बिलासपुर. छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET-UG) 2026 की ओएमआर (OMR) शीट में गड़बड़ी और कम अंक दिए जाने का आरोप लगाने वाले एक छात्र को राहत देने से साफ इनकार कर दिया है.
चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने स्पष्ट किया कि नीट-यूजी जैसी राष्ट्रीय स्तर की मानकीकृत परीक्षा की मूल्यांकन प्रक्रिया में केवल किसी उम्मीदवार की व्यक्तिगत आशंका या संदेह के आधार पर न्यायिक हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता. इसके लिए ठोस और स्वतंत्र प्रमाण का होना अनिवार्य है.
क्या था पूरा मामला?
यह मामला भिलाई (जिला दुर्ग) निवासी नाबालिग छात्र आर्यन अग्रवाल द्वारा दायर की गई रिट याचिका से जुड़ा है:
छात्र ने 21 जून 2026 को नीट-यूजी की परीक्षा दी थी.
छात्र के अनुसार, 10वीं में उसके 93.83% और 12वीं में 80.20% अंक आए थे.
परीक्षा परिणाम और स्कैन की गई ओएमआर शीट जारी होने के बाद छात्र ने दावा किया कि ओएमआर शीट पर रोल नंबर, पुस्तिका नंबर और हस्ताक्षर उसी के हैं, लेकिन अंकित किए गए उत्तर वे नहीं हैं जो उसने परीक्षा के दौरान भरे थे.
छात्र का तर्क था कि प्रश्न पुस्तिका और अंतिम उत्तर कुंजी (Answer Key) के मिलान के हिसाब से उसके 600 से अधिक अंक आने चाहिए थे, लेकिन राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) ने उसे केवल 200 अंक दिए.
इसके आधार पर छात्र ने ओएमआर शीट से छेड़छाड़ का आरोप लगाते हुए मूल ओएमआर शीट कोर्ट में मंगाने और अंक सुधारने की मांग की थी.
NTA का रुख: सीधे हाई कोर्ट आने पर उठाए सवाल
राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) ने याचिका का कड़ा विरोध करते हुए कोर्ट को बताया कि छात्र ने हाई कोर्ट में याचिका दाखिल करने से पहले एनटीए की ओर से उपलब्ध शिकायत निवारण मंच (Grievance Redressal Mechanism) में अपनी आपत्ति दर्ज ही नहीं कराई थी.
एनटीए ने दलील दी कि सीधे अनुच्छेद 226 के तहत तथ्यात्मक विवाद को हाई कोर्ट में लाया गया है. इसके साथ ही एनटीए ने कु. अमीषा गुप्ता बनाम भारत संघ (2025) मामले के पूर्व निर्णय का हवाला दिया, जिसमें ओएमआर शीट में हेरफेर के आरोपों को साबित करने के लिए ठोस साक्ष्य की अनिवार्यता पर जोर दिया गया था.
हाई कोर्ट की मुख्य टिप्पणियां
केवल तुलनात्मक चार्ट पर्याप्त नहीं:
डिवीजन बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलों का परीक्षण करने के बाद कहा कि छात्र का पूरा दावा खुद तैयार किए गए तुलनात्मक चार्ट और आशंकाओं पर टिका है. हेरफेर जैसे गंभीर आरोप को स्वीकार करने के लिए कोई स्वतंत्र या विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया गया है.
परीक्षा की पवित्रता महत्वपूर्ण:
कोर्ट ने कहा कि मूल्यांकन प्रक्रिया में केवल संदेह के आधार पर किया गया हस्तक्षेप परीक्षा की निश्चितता और पवित्रता को प्रभावित कर सकता है.
अंतरिम आदेश बाध्यकारी नजीर नहीं:
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से बॉम्बे हाई कोर्ट के एक अंतरिम आदेश का हवाला दिया गया, जिसे छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया कि किसी मामले में पारित अंतरिम आदेश कानूनी रूप से बाध्यकारी नजीर (Precedent) नहीं होता.
याचिका निरस्त
हाई कोर्ट ने माना कि याचिकाकर्ता एनटीए की मूल्यांकन प्रक्रिया में किसी भी प्रकार की अवैधता या मनमानेपन को साबित करने में विफल रहा है. इसलिए मूल ओएमआर शीट मंगवाने या पुनर्मूल्यांकन का निर्देश देने का कोई औचित्य नहीं बनता. इन टिप्पणियों के साथ अदालत ने छात्र की रिट याचिका को सारहीन मानते हुए निरस्त कर दिया.

