नई दिल्ली.भारत में क्रिप्टोकरेंसी और अन्य वर्चुअल डिजिटल एसेट्स (वीडीए) के नियमन को लेकर संसदीय स्थायी समिति (वित्त) ने सरकार को व्यापक स्तर पर नीति-निर्माण और सभी संबंधित पक्षों के साथ विचार-विमर्श करने की सलाह दी है। समिति का मानना है कि प्रस्तावित सिक्योरिटीज मार्केट्स कोड, 2025 के तहत क्रिप्टोकरेंसी को शामिल करने से पहले सरकार, विभिन्न नियामक संस्थाओं और संबंधित विभागों के बीच व्यापक समन्वय आवश्यक है, क्योंकि वर्तमान में भारत में क्रिप्टो एसेट्स का समग्र नियामक ढांचा मौजूद नहीं है।
संसदीय स्थायी समिति ने सिक्योरिटीज मार्केट्स कोड, 2025 की समीक्षा करते हुए कहा कि प्रस्तावित कानून को तकनीक-निरपेक्ष (टेक्नोलॉजी न्यूट्रल) ढांचे के रूप में तैयार किया गया है। इसका उद्देश्य शेयर, बॉन्ड और निवेश योजनाओं की यूनिट जैसी मौजूदा प्रतिभूतियों के टोकनाइज्ड स्वरूप को भी प्रतिभूति कानूनों के दायरे में बनाए रखना है। समिति के अनुसार यह ढांचा नई तकनीकों को अपनाने की सुविधा देता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी प्रकार के डिजिटल एसेट्स स्वतः इसके दायरे में आ जाएंगे।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि जिन क्रिप्टोकरेंसी में प्रतिभूति (सिक्योरिटी) या डेरिवेटिव जैसी विशेषताएं नहीं हैं, वे प्रस्तावित कानून के दायरे से बाहर रह सकती हैं। रिपोर्ट में वित्त मंत्रालय का हवाला देते हुए कहा गया है कि ऐसी वर्चुअल डिजिटल एसेट्स, जो सिक्योरिटीज कॉन्ट्रैक्ट्स (रेगुलेशन) एक्ट, 1956 अथवा प्रस्तावित सिक्योरिटीज मार्केट्स कोड के तहत 'सिक्योरिटी' या 'डेरिवेटिव' की परिभाषा में नहीं आतीं, उन्हें केवल डिजिटल स्वरूप या उनके नाम के आधार पर प्रतिभूति नहीं माना जा सकता।
वित्त मंत्रालय ने समिति को यह भी बताया कि वर्तमान समय में भारत में क्रिप्टो एसेट्स और वर्चुअल डिजिटल एसेट्स के लिए कोई व्यापक नियामक व्यवस्था लागू नहीं है। फिलहाल इन परिसंपत्तियों पर केवल कराधान, धन शोधन निवारण (एंटी मनी लॉन्ड्रिंग) और रिपोर्टिंग से जुड़े सीमित प्रावधान ही लागू हैं। मंत्रालय के अनुसार क्रिप्टो एसेट्स को लेकर केंद्र सरकार का यही मौजूदा रुख है कि वे अभी औपचारिक नियामक ढांचे के बाहर हैं।
रिपोर्ट के अनुसार वित्त मंत्रालय का मानना है कि क्रिप्टो एसेट्स के लिए किसी व्यापक नियामक व्यवस्था को लागू करने के लिए केवल देश के भीतर ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी समन्वय आवश्यक होगा। मंत्रालय ने समिति को बताया कि इस क्षेत्र की वैश्विक प्रकृति को देखते हुए प्रभावी नियमन के लिए विभिन्न देशों और घरेलू संस्थाओं के बीच तालमेल जरूरी है।
समिति की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख किया गया है कि यदि भविष्य में वर्चुअल डिजिटल एसेट्स को सिक्योरिटीज मार्केट्स कोड के तहत लाने पर विचार किया जाता है, तो इसके लिए पहले व्यापक नीति-स्तर पर चर्चा और विभिन्न नियामक संस्थाओं तथा सरकारी विभागों के साथ विस्तृत परामर्श की आवश्यकता होगी। मंत्रालय ने फिलहाल इन परिसंपत्तियों को इस कानून के दायरे में शामिल करना उपयुक्त नहीं माना है।
संसदीय समिति ने उन क्रिप्टो योजनाओं पर भी चिंता व्यक्त की है, जिनमें बड़ी संख्या में निवेशकों का धन एकत्र किया जाता है, निवेशक स्वयं सक्रिय भूमिका नहीं निभाते और धन का प्रबंधन किसी तीसरे पक्ष द्वारा किया जाता है। समिति का मानना है कि इस प्रकार की व्यवस्थाएं कई मामलों में निवेश योजनाओं जैसी दिखाई देती हैं। इसलिए भविष्य में इनके लिए उपयुक्त नियामक ढांचा तैयार करने की आवश्यकता पड़ सकती है।
रिपोर्ट में अंतरराष्ट्रीय अनुभवों का भी उल्लेख किया गया है। समिति ने कहा कि अमेरिका, सिंगापुर, यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ जैसे कई देशों ने तकनीक-निरपेक्ष दृष्टिकोण अपनाया है। इन देशों में जिन क्रिप्टो एसेट्स में प्रतिभूतियों जैसी विशेषताएं होती हैं, उन्हें मौजूदा प्रतिभूति कानूनों के तहत विनियमित किया जाता है, जबकि अन्य प्रकार के डिजिटल एसेट्स के लिए अलग नियामक व्यवस्था विकसित की गई है।
संसदीय समिति की इस सिफारिश से संकेत मिलता है कि भारत में क्रिप्टोकरेंसी के नियमन को लेकर सरकार फिलहाल चरणबद्ध और सावधानीपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहती है। समिति का मानना है कि इस क्षेत्र में कोई भी बड़ा विधायी कदम उठाने से पहले व्यापक नीति-निर्माण, सभी संबंधित पक्षों के साथ परामर्श और घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समन्वित रणनीति तैयार करना आवश्यक होगा।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

