कर्ज़ के सहारे कब तक खेती करेगा किसान?

कर्ज़ के सहारे कब तक खेती करेगा किसान?

प्रेषित समय :22:27:40 PM / Thu, Jul 30th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

सुनिधि कुमारी
मुजफ्फरपुर, बिहार

भारत के गांवों में खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि पूरे परिवार के जीवन का आधार है. हर मौसम के साथ किसान नई उम्मीदें बोता है. वह खेत में केवल बीज नहीं डालता, बल्कि अपनी मेहनत, पूंजी और भविष्य का भरोसा भी उसी मिट्टी के हवाले करता है. लेकिन विडंबना यह है कि खेती की शुरुआत ही अक्सर ऐसी चुनौतियों से होती है, जिन पर किसान का कोई नियंत्रण नहीं होता. समय पर बीज न मिलना, खेती की बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता और सरकारी योजनाओं तक सीमित पहुंच उसकी उम्मीदों को लगातार कमजोर करती जा रही है. आज छोटे किसान का संघर्ष केवल प्रकृति से नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमियों से भी है.

मुजफ्फरपुर सहित बिहार के अनेक ग्रामीण क्षेत्रों में छोटे किसानों की सबसे बड़ी शिकायत यही है कि उन्हें सरकारी बीज वितरण योजनाओं की जानकारी समय पर नहीं मिलती. कई बार जानकारी मिलने तक कृषि विभाग के केंद्रों पर बीज का स्टॉक समाप्त हो चुका होता है. कुछ किसानों के आवेदन तकनीकी कारणों से अटक जाते हैं, कुछ दस्तावेजों की कमी के कारण लाभ से वंचित रह जाते हैं, जबकि कई पूरी प्रक्रिया से ही अनजान रहते हैं. परिणामस्वरूप उन्हें निजी दुकानों से अधिक कीमत पर बीज खरीदना पड़ता है, जिससे खेती की लागत और बढ़ जाती है.

एक या दो एकड़ से भी कम भूमि वाले किसान के लिए कुछ हजार रुपये का अतिरिक्त खर्च भी बड़ा आर्थिक बोझ बन जाता है. ऐसे परिवार अक्सर खेती शुरू करने के लिए ही कर्ज़ लेने को मजबूर होते हैं. यदि फसल अच्छी हुई तो किसी तरह ऋण चुक जाता है, लेकिन मौसम की मार पड़ने पर वही कर्ज़ अगले सीजन तक साथ चलता है.

देश की अधिकांश खेती आज भी मानसून पर निर्भर है. पिछले कुछ वर्षों में मौसम का बदला हुआ मिजाज किसानों की मुश्किलें और बढ़ा रहा है. कहीं अतिवृष्टि खेतों को डुबो देती है तो कहीं कम वर्षा के कारण सूखे जैसी स्थिति बन जाती है. ऐसी परिस्थितियों में किसान का बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी पर किया गया पूरा निवेश डूब जाता है, जबकि लिया गया कर्ज़ ब्याज के साथ बढ़ता रहता है. कई बार किसान पुराने कर्ज़ को चुकाने के लिए नया कर्ज़ लेने पर मजबूर हो जाता है और धीरे-धीरे कर्ज़ के ऐसे चक्र में फंस जाता है, जिससे बाहर निकलना आसान नहीं होता.

किसानों की आय बढ़ाने और खेती को सुरक्षित बनाने के उद्देश्य से केंद्र और राज्य सरकारें कई योजनाएं संचालित कर रही हैं. प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत पात्र किसानों को प्रतिवर्ष 6,000 रुपये की आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक खातों में भेजी जाती है. फरवरी 2019 में शुरू हुई इस योजना के तहत अब तक किसानों के खातों में चार लाख करोड़ रुपये से अधिक की राशि हस्तांतरित की जा चुकी है. बिहार में भी लाखों किसान इस योजना से लाभान्वित हुए हैं. सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020-21 तक राज्य के लगभग 77.7 लाख किसानों का पंजीकरण पीएम-किसान योजना में हो चुका था. इसी अवधि में 14 लाख से अधिक किसानों को विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों के माध्यम से बीज उपलब्ध कराए गए.

इसके अलावा राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन तथा सब-मिशन ऑन सीड्स एंड प्लांटिंग मैटेरियल के माध्यम से प्रमाणित एवं उन्नत बीज उपलब्ध कराए जा रहे हैं. बिहार सरकार भी मुख्यमंत्री तीव्र बीज विस्तार योजना, बीज वितरण योजना, कृषि इनपुट अनुदान योजना तथा बिहार राज्य फसल सहायता योजना जैसी पहल के जरिए किसानों को राहत देने का प्रयास कर रही है.

फिर भी सवाल बना हुआ है कि क्या इन योजनाओं का लाभ वास्तव में उन किसानों तक पहुंच रहा है, जिन्हें इसकी सबसे अधिक जरूरत है? सबसे अधिक वंचित वही छोटे, सीमांत, भूमिहीन और महिला किसान हैं, जो खेती में बराबर की मेहनत करते हैं, लेकिन जमीन उनके नाम नहीं होने के कारण कई योजनाओं का लाभ नहीं ले पाते. आधार, बैंक खाते या दस्तावेजों से जुड़ी तकनीकी समस्याएं भी बड़ी बाधा बनती हैं. कई स्थानों पर बीज की समय पर आपूर्ति न होने से किसानों को महंगे दामों पर निजी बाजार का सहारा लेना पड़ता है. इससे योजनाओं का उद्देश्य अधूरा रह जाता है.

विशेषज्ञों का भी मानना है कि केवल आर्थिक सहायता पर्याप्त नहीं है. खेती के पूरे तंत्र को मजबूत बनाने की आवश्यकता है. समय पर प्रमाणित बीज की उपलब्धता, मौसम आधारित वैज्ञानिक सलाह, सरल फसल बीमा, शीघ्र मुआवजा और योजनाओं की स्पष्ट जानकारी किसानों तक पहुंचाना उतना ही जरूरी है. पंचायत स्तर पर बीज वितरण केंद्रों की प्रभावी निगरानी हो और सीमांत किसानों को प्राथमिकता के आधार पर बीज उपलब्ध कराया जाए. साथ ही आवेदन प्रक्रिया इतनी सरल हो कि कम पढ़े-लिखे किसान भी बिना किसी परेशानी के योजनाओं का लाभ प्राप्त कर सकें.

देश की खाद्य सुरक्षा का आधार छोटे किसान हैं. यदि वही किसान हर मौसम की शुरुआत कर्ज़ लेकर करेगा और हर फसल के बाद पहले से अधिक कर्ज़दार होता जाएगा, तो खेती का भविष्य भी असुरक्षित होगा. इसलिए अब समय आ गया है कि सरकारी योजनाओं की सफलता केवल लाभार्थियों की संख्या से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर आंकी जाए कि क्या सबसे कमजोर किसान तक समय पर बीज, पर्याप्त सहायता और भरोसेमंद सुरक्षा वास्तव में पहुंच रही है. जब तक इस प्रश्न का सकारात्मक उत्तर नहीं मिलता, तब तक यह सवाल भी बना रहेगा—कर्ज़ के सहारे कब तक खेती करेगा किसान?

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-