ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की नई परिभाषा और भरोसे का छत्तीसगढ़ मॉडल

ईज ऑफ डूइंग बिजनेस की नई परिभाषा और भरोसे का छत्तीसगढ़ मॉडल

प्रेषित समय :22:45:20 PM / Thu, Aug 6th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

-अभिमनोज 

किसी भी राज्य की पहचान केवल उसके प्राकृतिक संसाधनों, औद्योगिक निवेश या सकल घरेलू उत्पाद से नहीं होती. उसकी वास्तविक पहचान इस बात से बनती है कि वहां की शासन व्यवस्था नागरिकों और उद्यमियों के साथ कैसा व्यवहार करती है. यदि व्यवस्था का आधार अविश्वास हो तो विकास की गति धीमी पड़ जाती है, लेकिन यदि शासन नागरिक को साझेदार मानकर आगे बढ़े तो वही व्यवस्था आर्थिक परिवर्तन का माध्यम बन जाती है. छत्तीसगढ़ विधानसभा द्वारा पारित 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस विधेयक-2026' इसी बदलती सोच का प्रतीक है. यह केवल उद्योगों को अनुमति देने का कानून नहीं, बल्कि शासन की कार्यशैली में बदलाव का संकेत है. मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में उठाया गया यह कदम बताता है कि विकास का रास्ता केवल नए उद्योगों से नहीं, बल्कि सरल, पारदर्शी और विश्वास-आधारित प्रशासन से भी प्रशस्त होता है.

भारत ने आर्थिक उदारीकरण के बाद निवेश आकर्षित करने की दिशा में अनेक सुधार किए, लेकिन जमीनी स्तर पर छोटे उद्यमियों की सबसे बड़ी समस्या वही रही—लंबी अनुमति प्रक्रिया, अनेक विभागों के चक्कर, निरीक्षणों की भरमार और फाइलों का महीनों तक लंबित रहना. बड़े उद्योग किसी तरह इन प्रक्रियाओं को पूरा कर लेते हैं, परंतु एक छोटा व्यापारी, स्टार्टअप या ग्रामीण उद्यमी अक्सर इन्हीं जटिलताओं में उलझ जाता है. यही कारण है कि किसी भी राज्य में ईज ऑफ डूइंग बिजनेस का वास्तविक अर्थ केवल विदेशी निवेश आकर्षित करना नहीं, बल्कि स्थानीय उद्यमिता को सहज वातावरण उपलब्ध कराना भी है.

कानून से अधिक महत्वपूर्ण है उसकी सोच
इस विधेयक की सबसे बड़ी विशेषता इसकी कानूनी धाराएं नहीं, बल्कि उसके पीछे की सोच है. पहली बार व्यवसायों को उनके जोखिम (रिस्क) के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में विभाजित करने की व्यवस्था की गई है. कम जोखिम वाले छोटे कारोबारों को बड़े औद्योगिक संयंत्रों जैसी जटिल प्रक्रियाओं से नहीं गुजरना पड़ेगा. यह परिवर्तन केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं, बल्कि नीति-निर्माण की परिपक्वता का संकेत है.

बरसों तक हमारी व्यवस्था का मूल सिद्धांत रहा कि हर उद्यमी पर पहले संदेह किया जाए और फिर उसे अनुमति दी जाए. परिणामस्वरूप लाइसेंस और निरीक्षण व्यवस्था ने कई बार ईमानदार उद्यमियों को भी अनावश्यक परेशान किया. नया कानून इस सोच को बदलने का प्रयास करता है. सेल्फ-सर्टिफिकेशन, समयबद्ध अनुमोदन, ऑटो अप्रूवल और जोखिम आधारित अनुपालन जैसी व्यवस्थाएं इसी परिवर्तन की अभिव्यक्ति हैं. इनका उद्देश्य नियम समाप्त करना नहीं, बल्कि नियमों को व्यावहारिक और नागरिक-अनुकूल बनाना है.

मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की सरकार ने इस पहल के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया है कि सरकार का दायित्व केवल नियंत्रण करना नहीं, बल्कि विकास के लिए अनुकूल वातावरण तैयार करना भी है. किसी भी लोकतांत्रिक शासन की सफलता इसी संतुलन पर निर्भर करती है.

एमएसएमई की मजबूती ही स्थानीय अर्थव्यवस्था की ताकत
जब उद्योगों की बात होती है तो अक्सर बड़े निवेश और विशाल कारखानों की चर्चा होती है, लेकिन किसी भी राज्य की अर्थव्यवस्था की वास्तविक धुरी सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (एमएसएमई) ही होते हैं. यही इकाइयाँ स्थानीय युवाओं को रोजगार देती हैं, गांवों और कस्बों की अर्थव्यवस्था को गति देती हैं और परिवारों की आय का आधार बनती हैं.

छत्तीसगढ़ में लाखों एमएसएमई इकाइयाँ कार्यरत हैं. यदि उन्हें अनुमति, पंजीयन, भवन स्वीकृति, जल कनेक्शन और अन्य प्रशासनिक सेवाओं के लिए सरल व्यवस्था मिलती है तो इसका प्रभाव केवल उद्योगों तक सीमित नहीं रहेगा. इससे स्थानीय रोजगार बढ़ेगा, स्वरोजगार को प्रोत्साहन मिलेगा और नए उद्यमियों का आत्मविश्वास भी मजबूत होगा. यह कानून इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसका लाभ केवल बड़े औद्योगिक घरानों तक सीमित नहीं, बल्कि छोटे व्यापारियों और नवोदित उद्यमियों तक पहुंचने की संभावना रखता है.

विशेष रूप से आज का युवा नौकरी की प्रतीक्षा करने के बजाय स्वयं उद्यम स्थापित करना चाहता है. ऐसे समय में यदि सरकार प्रक्रियाओं को सरल बनाती है तो यह केवल प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का भी माध्यम बन जाता है.

विश्वास और जवाबदेही का संतुलन ही सफलता की कुंजी
किसी भी सुधार का मूल्यांकन केवल उसकी घोषणा से नहीं, बल्कि उसके क्रियान्वयन से होता है. इसलिए इस कानून की सफलता भी इस बात पर निर्भर करेगी कि विभागीय कार्य संस्कृति कितनी बदलती है. यदि फाइलें पहले की तरह लंबित रहीं, डिजिटल व्यवस्था प्रभावी नहीं बनी या जवाबदेही सुनिश्चित नहीं हुई, तो सबसे अच्छा कानून भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाएगा.

दूसरी ओर, उद्यमियों की भी जिम्मेदारी कम नहीं होगी. सेल्फ-सर्टिफिकेशन का अर्थ नियमों से छूट नहीं है. इसका अर्थ है कि सरकार नागरिक पर विश्वास कर रही है और बदले में नागरिक से ईमानदारी की अपेक्षा कर रही है. इसलिए विश्वास और उत्तरदायित्व दोनों साथ-साथ चलेंगे तभी यह मॉडल सफल होगा. यही आधुनिक प्रशासन का मूल सिद्धांत भी है.

यह भी उल्लेखनीय है कि कानून में त्रिस्तरीय निगरानी व्यवस्था का प्रावधान किया गया है. राज्य स्तर पर मुख्य सचिव, जिला स्तर पर कलेक्टर और शीर्ष स्तर पर मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली परिषद के माध्यम से क्रियान्वयन की निगरानी का प्रयास इस बात का संकेत है कि सरकार इसे केवल घोषणा तक सीमित नहीं रखना चाहती.

छत्तीसगढ़ का प्रयोग और भारत की विकास यात्रा
आज भारत वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है. यह लक्ष्य केवल राष्ट्रीय स्तर की नीतियों से पूरा नहीं होगा. राज्यों को भी प्रशासनिक नवाचार और निवेश-अनुकूल वातावरण तैयार करना होगा. इस दृष्टि से छत्तीसगढ़ का यह प्रयोग महत्वपूर्ण माना जा सकता है. यदि यह मॉडल सफल होता है तो अन्य राज्य भी इससे प्रेरणा लेकर अपनी व्यवस्थाओं में सुधार कर सकते हैं.

हालांकि, किसी भी नीति का मूल्यांकन समय के साथ ही संभव होता है. यह देखना होगा कि क्या वास्तव में छोटे उद्यमियों का समय बचेगा, क्या अनुमतियां समयबद्ध मिलेंगी, क्या निवेश बढ़ेगा और क्या रोजगार के अवसरों में अपेक्षित वृद्धि होगी. यदि इन प्रश्नों के उत्तर सकारात्मक मिलते हैं तो यह कानून केवल एक प्रशासनिक सुधार नहीं, बल्कि आर्थिक विकास की नई दिशा बन सकता है.

अंततः किसी भी राज्य की समृद्धि का आधार केवल प्राकृतिक संपदा नहीं, बल्कि नागरिकों का आत्मविश्वास होता है. जब शासन नागरिक पर भरोसा करता है, तब नागरिक भी अपनी ऊर्जा, प्रतिभा और पूंजी को विकास में लगाने का साहस करता है. ईज ऑफ डूइंग बिजनेस विधेयक-2026 इसी विश्वास की नई शुरुआत है. मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ ने एक ऐसी प्रशासनिक सोच प्रस्तुत करने का प्रयास किया है जिसमें विकास का अर्थ केवल निवेश आकर्षित करना नहीं, बल्कि उद्यमिता को सम्मान देना, प्रक्रियाओं को सरल बनाना और शासन को नागरिक का सहयोगी बनाना है. यदि यह भावना व्यवहार में भी उतनी ही मजबूती से उतरती है, जितनी नीति में दिखाई देती है, तो आने वाले वर्षों में छत्तीसगढ़ केवल औद्योगिक निवेश के लिए ही नहीं, बल्कि विश्वास-आधारित सुशासन के एक सफल मॉडल के रूप में भी देश में अपनी विशिष्ट पहचान बना सकता है. यही इस विधेयक का सबसे बड़ा संदेश और सबसे बड़ी संभावना है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-