रांची. झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं को लेकर चल रहे विवाद के बीच गुरुवार को झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के फैसले पर बड़ा हस्तक्षेप किया. हाईकोर्ट ने 11वीं से 13वीं झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) सिविल सेवा परीक्षाओं के माध्यम से की गई नियुक्तियों को रद्द करने वाली सरकारी अधिसूचनाओं के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी. अदालत के इस आदेश से उन अभ्यर्थियों को तत्काल राहत मिली है, जिन्होंने इन परीक्षाओं में चयन के बाद सरकारी सेवाओं में नियुक्ति हासिल की थी और अब नौकरी जाने का खतरा पैदा हो गया था. उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, इन भर्तियों से जुड़े 2,600 से अधिक कर्मचारी प्रभावित हो सकते थे.
हाईकोर्ट का यह आदेश ऐसे समय आया है जब झारखंड में सरकारी भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर कई सप्ताह से छात्र आंदोलन कर रहे थे. छात्रों की मांग के बाद राज्य सरकार ने जांच के आधार पर कई भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला लिया था. सरकार की ओर से जारी अधिसूचनाओं में 11वीं से 13वीं JPSC सिविल सेवा परीक्षाओं सहित कई अन्य भर्ती प्रक्रियाओं को भी जांच और कार्रवाई के दायरे में लाया गया. इन फैसलों के बाद पहले से चयनित और नियुक्त अभ्यर्थियों के बीच असमंजस की स्थिति पैदा हो गई थी.
मामला हाईकोर्ट पहुंचने के बाद याचिकाकर्ताओं की ओर से सरकारी फैसले को चुनौती दी गई. याचिकाकर्ताओं का कहना था कि यदि किसी भर्ती परीक्षा में गड़बड़ी हुई है तो उसकी जांच की जानी चाहिए, लेकिन बिना व्यक्तिगत स्तर पर दोष तय किए उन सभी अभ्यर्थियों की नियुक्तियां रद्द करना उचित नहीं है, जिन्होंने चयन प्रक्रिया में सफलता हासिल कर सरकारी नौकरी प्राप्त की है. याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि सामूहिक रूप से नियुक्तियां रद्द करने से उन अभ्यर्थियों को नुकसान होगा, जिनकी ओर से किसी अनियमितता में शामिल होने का कोई आरोप या प्रमाण सामने नहीं आया है.
हाईकोर्ट ने फिलहाल सरकार के आदेशों पर अंतरिम रोक लगाते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है. अदालत का यह आदेश अंतिम फैसला नहीं है. इसका अर्थ यह है कि नियुक्तियां रद्द करने वाली अधिसूचनाओं पर फिलहाल अमल नहीं किया जा सकेगा और मामले की आगे की सुनवाई के दौरान अदालत सरकार तथा अन्य संबंधित पक्षों का पक्ष सुनेगी. अदालत के अंतिम निर्णय के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि इन भर्ती परीक्षाओं और नियुक्तियों को लेकर आगे क्या स्थिति बनती है.
इस पूरे विवाद की शुरुआत राज्य में भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पारदर्शिता को लेकर उठे सवालों से हुई. छात्रों के लंबे आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने कई परीक्षाओं को रद्द करने का निर्णय लिया. सरकार ने विभिन्न भर्ती प्रक्रियाओं में कथित गड़बड़ियों की जांच के लिए आपराधिक जांच विभाग यानी CID की जांच का भी सहारा लिया. रिपोर्टों के अनुसार सरकार ने 22 भर्ती परीक्षाओं को रद्द करने का फैसला किया, जबकि कई अन्य परीक्षाओं को जांच के दायरे में रखा गया.
सरकार के इस कदम का एक बड़ा असर उन अभ्यर्थियों पर पड़ा, जो पहले ही परीक्षा पास कर चुके थे और नियुक्त होकर सरकारी विभागों में काम कर रहे थे. उनके सामने अचानक नौकरी जाने का खतरा खड़ा हो गया. ऐसे अभ्यर्थियों का कहना था कि यदि किसी परीक्षा में वास्तविक रूप से गड़बड़ी हुई है तो दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन सभी सफल अभ्यर्थियों को एक ही नजर से देखना उचित नहीं है. इसी मुद्दे को लेकर चयनित अभ्यर्थियों ने भी विरोध प्रदर्शन किया और सरकार से अधिसूचना वापस लेने की मांग की.
प्रदर्शन कर रहे अभ्यर्थियों और याचिकाकर्ताओं की प्रमुख दलील यह रही कि परीक्षा में कथित अनियमितता और प्रत्येक चयनित अभ्यर्थी की व्यक्तिगत भूमिका दो अलग-अलग प्रश्न हैं. यदि किसी खास अभ्यर्थी के खिलाफ पेपर लीक, अनुचित साधन या किसी अन्य गड़बड़ी में शामिल होने के ठोस प्रमाण मिलते हैं तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है. लेकिन जिन अभ्यर्थियों ने अपनी योग्यता और मेरिट के आधार पर चयन हासिल किया है, उनकी नियुक्ति केवल इसलिए समाप्त नहीं की जानी चाहिए कि पूरी भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं.
राज्य सरकार का रुख हालांकि अलग रहा है. सरकार ने भर्ती प्रक्रियाओं में कथित अनियमितताओं की जांच को जरूरी बताते हुए कई परीक्षाओं को रद्द किया है. सरकार की कार्रवाई का उद्देश्य भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना और कथित गड़बड़ियों के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान करना बताया गया है. सरकार के फैसले के बाद छात्र आंदोलनकारियों ने अपना आंदोलन रोकने का फैसला किया था, लेकिन नियुक्त कर्मचारियों और सफल अभ्यर्थियों की ओर से इस निर्णय को चुनौती दिए जाने के बाद विवाद एक बार फिर न्यायिक प्रक्रिया में पहुंच गया.
इस बीच मामले में एक और महत्वपूर्ण कानूनी पहल सामने आई है. सामाजिक कार्यकर्ता हरीशरण देवगन ने कथित परीक्षा अनियमितताओं की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है. याचिका में जांच को राज्य की एजेंसी से केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपने की मांग की गई है. इसमें परीक्षा से जुड़े भौतिक और डिजिटल साक्ष्यों, मूल OMR कार्बन कॉपियों, CCTV फुटेज और सर्वर ऑडिट लॉग जैसे रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की मांग भी की गई है.
ऐसे में झारखंड हाईकोर्ट का गुरुवार का आदेश उन हजारों अभ्यर्थियों के लिए तत्काल राहत लेकर आया है, जिनकी सरकारी नौकरी पर संकट मंडरा रहा था. हालांकि अदालत ने अभी यह तय नहीं किया है कि सरकार द्वारा उठाए गए कदम पूरी तरह सही हैं या गलत. फिलहाल नियुक्तियां रद्द करने वाले आदेश के अमल पर रोक है और सरकार को अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखना होगा. मामले की अगली सुनवाई में सरकार की ओर से जांच, कथित अनियमितताओं और नियुक्तियां रद्द करने के आधार से संबंधित जानकारी पेश किए जाने की संभावना है.
झारखंड में यह विवाद केवल कुछ भर्ती परीक्षाओं तक सीमित नहीं रह गया है. इसके केंद्र में सरकारी नौकरी की चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता, परीक्षा में पारदर्शिता और चयनित अभ्यर्थियों के अधिकार जैसे महत्वपूर्ण सवाल हैं. एक तरफ लंबे समय से परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों का कहना है कि यदि भर्ती प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है तो उसे उजागर कर दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए. दूसरी तरफ चयनित और नियुक्त अभ्यर्थी यह सवाल उठा रहे हैं कि बिना व्यक्तिगत दोष साबित किए उनकी नौकरी क्यों समाप्त की जाए.
हाईकोर्ट के अंतरिम आदेश ने फिलहाल इसी टकराव के बीच नियुक्त अभ्यर्थियों को राहत दी है. 11वीं से 13वीं JPSC परीक्षाओं के जरिए सरकारी सेवा में पहुंचे 2,600 से अधिक लोगों पर तत्काल नौकरी जाने का खतरा टल गया है. हालांकि यह राहत अंतरिम है और अंतिम निर्णय अभी बाकी है. आगे की सुनवाई में अदालत यह देखेगी कि सरकार के पास परीक्षाओं और नियुक्तियों को रद्द करने के लिए पर्याप्त कानूनी और तथ्यात्मक आधार है या नहीं. तब तक इन नियुक्तियों को रद्द करने वाली अधिसूचनाओं पर रोक प्रभावी रहेगी.
इस फैसले के बाद झारखंड में JPSC भर्ती विवाद का अगला चरण अब अदालत की सुनवाई और जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा. सरकार के सामने जहां कथित अनियमितताओं की निष्पक्ष जांच कराने और दोषियों पर कार्रवाई करने की चुनौती है, वहीं चयनित अभ्यर्थियों के अधिकारों की रक्षा भी बड़ा सवाल बना हुआ है. हाईकोर्ट का अंतिम फैसला इस बात को तय करने में महत्वपूर्ण होगा कि कथित परीक्षा गड़बड़ियों के मामले में सामूहिक रूप से नियुक्तियां रद्द की जा सकती हैं या व्यक्तिगत दोष और साक्ष्यों के आधार पर ही कार्रवाई करनी होगी.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

