मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने की PIL हाईकोर्ट ने की खारिज, पुलिस के मौखिक आदेश के दावे पर नहीं मिली राहत

मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने की PIL हाईकोर्ट ने की खारिज, पुलिस के मौखिक आदेश के दावे पर नहीं मिली राहत

प्रेषित समय :22:01:28 PM / Tue, Aug 18th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

कोलकाता. कलकत्ता हाईकोर्ट ने पश्चिम बंगाल की मस्जिदों में अजान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले लाउडस्पीकर हटाने के कथित पुलिस निर्देशों को लेकर दायर जनहित याचिका (PIL) मंगलवार को खारिज कर दी. कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश तपब्रत चक्रवर्ती और न्यायमूर्ति अतुरूप बनर्जी की खंडपीठ ने अधिवक्ता मोहम्मद दानिश फारूकी की याचिका पर सुनवाई की. याचिका में आरोप लगाया गया था कि राज्य पुलिस के अधिकारी हाल के सप्ताहों में मस्जिद समितियों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक कर उन्हें लाउडस्पीकर हटाने के लिए मौखिक निर्देश दे रहे थे.

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत के समक्ष यह दावा किया गया कि पुलिस अधिकारियों ने मस्जिद प्रतिनिधियों के साथ बैठकें कीं और उनसे सभी लाउडस्पीकर हटाने को कहा. याचिका में यह भी कहा गया कि सार्वजनिक स्थानों पर लाउडस्पीकर के इस्तेमाल और ध्वनि की तीव्रता को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देश मौजूद हैं, इसलिए पुलिस द्वारा कथित तौर पर बिना किसी लिखित आदेश के इस तरह के निर्देश देना उचित नहीं है.

मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से इन आरोपों का विरोध किया गया. राज्य के वकीलों ने अदालत को बताया कि पुलिस ने न तो मस्जिद प्रतिनिधियों के साथ ऐसी कोई बैठक की और न ही लाउडस्पीकर हटाने के संबंध में कोई मौखिक निर्देश जारी किया. राज्य की ओर से याचिका में लगाए गए आरोपों को आधारहीन बताया गया.

सरकार के वकीलों ने जनहित याचिका की विचारणीयता यानी maintainability पर भी सवाल उठाया. उनका कहना था कि याचिका में लगाए गए आरोप अस्पष्ट हैं और उनके समर्थन में पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद नहीं हैं. राज्य की ओर से यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ता ने अपने आरोपों के लिए इमामों और मस्जिद प्रतिनिधियों से मिली जानकारी का हवाला दिया है, लेकिन कथित रूप से प्रभावित किसी व्यक्ति ने स्वयं अदालत का रुख नहीं किया.

राज्य सरकार की दलील के अनुसार, याचिका में ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया जिससे यह साबित हो कि किसी सरकारी अधिकारी ने वैधानिक नियमों का उल्लंघन किया है. सरकार ने अदालत के समक्ष यह भी कहा कि यदि पुलिस की ओर से वास्तव में किसी मस्जिद समिति को लाउडस्पीकर हटाने का निर्देश दिया गया होता, तो संबंधित पक्षों के पास उसके समर्थन में कोई लिखित या अन्य ठोस प्रमाण होना चाहिए था.

वहीं याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने राज्य की दलीलों का विरोध किया. उन्होंने अदालत में कहा कि पुलिस और मस्जिद समितियों के बीच बैठकें हुई थीं. उन्होंने जनहित याचिका की प्रकृति का हवाला देते हुए कहा कि PIL सामान्य दीवानी या आपराधिक मुकदमे की तरह प्रतिकूल मुकदमेबाजी नहीं होती, जिसमें हर आरोप को साबित करने के लिए शुरुआत में ही 100 प्रतिशत साक्ष्य प्रस्तुत करना आवश्यक हो.

सुनवाई के दौरान अदालत के सामने मुख्य सवाल यह रहा कि क्या याचिका में लगाए गए आरोपों और उपलब्ध सामग्री के आधार पर अदालत हस्तक्षेप कर सकती है. राज्य सरकार ने याचिका को अस्पष्ट और दस्तावेजी आधार से रहित बताया, जबकि याचिकाकर्ता ने पुलिस और मस्जिद समितियों के बीच कथित बैठकों को आधार बनाकर मामले की न्यायिक जांच की मांग की.

मामला मस्जिदों में अजान के लिए इस्तेमाल होने वाले लाउडस्पीकर और सार्वजनिक स्थानों पर ध्वनि प्रदूषण से जुड़े नियमों के संदर्भ में आया था. भारत में धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर ध्वनि सीमा और निर्धारित समय जैसे नियम लागू हैं. ऐसे मामलों में धार्मिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सार्वजनिक स्वास्थ्य और ध्वनि प्रदूषण से जुड़े कानूनी प्रावधान भी महत्वपूर्ण होते हैं. हालांकि, मौजूदा मामले में हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य मुद्दा कथित पुलिस निर्देशों और याचिका की विचारणीयता से जुड़ा रहा.

याचिका में यह आरोप लगाया गया था कि पुलिस अधिकारियों ने मस्जिद प्रतिनिधियों से मौखिक रूप से लाउडस्पीकर हटाने को कहा. याचिकाकर्ता का दावा था कि इस तरह की मौखिक कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट के निर्धारित ध्वनि मानकों के संदर्भ में भी सवाल खड़े करती है. दूसरी ओर राज्य सरकार ने ऐसी किसी बैठक या मौखिक निर्देश से ही इनकार कर दिया.

अदालत में राज्य की ओर से यह तर्क भी रखा गया कि जिन लोगों को कथित तौर पर पुलिस निर्देशों का सामना करना पड़ा, वे स्वयं अदालत में नहीं आए हैं. याचिकाकर्ता की ओर से इमामों और मस्जिद प्रतिनिधियों की जानकारी का हवाला दिया गया था, लेकिन सरकार ने इसे पर्याप्त आधार नहीं माना. राज्य की दलील थी कि केवल सामान्य या अस्पष्ट आरोपों के आधार पर जनहित याचिका को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता.

इस मामले की पृष्ठभूमि में पश्चिम बंगाल में मस्जिदों और अन्य धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर के इस्तेमाल को लेकर समय-समय पर उठने वाली शिकायतें भी महत्वपूर्ण हैं. सार्वजनिक स्थानों पर ध्वनि विस्तारक यंत्रों के इस्तेमाल को लेकर निर्धारित नियमों का पालन सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है. वहीं धार्मिक संस्थानों की ओर से भी यह तर्क दिया जाता रहा है कि नियमों का पालन करते हुए धार्मिक गतिविधियां संचालित करने की अनुमति होनी चाहिए.

कलकत्ता हाईकोर्ट के समक्ष दायर मौजूदा PIL में याचिकाकर्ता ने कथित पुलिस कार्रवाई को चुनौती देने की कोशिश की थी. लेकिन राज्य सरकार की ओर से आरोपों से इनकार किए जाने और याचिका में पर्याप्त दस्तावेजी आधार नहीं होने की दलील के बीच अदालत ने याचिका खारिज कर दी. इससे फिलहाल मस्जिदों से लाउडस्पीकर हटाने के कथित मौखिक पुलिस निर्देशों को लेकर दायर इस विशेष जनहित याचिका में न्यायिक हस्तक्षेप का रास्ता बंद हो गया है.

हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि सार्वजनिक स्थानों पर लाउडस्पीकर के इस्तेमाल से जुड़े ध्वनि मानकों और कानूनी नियमों में कोई बदलाव हुआ है. धार्मिक स्थलों सहित सार्वजनिक स्थानों पर ध्वनि विस्तारक यंत्रों के इस्तेमाल को लेकर लागू नियम अपनी जगह कायम हैं. किसी भी कार्रवाई की वैधता संबंधित नियमों, प्रशासनिक आदेशों और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर तय होती है.

इस मामले में हाईकोर्ट के सामने आरोप यह नहीं था कि लाउडस्पीकर के इस्तेमाल पर कोई नया कानूनी प्रतिबंध लगाया गया है, बल्कि याचिका का केंद्र पुलिस द्वारा मस्जिद समितियों को कथित तौर पर मौखिक रूप से लाउडस्पीकर हटाने के निर्देश देने का आरोप था. राज्य ने इस आरोप को ही गलत बताया और कहा कि ऐसी कोई बैठक या निर्देश नहीं दिया गया.

अदालत के फैसले के बाद अब याचिका में लगाए गए आरोपों को लेकर आगे की कानूनी स्थिति याचिकाकर्ता की ओर से उपलब्ध कराए जाने वाले तथ्यों और साक्ष्यों पर निर्भर करेगी. फिलहाल कलकत्ता हाईकोर्ट ने मामले में दायर PIL को खारिज कर दिया है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-