नई दिल्ली. भारत में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), क्लाउड कंप्यूटिंग और डिजिटल सेवाओं की बढ़ती मांग के बीच डेटा सेंटर उद्योग तेज विस्तार की ओर बढ़ रहा है. एक्सिस कैपिटल (Axis Capital) की एक रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2030 तक देश की डेटा सेंटर क्षमता बढ़कर लगभग 3 से 3.6 गीगावाट (GW) तक पहुंच सकती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इस वृद्धि की सबसे बड़ी ताकत हाइपरस्केलर कंपनियां और एआई आधारित क्लाउड सेवाएं होंगी, हालांकि बिजली आपूर्ति, उपकरणों की उपलब्धता और परियोजनाओं के क्रियान्वयन जैसी चुनौतियां घोषित लक्ष्यों को प्रभावित कर सकती हैं.
रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में भारत की स्थापित डेटा सेंटर क्षमता लगभग 1.3 से 1.4 गीगावाट है. इसमें सबसे बड़ा हिस्सा थर्ड-पार्टी कोलोकेशन डेटा सेंटरों का है, जिनकी हिस्सेदारी 60 से 65 प्रतिशत के बीच है. इसके बाद 25 से 30 प्रतिशत क्षमता हाइपरस्केलर कंपनियों की स्वामित्व या लीज पर ली गई सुविधाओं की है. वहीं एंटरप्राइज डेटा सेंटरों की हिस्सेदारी 8 से 10 प्रतिशत तथा एज डेटा सेंटरों की हिस्सेदारी 2 से 3 प्रतिशत है.
रिपोर्ट का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक डेटा सेंटरों की मांग में हाइपरस्केलर कंपनियों का योगदान लगभग 90 प्रतिशत तक पहुंच सकता है, जबकि वर्तमान में यह करीब 60 प्रतिशत है. अमेजन वेब सर्विसेज (AWS), माइक्रोसॉफ्ट, गूगल जैसी वैश्विक क्लाउड कंपनियों के विस्तार के साथ-साथ बड़े भाषा मॉडल (LLM) और एआई आधारित क्लाउड सेवाओं की बढ़ती जरूरत इस मांग को और तेज करेगी. दूसरी ओर पारंपरिक एंटरप्राइज डेटा सेंटरों की मांग में सीमित वृद्धि की संभावना जताई गई है.
हालांकि रिपोर्ट में उद्योग द्वारा घोषित 6 से 8 गीगावाट क्षमता के लक्ष्यों को काफी महत्वाकांक्षी बताया गया है. एक्सिस कैपिटल का आकलन है कि वर्ष 2030 तक वास्तविक रूप से 3.4 से 3.6 गीगावाट क्षमता की परियोजनाएं योजना स्तर पर पहुंच सकती हैं, जबकि परिचालन में आने वाली वास्तविक क्षमता लगभग 2.8 गीगावाट रहने की संभावना है. रिपोर्ट के अनुसार परियोजनाओं के क्रियान्वयन, बिजली उपलब्धता, उपकरणों की आपूर्ति और निर्माण कार्य की समयसीमा जैसी चुनौतियां इस अंतर का प्रमुख कारण बन सकती हैं.
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि डेटा सेंटर विस्तार की रफ्तार लगातार बढ़ रही है. केवल वर्ष 2026 के पिछले छह से सात महीनों में ही 900 मेगावाट से 1.2 गीगावाट क्षमता वाली परियोजनाओं को मंजूरी या आवंटन मिल चुका है. हालांकि किसी परियोजना के आवंटन का अर्थ यह नहीं है कि वह तुरंत परिचालन में आ जाएगी. रिपोर्ट के अनुसार किसी डेटा सेंटर परियोजना के पहले चरण को चालू होने में सामान्यतः 32 से 36 महीने का समय लगता है.
आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) की चुनौतियां भी इस क्षेत्र के लिए बड़ी बाधा बनी हुई हैं. रिपोर्ट में बताया गया है कि हाइपरस्केलर स्तर के बैकअप पावर जनरेशन उपकरणों की वैश्विक आपूर्ति पहले से ही लगभग दो वर्ष तक बुक है. इसके अलावा ईपीसी (Engineering, Procurement and Construction) कंपनियों की सीमित उपलब्धता, प्रशिक्षित मानव संसाधन की कमी और बिजली कनेक्शन स्वीकृति में लगभग 18 महीने लगने जैसी प्रक्रियाएं भी परियोजनाओं को धीमा कर सकती हैं.
रिपोर्ट के अनुसार एआई आधारित डेटा सेंटरों की लागत भी पारंपरिक डेटा सेंटरों की तुलना में अधिक है. जहां सामान्य कोलोकेशन डेटा सेंटर स्थापित करने पर प्रति मेगावाट लगभग 44 से 46.6 करोड़ रुपये का खर्च आता है, वहीं एआई सक्षम डेटा सेंटरों के लिए यह लागत बढ़कर 48 से 54 करोड़ रुपये प्रति मेगावाट तक पहुंच जाती है. यानी एआई इन्फ्रास्ट्रक्चर पर लगभग 10 से 15 प्रतिशत अतिरिक्त निवेश करना पड़ता है.
दीर्घकालिक संभावनाओं पर रिपोर्ट सकारात्मक नजरिया रखती है. यदि वर्तमान में घोषित सभी परियोजनाएं समय पर पूरी हो जाती हैं तो वर्ष 2035 तक भारत की डेटा सेंटर क्षमता 7 से 8 गीगावाट तक पहुंच सकती है. इससे बिजली, कूलिंग सिस्टम, बैकअप पावर, इलेक्ट्रिकल उपकरण, निर्माण और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े उद्योगों के लिए बड़े निवेश और रोजगार के अवसर पैदा होने की संभावना है.
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में डिजिटल अर्थव्यवस्था, क्लाउड सेवाओं, एआई एप्लिकेशन, फिनटेक, ई-कॉमर्स और सरकारी डिजिटल सेवाओं के तेजी से विस्तार के कारण डेटा सेंटर उद्योग आने वाले वर्षों में देश के सबसे महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचा क्षेत्रों में शामिल हो सकता है. हालांकि इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए बिजली, भूमि, निर्माण और आपूर्ति श्रृंखला से जुड़ी चुनौतियों का समयबद्ध समाधान भी उतना ही आवश्यक होगा.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

