नई दिल्ली. मेडिकल छात्रों की अनिवार्य ग्रामीण सेवा को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण सुझाव दिया है. कोर्ट ने कहा कि मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों के लिए अनिवार्य ग्रामीण सेवा के संबंध में देशभर में एक समान नीति होनी चाहिए. अदालत ने यह भी कहा कि मेडिकल शिक्षा केवल व्यक्तिगत लाभ का माध्यम नहीं है, बल्कि इससे जुड़े छात्रों का राष्ट्र निर्माण के प्रति भी दायित्व है. मामले की सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल ने ऐसी अखिल भारतीय नीति तैयार करने की आवश्यकता पर केंद्र सरकार से निर्देश प्राप्त करने के लिए समय मांगा, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सुनवाई तीन सप्ताह के लिए स्थगित कर दी.
जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ कर्नाटक सरकार की उस अधिसूचना को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें मेडिकल छात्रों के लिए कर्नाटक मेडिकल काउंसिल के साथ स्थायी पंजीकरण के लिए पात्र होने से पहले एक वर्ष की अनिवार्य सार्वजनिक ग्रामीण सेवा पूरी करना आवश्यक किया गया है. याचिका में इस व्यवस्था को चुनौती देते हुए निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में निजी सीटों पर पढ़ाई करने वाले मेडिकल छात्रों को इस अनिवार्य सेवा से अलग रखने की मांग की गई है.
सुनवाई के दौरान जस्टिस पीएस नरसिम्हा ने कहा कि यह नीति बेहद महत्वपूर्ण है और इसके संबंध में एक समान राष्ट्रीय नीति बनाई जानी चाहिए. उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्रों की राष्ट्र निर्माण के प्रति जिम्मेदारी है. कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ने वाले छात्रों को ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने से क्यों अलग रखा जाना चाहिए.
मामले में याचिकाकर्ताओं की मुख्य आपत्ति कर्नाटक में लागू अनिवार्य ग्रामीण सेवा की उस व्यवस्था को लेकर है, जिसके तहत मेडिकल शिक्षा पूरी करने वाले छात्रों को स्थायी पंजीकरण के लिए आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल करने से पहले एक वर्ष की सार्वजनिक ग्रामीण सेवा करनी होती है. कर्नाटक में यह व्यवस्था 'कर्नाटक अनिवार्य सेवा प्रशिक्षण अधिनियम, 2012' और इसके तहत बनाए गए वर्ष 2015 के नियमों के आधार पर लागू की गई है.
इस व्यवस्था के तहत प्रत्येक एमबीबीएस स्नातक, प्रत्येक स्नातकोत्तर चिकित्सा पाठ्यक्रम के डिप्लोमा या डिग्री धारक और प्रत्येक सुपर स्पेशियलिटी पाठ्यक्रम के उम्मीदवार के लिए एक वर्ष की अनिवार्य सार्वजनिक ग्रामीण सेवा का प्रावधान किया गया है. यह शर्त उन छात्रों पर लागू होती है, जिन्होंने अपनी पढ़ाई सरकारी विश्वविद्यालय से अथवा निजी या डीम्ड विश्वविद्यालय में सरकारी सीट के माध्यम से पूरी की है. निर्धारित सेवा पूरी करने के बाद ही संबंधित उम्मीदवार को आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी किया जाता है, जिसके आधार पर वह कर्नाटक मेडिकल काउंसिल में स्थायी पंजीकरण के लिए पात्र होता है.
वर्ष 2023 में जारी अधिसूचना के माध्यम से इस व्यवस्था का दायरा बढ़ाते हुए निजी और डीम्ड विश्वविद्यालयों में निजी सीटों पर दाखिला लेने वाले उम्मीदवारों को भी अनिवार्य सेवा के दायरे में शामिल कर दिया गया. याचिकाकर्ताओं ने इसी विस्तार को चुनौती दी है. उनका तर्क है कि निजी या डीम्ड विश्वविद्यालयों में निजी सीटों पर दाखिला लेने वाले छात्र अपनी मेडिकल शिक्षा का खर्च स्वयं वहन करते हैं और उनकी स्थिति सरकारी सीट पर पढ़ने वाले छात्रों से अलग है. इसलिए उन्हें अनिवार्य ग्रामीण सेवा की समान शर्त के अधीन रखना संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समानता के अधिकार के अनुरूप नहीं है.
याचिकाकर्ताओं की ओर से यह तर्क भी दिया गया कि निजी सीटों पर पढ़ने वाले छात्रों को एक अलग और तर्कसंगत श्रेणी माना जाना चाहिए. उनका कहना है कि जब कोई छात्र अपनी मेडिकल शिक्षा के लिए अत्यधिक शुल्क का भुगतान करता है, तो उस पर सरकारी सीट के माध्यम से शिक्षा प्राप्त करने वाले छात्र के समान अनिवार्य सेवा की शर्त लागू करना उचित नहीं है.
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का भी हवाला दिया गया. 'एसोसिएशन ऑफ मेडिकल सुपर स्पेशियलिटी एस्पिरेंट्स रेजिडेंट्स एंड अदर्स बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एंड अदर्स' मामले में अदालत ने स्नातकोत्तर चिकित्सा और सुपर स्पेशियलिटी पाठ्यक्रमों में दाखिले के लिए अनिवार्य बांड की व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी. हालांकि उस फैसले में अदालत ने यह भी ध्यान दिया था कि कुछ राज्यों में अनिवार्य बांड की शर्तें काफी कठोर थीं.
इसी संदर्भ में यह सुझाव सामने आया था कि केंद्र सरकार और भारतीय चिकित्सा परिषद को सरकारी संस्थानों में प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले डॉक्टरों की अनिवार्य सेवा के संबंध में एक समान नीति बनाने की दिशा में कदम उठाना चाहिए. मौजूदा मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने भी इसी व्यापक पहल की आवश्यकता पर जोर दिया.
जस्टिस नरसिम्हा ने सुनवाई के दौरान राज्यों की ओर से मेडिकल शिक्षा पर दी जाने वाली सब्सिडी के महत्व को भी रेखांकित किया. उन्होंने कहा कि मेडिकल शिक्षा कई स्तरों पर राज्य की सहायता और संसाधनों से जुड़ी होती है. उनके अनुसार, किसी भी समय राज्यों की सब्सिडी के बिना मेडिकल शिक्षा पूरी नहीं होती. इसके अलावा चिकित्सा तकनीक और चिकित्सा विज्ञान भी एक महत्वपूर्ण संसाधन हैं और राज्य को व्यापक सार्वजनिक हित में इस संसाधन के उपयोग को लेकर विचार करने का अधिकार होना चाहिए.
कोर्ट की टिप्पणी का व्यापक अर्थ यह है कि मेडिकल शिक्षा प्राप्त करने वाले डॉक्टरों को समाज और राज्य के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने के लिए तैयार रहना चाहिए. विशेष रूप से ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में चिकित्सकों की उपलब्धता लंबे समय से एक महत्वपूर्ण विषय रही है. इसी पृष्ठभूमि में अदालत ने अनिवार्य ग्रामीण सेवा की अलग-अलग राज्य स्तरीय व्यवस्थाओं के बजाय एक समान राष्ट्रीय नीति की आवश्यकता पर विचार करने का सुझाव दिया.
याचिकाकर्ताओं ने अदालत से मुख्य रूप से यह निर्देश देने की मांग की है कि स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण सेवा आयुक्त को आवश्यक अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने का निर्देश दिया जाए, ताकि उन्हें अनिवार्य ग्रामीण सेवा के शपथ-पत्र की शर्त पूरी किए बिना आगे बढ़ने की अनुमति मिल सके. इसके साथ ही कर्नाटक मेडिकल काउंसिल को भी निर्देश देने की मांग की गई है कि वह याचिकाकर्ताओं का स्थायी पंजीकरण स्वीकार करे.
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर याचिकाकर्ताओं की मांग पर अंतिम आदेश पारित नहीं किया. कोर्ट ने मामले को तीन सप्ताह के लिए स्थगित करते हुए सॉलिसिटर जनरल को केंद्र सरकार से इस संबंध में निर्देश प्राप्त करने को कहा है कि क्या मेडिकल छात्रों की अनिवार्य ग्रामीण सेवा के संबंध में देशभर में एक समान नीति बनाई जा सकती है.
इस मामले की अगली सुनवाई में केंद्र सरकार का रुख महत्वपूर्ण होगा. यदि अखिल भारतीय स्तर पर एक समान नीति बनाने की दिशा में पहल होती है तो इसका प्रभाव केवल कर्नाटक तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों में मेडिकल स्नातकों, स्नातकोत्तर चिकित्सकों और सुपर स्पेशियलिटी पाठ्यक्रम पूरा करने वाले डॉक्टरों पर लागू होने वाली अनिवार्य सेवा की अलग-अलग व्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है. फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि मेडिकल शिक्षा और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवा से जुड़े इस महत्वपूर्ण विषय पर व्यापक और समान नीति की आवश्यकता पर केंद्र सरकार को विचार करना चाहिए.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

