास किया है। संगीतकार मंगेश धाकड़े का संगीत बहुत अधिक प्रभाव नहीं छोड़ता और अधिकांश गीत सामान्य प्रतीत होते हैं। हालांकि पृष्ठभूमि संगीत कई महत्वपूर्ण दृश्यों में वातावरण बनाने में सहायक साबित होता है।
फिल्म का एक दृश्य, जिसे 'कैंसर ट्रेन' के रूप में दिखाया गया है, विशेष रूप से भावनात्मक माना जा रहा है। यह दृश्य कैंसर से प्रभावित लोगों की पीड़ा को सामने लाने का प्रयास करता है और दर्शकों पर गहरा असर छोड़ता है। निर्देशक ने ऐसे कई दृश्य संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किए हैं, जिससे फिल्म केवल मनोरंजन तक सीमित न रहकर एक सामाजिक संदेश देने का प्रयास करती है।
फिल्म का मूल उद्देश्य कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के पीछे छिपे तथ्यों और संभावित कारणों पर चर्चा शुरू करना है। कहानी दर्शकों को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि किसी भी सामाजिक या स्वास्थ्य संबंधी समस्या को केवल सतही रूप से देखने के बजाय उसके मूल कारणों को समझना भी आवश्यक है। हालांकि फिल्म इस विषय पर अपनी बात पूरी गंभीरता से रखती है, लेकिन इसकी प्रस्तुति हर दर्शक को समान रूप से प्रभावित करेगी या नहीं, यह उनकी व्यक्तिगत सोच और अपेक्षाओं पर निर्भर करता है।
समग्र रूप से 'द इंडिया स्टोरी' एक सामाजिक विषय पर आधारित गंभीर फिल्म है, जिसमें श्रेयस तलपड़े और काजल अग्रवाल का अभिनय सबसे मजबूत पक्ष बनकर उभरता है। निर्देशक ने संवेदनशील विषय को ईमानदारी से प्रस्तुत करने की कोशिश की है, लेकिन पटकथा और कुछ महत्वपूर्ण दृश्यों की कमजोर पकड़ फिल्म को और प्रभावशाली बनने से रोकती है। इसके बावजूद यह फिल्म कैंसर जैसे गंभीर विषय पर चर्चा को आगे बढ़ाने का प्रयास करती है और दर्शकों को एक अलग दृष्टिकोण से सोचने के लिए प्रेरित करती है। अभिनय और सामाजिक संदेश के कारण यह फिल्म उन दर्शकों का ध्यान आकर्षित कर सकती है, जो गंभीर विषयों पर आधारित सिनेमा देखना पसंद करते हैं।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

