महिला आरक्षण से बदल सकती है सियासत की तस्वीर, 33 प्रतिशत हिस्सेदारी के मुद्दे पर फिर गरमाई राजनीति

महिला आरक्षण से बदल सकती है सियासत की तस्वीर, 33 प्रतिशत हिस्सेदारी के मुद्दे पर फिर गरमाई राजनीति

प्रेषित समय :21:58:52 PM / Sun, Aug 9th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली. भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने का मुद्दा एक बार फिर केंद्र में है. संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान करने वाला नारी शक्ति वंदन अधिनियम 2023 में पारित हो चुका है, लेकिन इसके वास्तविक क्रियान्वयन को लेकर अब भी राजनीतिक और संवैधानिक बहस जारी है. सरकार इसे जल्द लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाने की बात कह रही है, जबकि विपक्ष का जोर इस बात पर है कि महिलाओं को आरक्षण देने के लिए परिसीमन और सीटों की संख्या बढ़ाने की प्रक्रिया को उससे अलग रखा जाए.

महिला आरक्षण का सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि देश की आबादी में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब आधी है, लेकिन संसद में उनका प्रतिनिधित्व अभी भी उस अनुपात से काफी कम है. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक 18वीं लोकसभा में 75 महिला सदस्य हैं. इससे पहले 17वीं लोकसभा में यह संख्या 78 थी. यानी महिला प्रतिनिधित्व में वृद्धि हुई है, लेकिन कुल सदस्यों की तुलना में हिस्सेदारी अभी भी सीमित है.

2023 में पारित कानून के तहत लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में करीब एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करने का प्रावधान किया गया था. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित सीटों में भी महिलाओं के लिए इसी अनुपात में आरक्षण का प्रावधान है. हालांकि कानून के प्रावधानों के अनुसार आरक्षण का वास्तविक क्रियान्वयन परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है. यही बिंदु अब पूरे विवाद का केंद्र बन गया है.

सरकार की ओर से महिलाओं के आरक्षण को जल्द लागू करने की कोशिशों के बीच परिसीमन को लेकर अलग से राजनीतिक बहस शुरू हो गई है. प्रस्तावित व्यवस्था में लोकसभा की सीटों की संख्या बढ़ाने और नई सीमाओं के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन करने की चर्चा है. विभिन्न रिपोर्टों में लोकसभा की वर्तमान 543 सीटों को बढ़ाकर 850 तक किए जाने की संभावित योजना का उल्लेख किया गया है. हालांकि यह प्रस्ताव राजनीतिक सहमति और संवैधानिक प्रक्रिया पर निर्भर करेगा.

यहीं से महिला आरक्षण का मुद्दा केवल महिलाओं के प्रतिनिधित्व तक सीमित नहीं रहता, बल्कि देश के क्षेत्रीय राजनीतिक संतुलन से भी जुड़ जाता है. परिसीमन में जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्विन्यास होने की स्थिति में राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व में बदलाव की आशंका जताई जा रही है. खासतौर पर दक्षिणी राज्यों की ओर से यह चिंता सामने आती रही है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को नई व्यवस्था में राजनीतिक नुकसान हो सकता है. इसलिए महिला आरक्षण के साथ परिसीमन का मुद्दा जुड़ते ही बहस कहीं अधिक व्यापक हो गई है.

राजनीतिक स्तर पर सरकार और विपक्ष के बीच मतभेद भी इसी बिंदु पर दिखाई दे रहे हैं. सरकार का तर्क है कि महिलाओं को उनका संवैधानिक प्रतिनिधित्व देने के लिए परिसीमन आवश्यक प्रक्रिया है और इसमें अनावश्यक देरी नहीं होनी चाहिए. वहीं विपक्षी दलों का एक वर्ग चाहता है कि महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण मौजूदा लोकसभा की सीटों के आधार पर ही लागू किया जाए और इसे सीटों की संख्या बढ़ाने वाली परिसीमन प्रक्रिया से न जोड़ा जाए.

हालिया राजनीतिक घटनाक्रम ने इस बहस को फिर तेज कर दिया है. संसद में महिला आरक्षण को लागू करने की प्रक्रिया को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं के बीच बयानबाजी जारी है. सरकार की ओर से इसे महिलाओं को राजनीतिक निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक हिस्सेदारी देने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया जा रहा है, जबकि विपक्ष कार्यान्वयन की समयसीमा और परिसीमन के तरीके पर सवाल उठा रहा है.

महिला आरक्षण की मांग हालांकि नई नहीं है. संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ाने की कोशिश दशकों से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रही है. वर्ष 1996 में पहली बार महिला आरक्षण से जुड़ा विधेयक संसद में पेश किया गया था, लेकिन लंबे समय तक राजनीतिक सहमति नहीं बन सकी. 2023 में नारी शक्ति वंदन अधिनियम के पारित होने के साथ इस दिशा में महत्वपूर्ण संवैधानिक कदम उठाया गया.

स्थानीय शासन में महिलाओं की भागीदारी इस बदलाव की संभावनाओं का एक बड़ा उदाहरण मानी जाती है. पंचायती राज संस्थाओं में लगभग 14.5 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि होने की जानकारी सरकारी स्रोतों में दी गई है. यह आंकड़ा बताता है कि स्थानीय स्तर पर आरक्षण ने महिलाओं को बड़ी संख्या में राजनीतिक और प्रशासनिक भूमिकाओं में आने का अवसर दिया है. अब इसी तरह की भागीदारी को राष्ट्रीय और राज्य स्तर की विधायिकाओं में बढ़ाने की कोशिश की जा रही है.

महिला आरक्षण के समर्थकों का मानना है कि राजनीति में महिलाओं की संख्या बढ़ने से नीति निर्माण में महिलाओं से जुड़े मुद्दों को अधिक प्राथमिकता मिल सकती है. शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, पोषण, रोजगार, मातृत्व, सार्वजनिक परिवहन और आर्थिक आत्मनिर्भरता जैसे विषय राजनीतिक एजेंडे में अधिक मजबूती से सामने आ सकते हैं. हालांकि केवल संख्या बढ़ना ही पर्याप्त नहीं होगा. महिलाओं को वास्तविक निर्णय लेने की शक्ति और स्वतंत्र राजनीतिक भूमिका मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण होगा.

राजनीतिक दलों के सामने भी महिला आरक्षण लागू होने की स्थिति में बड़ा बदलाव आएगा. टिकट वितरण की रणनीति बदलनी पड़ेगी और बड़ी संख्या में मौजूदा पुरुष नेताओं के निर्वाचन क्षेत्रों में महिलाओं को अवसर देना होगा. इससे पार्टी संगठनों के भीतर नई नेतृत्व क्षमता विकसित हो सकती है. परिवार आधारित राजनीति की आलोचना के बीच यह सवाल भी उठेगा कि आरक्षित सीटों पर महिलाओं को वास्तव में स्वतंत्र नेतृत्व का अवसर मिलता है या वे केवल राजनीतिक परिवारों के प्रतिनिधि के रूप में सामने आती हैं.

इसके बावजूद महिला आरक्षण को भारतीय लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. संसद में महिलाओं की संख्या बढ़ने से निर्णय प्रक्रिया अधिक विविध हो सकती है. दुनिया के कई देशों में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी ने नीति निर्माण और शासन के स्वरूप को प्रभावित किया है. भारत में भी स्थानीय निकायों के अनुभवों ने दिखाया है कि महिलाओं की बड़ी भागीदारी शासन में नए दृष्टिकोण ला सकती है.

अब सबसे बड़ा सवाल इसके क्रियान्वयन की समयसीमा और तरीके को लेकर है. केंद्र सरकार 2029 के आम चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू करने की दिशा में राजनीतिक और संवैधानिक विकल्प तलाश रही है. हाल की रिपोर्टों के अनुसार सरकार ने इसके लिए नए संविधान संशोधन की संभावनाओं पर भी विचार जारी रखा है. हालांकि संसद में आवश्यक संख्या और विपक्षी दलों की सहमति हासिल करना अभी बड़ी चुनौती है.

महिला आरक्षण पर जारी बहस इसलिए केवल सीटों के बंटवारे का सवाल नहीं है. यह आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति के नेतृत्व, क्षेत्रीय संतुलन और चुनावी रणनीति को प्रभावित कर सकती है. यदि 33 प्रतिशत आरक्षण प्रभावी रूप से लागू होता है तो लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या में बड़ा बदलाव संभव है. इससे राजनीतिक दलों को भी महिलाओं को संगठन से लेकर नेतृत्व तक अधिक अवसर देने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है.

फिलहाल महिला आरक्षण का कानून मौजूद है, लेकिन उसके वास्तविक लाभ को लेकर अगला निर्णायक चरण उसके क्रियान्वयन की प्रक्रिया है. परिसीमन, सीटों की संख्या, राज्यों का प्रतिनिधित्व और राजनीतिक सहमति जैसे मुद्दों पर समाधान निकलना बाकी है. यही वजह है कि महिलाओं को 33 प्रतिशत राजनीतिक प्रतिनिधित्व देने का सवाल आने वाले समय में भारतीय राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों में से एक बना रह सकता है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-