जबलपुर. मध्य प्रदेश में एथनाॅल उत्पादन के लिए आवंटित धान और चावल की आपूर्ति से जुड़े कथित फर्जीवाड़े की जांच का दायरा लगातार बढ़ता जा रहा है. बालाघाट और सिवनी के बाद अब जबलपुर का नाम भी इस पूरे प्रकरण से जुड़ने लगा है. प्रारंभिक जानकारी के अनुसार जबलपुर जिले के शहपुरा स्थित वेयरहाउस से एथनाॅल प्लांट के लिए बड़ी मात्रा में धान और चावल का उठाव किया गया, लेकिन उसका पूरा स्टॉक निर्धारित प्लांट तक नहीं पहुंचा. आरोप है कि परिवहन के दौरान बड़ी मात्रा में अनाज रास्ते में ही दूसरे स्थानों पर खपा दिया गया. इस मामले ने न केवल परिवहन व्यवस्था बल्कि भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई), वेयरहाउस प्रबंधन, परिवहन एजेंसियों और कुछ राइस मिलरों की भूमिका पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.
सूत्रों के अनुसार एथनाॅल उत्पादन के लिए केंद्र सरकार की नीति के तहत एफसीआई द्वारा निर्धारित मात्रा में चावल और धान विभिन्न प्लांटों को आवंटित किया जाता है. इसी प्रक्रिया के तहत जबलपुर क्षेत्र के शहपुरा वेयरहाउस से भी हजारों मीट्रिक टन चावल और धान का उठाव किया गया था. नियमानुसार यह पूरा स्टॉक निर्धारित एथनाॅल प्लांट तक पहुंचना चाहिए था, लेकिन रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति में भारी अंतर सामने आने की बात कही जा रही है. बताया जा रहा है कि परिवहन के दौरान बड़ी मात्रा में माल अपने निर्धारित गंतव्य तक पहुंचने के बजाय रास्ते में ही अन्य स्थानों पर उतार दिया गया और बाद में उसे खुले बाजार अथवा अन्य राइस मिलों में खपा दिया गया.
मामले से जुड़े सूत्रों का दावा है कि यह पूरा खेल केवल परिवहन स्तर तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई स्तरों पर मिलीभगत की आशंका है. वेयरहाउस से माल निकलने के बाद परिवहन संबंधी दस्तावेजों में कथित रूप से हेरफेर किया गया. गेट पास, ट्रांसपोर्ट चालान, रिसीविंग रिकॉर्ड और प्लांट तक माल पहुंचने के दस्तावेजों में भी कई विसंगतियां सामने आने की बात कही जा रही है. यदि इन सभी रिकॉर्ड का बारीकी से मिलान किया जाए तो पूरे फर्जीवाड़े की परतें खुल सकती हैं.
इस पूरे मामले में एफसीआई के अधिकारियों का पक्ष भी चर्चा का विषय बना हुआ है. अधिकारियों का कहना है कि एफसीआई की जिम्मेदारी केवल अपने परिसर से माल की विधिवत निकासी तक सीमित रहती है. एक बार माल वेयरहाउस के गेट से बाहर निकल जाने के बाद उसकी जवाबदेही संबंधित परिवहन एजेंसी और प्राप्तकर्ता संस्था की होती है. हालांकि इस जवाब के बाद यह सवाल और गहरा गया है कि यदि हजारों टन अनाज निर्धारित प्लांट तक नहीं पहुंचा तो उसकी निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी और बीच रास्ते में माल के गायब होने की स्थिति में जवाबदेही किसकी तय होगी.
एफसीआई के जबलपुर मंडल प्रबंधक सौरभ कुमार का कहना है कि जबलपुर से संबंधित ऐसी कोई औपचारिक शिकायत अभी तक उनके पास नहीं पहुंची है. उन्होंने स्पष्ट किया कि एफसीआई की जिम्मेदारी परिसर तक ही सीमित रहती है और गेट से बाहर निकलने के बाद माल पर निगम का नियंत्रण नहीं रहता. हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी मात्रा में सार्वजनिक वितरण प्रणाली अथवा सरकारी आवंटन से जुड़ा खाद्यान्न यदि गंतव्य तक नहीं पहुंचता है तो इसकी स्वतंत्र जांच आवश्यक है.
सूत्रों के अनुसार परिवहन व्यवस्था में भी कई गंभीर अनियमितताएं सामने आई हैं. जिन ट्रकों के माध्यम से धान और चावल भेजे गए, उनमें से कई वाहनों में जीपीएस ट्रैकिंग व्यवस्था अनिवार्य होने के बावजूद प्रभावी रूप से लागू नहीं थी. कुछ मामलों में जीपीएस उपकरण ही नहीं लगाए गए, जबकि कई मामलों में ट्रैकिंग डेटा उपलब्ध नहीं है. ऐसे में यह पता लगाना कठिन हो गया कि ट्रक वास्तव में निर्धारित मार्ग से होकर प्लांट तक पहुंचे या नहीं. यदि सभी वाहनों की जीपीएस हिस्ट्री और टोल प्लाजा के रिकॉर्ड की जांच की जाए तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है.
जांच से जुड़े सूत्रों का यह भी कहना है कि परिवहन दस्तावेजों में कई स्थानों पर ऐसा दर्शाया गया कि पूरा माल सुरक्षित रूप से प्लांट तक पहुंच गया, जबकि वास्तविकता इससे अलग हो सकती है. आशंका व्यक्त की जा रही है कि कागजों पर परिवहन पूरा दिखाकर सरकारी रिकॉर्ड को सही साबित करने की कोशिश की गई और वास्तविक स्टॉक को अन्य स्थानों पर बेच दिया गया. यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल आर्थिक अनियमितता नहीं बल्कि सरकारी खाद्यान्न के दुरुपयोग का गंभीर मामला माना जाएगा.
गौरतलब है कि जबलपुर में इससे पहले भी धान परिवहन से जुड़ी अनियमितताओं का मामला सामने आ चुका है. लगभग दो वर्ष पहले तत्कालीन कलेक्टर दीपक सक्सेना के कार्यकाल में धान परिवहन में बड़े पैमाने पर गड़बड़ियों का खुलासा हुआ था. उस समय कई राइस मिलरों और परिवहन एजेंसियों के खिलाफ कार्रवाई की गई थी. अब एथनाॅल प्लांट के लिए भेजे गए चावल और धान के मामले में सामने आ रही समान परिस्थितियों ने पुराने मामलों की याद ताजा कर दी है.
विशेषज्ञों का मानना है कि पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच के लिए वेयरहाउस से जारी गेट पास, परिवहन चालान, ट्रकों की जीपीएस लोकेशन, टोल प्लाजा रिकॉर्ड, एथनाॅल प्लांट की रिसीविंग रजिस्टर, वे-ब्रिज की एंट्री और संबंधित भुगतान रिकॉर्ड का एक साथ मिलान किया जाना चाहिए. इसके साथ ही यह भी जांच होनी चाहिए कि जिन वाहनों से परिवहन दिखाया गया, वे वास्तव में उसी अवधि में संबंधित मार्ग पर चले थे या नहीं.
इस मामले में केवल परिवहन एजेंसियों की भूमिका ही नहीं बल्कि वेयरहाउस प्रबंधन, संबंधित अधिकारियों और संभावित रूप से जुड़े राइस मिलरों की जिम्मेदारी भी जांच के दायरे में मानी जा रही है. यदि दस्तावेजों में हेरफेर और स्टॉक के दुरुपयोग की पुष्टि होती है तो यह मध्य प्रदेश के हालिया वर्षों के बड़े खाद्यान्न घोटालों में शामिल हो सकता है. फिलहाल आधिकारिक स्तर पर व्यापक जांच की प्रतीक्षा है, जबकि पूरे मामले ने सरकारी खाद्यान्न की निगरानी व्यवस्था, परिवहन प्रणाली और जवाबदेही को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं. अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि संबंधित एजेंसियां रिकॉर्ड का सत्यापन कर वास्तविक दोषियों तक पहुंचती हैं या यह मामला भी कागजी कार्रवाई तक सीमित रह जाता है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

