नई दिल्ली। संपत्ति विवादों और पंजीकृत दस्तावेजों की वैधता से जुड़े एक महत्वपूर्ण फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी पंजीकृत बिक्री विलेख (रजिस्टर्ड सेल डीड) को केवल मामूली विसंगतियों या तकनीकी त्रुटियों के आधार पर अमान्य नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि एक बार बिक्री विलेख विधिवत पंजीकृत हो जाता है तो उसके वैध होने की कानूनी धारणा (Presumption of Validity) स्वतः लागू होती है। ऐसे दस्तावेज को निरस्त करने या उसकी वैधता पर प्रश्न उठाने वाले पक्ष पर यह साबित करने का भारी दायित्व होता है कि दस्तावेज धोखाधड़ी, जालसाजी, प्रतिरूपण, निष्पादन की कमी अथवा किसी गंभीर कानूनी दोष से प्रभावित है।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन. वी. अंजारिया की खंडपीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी शराफत अली (दिवंगत) के विधिक प्रतिनिधियों एवं अन्य द्वारा दायर अपील स्वीकार करते हुए की। सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट और उत्तर प्रदेश की चकबंदी (कंसोलिडेशन) प्राधिकरणों के आदेशों को निरस्त करते हुए कहा कि उन्होंने केवल एक गवाह के विवरण में मामूली अंतर के आधार पर वर्ष 1957 के पंजीकृत बिक्री विलेख को संदेहास्पद मानकर गंभीर कानूनी त्रुटि की है।
अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बिक्री विलेख की वैधता के लिए साक्ष्य (Attestation) अनिवार्य कानूनी आवश्यकता नहीं है। न्यायालय ने कहा कि वसीयत या उपहार पत्र (गिफ्ट डीड) की तरह बिक्री विलेख अपनी वैधता साक्ष्य देने वाले गवाहों पर निर्भर नहीं करता। इसलिए यदि किसी गवाह के नाम, निवास या अन्य विवरण में मामूली अंतर पाया जाता है तो केवल उसी आधार पर पंजीकृत बिक्री विलेख को संदिग्ध नहीं माना जा सकता, विशेष रूप से तब जब दस्तावेज स्वयं विधिवत पंजीकृत हो और उसके संबंध में धोखाधड़ी या जालसाजी का कोई ठोस आरोप न हो।
मामला उत्तराखंड के हरिद्वार जिले के नरसीपुर कलां गांव स्थित कृषि भूमि से जुड़ा था। अपीलकर्ताओं के पूर्वजों ने 4 जून 1957 को पंजीकृत बिक्री विलेख के माध्यम से लगभग 15 बीघा 11 बिस्वा भूमि खरीदी थी। उस समय खरीदार नाबालिग थे, इसलिए उनके पूर्वजों के माध्यम से यह खरीद की गई थी। अपीलकर्ताओं का दावा था कि खरीद के तुरंत बाद भूमि का कब्जा उन्हें सौंप दिया गया और तब से वे लगातार उस पर काबिज हैं।
वर्ष 1984 में नायब तहसीलदार ने भूमि का नामांतरण अपीलकर्ताओं के पक्ष में कर दिया था। बाद में 1991 में शुरू हुई चकबंदी कार्यवाही के दौरान राजस्व अभिलेखों में उनका नाम दर्ज नहीं किया गया। उनके आवेदन पर चकबंदी अधिकारी ने 1957 के बिक्री विलेख के आधार पर उन्हें भूमिधर के रूप में दर्ज करने का आदेश दिया। हालांकि बाद में विक्रेताओं की ओर से पुनर्विचार आवेदन दायर किया गया, जिसके बाद मामला दोबारा सुनवाई के लिए खोला गया।
सुनवाई के दौरान यह विवाद उठा कि बिक्री विलेख के गवाह के विवरण में अंतर है और पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध नहीं हैं। इसी आधार पर वर्ष 1999 में चकबंदी अधिकारी ने अपीलकर्ताओं का दावा खारिज कर दिया। अपीलीय प्राधिकारी, पुनरीक्षण प्राधिकारी और बाद में हाई कोर्ट ने भी यही दृष्टिकोण अपनाते हुए बिक्री विलेख को प्रभावहीन मान लिया। साथ ही यह भी कहा गया कि यह उत्तर प्रदेश जमींदारी उन्मूलन एवं भूमि सुधार अधिनियम, 1950 की धारा 154 का उल्लंघन करता है और इसलिए शून्य (Void) है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस निष्कर्ष को पूरी तरह गलत ठहराया। अदालत ने कहा कि केवल बिक्री विलेख निष्पादित हो जाने से धारा 154 स्वतः लागू नहीं हो जाती। पहले यह साबित करना आवश्यक है कि खरीदार की कुल भूमि सीमा कानून में निर्धारित सीमा से अधिक थी। यदि ऐसा होता भी है तो कानून स्वतः बिक्री विलेख को शून्य घोषित नहीं करता, बल्कि ग्राम सभा को विधि अनुसार मुकदमा दायर करने का अधिकार देता है। इस मामले में न तो समय सीमा के भीतर और न ही उसके बाद ऐसा कोई मुकदमा दायर किया गया था।
खंडपीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जब तक किसी सक्षम दीवानी अदालत द्वारा किसी बिक्री विलेख को निरस्त नहीं किया जाता, तब तक चकबंदी अथवा राजस्व अधिकारी उसे अपने स्तर पर अमान्य मानकर नजरअंदाज नहीं कर सकते। न्यायालय ने कहा कि ऐसा करना कानून के स्थापित सिद्धांतों के विपरीत है।
सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 79 का उल्लेख करते हुए कहा कि विधिवत जारी प्रमाणित प्रति (Certified Copy) भी वास्तविक दस्तावेज की तरह वैधता की कानूनी धारणा रखती है। इस मामले में मूल बिक्री विलेख उपलब्ध नहीं था, लेकिन उसकी प्रमाणित प्रति रिकॉर्ड पर थी। अदालत ने कहा कि जब स्वयं बिक्री विलेख की प्रामाणिकता पर कभी प्रश्न नहीं उठाया गया, तब प्रमाणित प्रति को भी पूर्ण कानूनी संरक्षण प्राप्त होगा।
अदालत ने यह भी कहा कि वर्ष 1957 में निष्पादित दस्तावेज के संबंध में वर्ष 1995 में गवाह द्वारा दिए गए बयान में गांव या निवास के विवरण में कुछ अंतर होना स्वाभाविक है। लगभग 38 वर्ष बाद इस प्रकार की मामूली विसंगतियों को दस्तावेज की वैधता समाप्त करने का आधार नहीं बनाया जा सकता, विशेषकर तब जब दोनों गांव एक-दूसरे के निकट स्थित हों और विवाद का मूल विषय इससे प्रभावित नहीं होता हो।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी नोट किया कि प्रतिवादियों ने कभी यह आरोप नहीं लगाया कि बिक्री विलेख जाली था, धोखाधड़ी से तैयार कराया गया था, किसी व्यक्ति का प्रतिरूपण किया गया था या दस्तावेज छलपूर्वक निष्पादित कराया गया था। अदालत ने कहा कि जब चुनौती केवल तकनीकी और गौण विसंगतियों तक सीमित हो तो पंजीकृत बिक्री विलेख को अमान्य ठहराने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता।
सभी तथ्यों और कानून के प्रावधानों पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट और चकबंदी अधिकारियों के आदेशों को निरस्त कर दिया तथा निर्देश दिया कि अपीलकर्ताओं का नाम संबंधित भूमि के राजस्व अभिलेखों में दर्ज किया जाए। इस फैसले के साथ सर्वोच्च अदालत ने यह महत्वपूर्ण सिद्धांत दोहराया कि पंजीकृत बिक्री विलेख को केवल मामूली तकनीकी त्रुटियों या अनुमान के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता और उसकी वैधता को चुनौती देने वाले पक्ष को स्पष्ट, ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों के माध्यम से ही अपना दावा सिद्ध करना होगा। यह निर्णय भविष्य में संपत्ति और भूमि विवादों से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल माना जाएगा।
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

