जबलपुर. रेलवे की टिकट बिक्री से प्राप्त राजस्व में 4.47 लाख रुपये की कथित कमी के मामले में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने मुख्य बुकिंग पर्यवेक्षक के पद पर कार्यरत महिला कर्मचारी को अग्रिम जमानत देने से इनकार कर दिया है. न्यायालय ने माना कि मामले की जांच अभी प्रारंभिक चरण में है और आरोपी महिला की वास्तविक भूमिका तथा अन्य आरोपी कर्मचारियों के साथ उसके कथित संबंधों की पूरी तस्वीर सामने आना बाकी है. ऐसी स्थिति में जांच के दौरान हिरासत में लेकर पूछताछ की आवश्यकता से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता.
जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की पीठ ने अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि इस स्तर पर अदालत साक्ष्यों का विस्तृत परीक्षण करके यह निष्कर्ष नहीं निकाल सकती कि महिला कर्मचारी की कथित अपराध में कोई भूमिका नहीं है. अभियोजन का मामला केवल उस कर्मचारी तक सीमित नहीं है, जिसने संबंधित बुकिंग काउंटर पर टिकट बिक्री की राशि संभाली थी, बल्कि रेलवे कर्मचारियों के बीच पूर्व नियोजित साजिश का आरोप भी जांच के दायरे में है. ऐसे में किसी एक कर्मचारी की भूमिका को अलग करके देखना इस चरण पर उचित नहीं होगा.
मामला रेलवे के एक बुकिंग कार्यालय में टिकट बिक्री से प्राप्त राशि में सामने आई कमी से जुड़ा है. जांच में करीब 4.47 लाख रुपये की राशि का हिसाब नहीं मिलने का आरोप लगाया गया है. इस मामले में सहायक मुख्य बुकिंग पर्यवेक्षक, मुख्य बुकिंग पर्यवेक्षक, स्टेशन प्रबंधक सहित अन्य रेलवे कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में बताई गई है. अभियोजन पक्ष का आरोप है कि यह केवल नकदी संभालने वाले कर्मचारी की व्यक्तिगत गलती का मामला नहीं हो सकता, बल्कि इसके पीछे कर्मचारियों के बीच आपसी मिलीभगत और पूर्व नियोजित साजिश की संभावना की जांच जरूरी है.
महिला कर्मचारी की ओर से हाई कोर्ट में दलील दी गई कि उसे संदेह और अनुमान के आधार पर मामले में आरोपी बनाया गया है. बचाव पक्ष का कहना था कि उसके खिलाफ ऐसा कोई प्रत्यक्ष और विश्वसनीय साक्ष्य सामने नहीं है, जिससे यह साबित हो कि उसने रेलवे की राशि के कथित गबन में सीधे भाग लिया. याचिकाकर्ता ने अपनी ओर से यह भी बताया कि जिस अवधि में टिकट बिक्री की राशि में कमी सामने आई, उस समय वह स्वीकृत अवकाश पर थी.
बचाव पक्ष के अनुसार कथित राशि की कमी 4 और 5 दिसंबर 2024 को सामने आई थी, जबकि इस संबंध में प्राथमिकी 15 जनवरी 2026 को दर्ज की गई. महिला कर्मचारी की ओर से इस अवधि के अंतर को भी अपनी दलील का आधार बनाया गया. उसका कहना था कि घटना और प्राथमिकी के बीच एक वर्ष से अधिक का अंतर है और अभियोजन की ओर से इस देरी का संतोषजनक कारण स्पष्ट नहीं किया गया है.
याचिकाकर्ता ने अदालत को यह भी बताया कि संबंधित तारीखों पर वह न तो उस बुकिंग काउंटर पर तैनात थी और न ही रेलवे की नकदी उसके प्रत्यक्ष नियंत्रण में थी. इसके अलावा विभागीय स्तर पर हुई जांच का हवाला देते हुए बचाव पक्ष ने कहा कि कथित तौर पर जिस कर्मचारी की संबंधित काउंटर और नकदी के संचालन में प्रत्यक्ष जिम्मेदारी थी, विभागीय जांच में उसकी भूमिका निर्धारित की गई थी. ऐसे में महिला कर्मचारी को आपराधिक मामले में आरोपी बनाए जाने का आधार कमजोर बताया गया.
महिला कर्मचारी की ओर से यह भी कहा गया कि वह रेलवे की स्थायी कर्मचारी है, उसका सेवा रिकॉर्ड साफ है और उसके खिलाफ पहले से कोई आपराधिक मामला दर्ज नहीं है. बचाव पक्ष ने इन परिस्थितियों के आधार पर कहा कि आरोपी को हिरासत में लेकर पूछताछ की जरूरत नहीं है और जांच के दौरान वह पुलिस के साथ सहयोग करने के लिए तैयार है. इसी आधार पर अदालत से अग्रिम जमानत देने का अनुरोध किया गया.
वहीं राज्य की ओर से अग्रिम जमानत का विरोध करते हुए मामले की गंभीरता पर जोर दिया गया. अभियोजन ने कहा कि मामला सार्वजनिक धन से जुड़ा है और रेलवे की टिकट बिक्री से प्राप्त राशि में बड़ी कमी सामने आई है. जांच एजेंसी को यह पता लगाना है कि राशि किस तरह गायब हुई और इस प्रक्रिया में कौन-कौन लोग शामिल थे. अभियोजन के अनुसार जांच का दायरा केवल उस व्यक्ति तक सीमित नहीं किया जा सकता, जो सीधे नकदी संभाल रहा था, क्योंकि कर्मचारियों के बीच कथित साजिश की भी जांच की जा रही है.
हाई कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद कहा कि अग्रिम जमानत के चरण में अदालत को मामले के साक्ष्यों का विस्तृत मूल्यांकन नहीं करना होता. इस स्तर पर यह देखना होता है कि जांच के लिए हिरासत में पूछताछ की आवश्यकता की संभावना है या नहीं. पीठ ने माना कि मामले में आरोपित राशि, अपराध की प्रकृति और कथित साजिश की जांच को देखते हुए आरोपी की भूमिका अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है.
न्यायालय ने विशेष रूप से इस दलील पर भी विचार किया कि महिला कर्मचारी घटना के समय अवकाश पर थी और नकदी उसके सीधे नियंत्रण में नहीं थी. अदालत ने माना कि ये परिस्थितियां जांच के दौरान प्रासंगिक हो सकती हैं, लेकिन इन्हीं के आधार पर इस स्तर पर उसकी भूमिका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता. यदि अभियोजन का आरोप व्यापक साजिश से जुड़ा है तो प्रत्येक आरोपी की भूमिका अलग-अलग जांच के बाद ही स्पष्ट होगी.
पीठ ने विभागीय जांच में किसी दूसरे कर्मचारी की जिम्मेदारी तय होने संबंधी दलील को भी निर्णायक नहीं माना. न्यायालय ने कहा कि विभागीय जांच के निष्कर्ष किसी मामले में एक प्रासंगिक परिस्थिति हो सकते हैं, लेकिन उनसे आपराधिक जिम्मेदारी स्वतः समाप्त नहीं हो जाती. विभागीय कार्यवाही और आपराधिक जांच के उद्देश्य और मानदंड अलग होते हैं. इसलिए विभागीय जांच में किसी कर्मचारी की जिम्मेदारी तय होना दूसरे व्यक्ति के खिलाफ चल रही आपराधिक जांच को अपने आप समाप्त नहीं कर सकता.
एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी पर भी हाई कोर्ट ने बचाव पक्ष को राहत नहीं दी. अदालत ने माना कि प्राथमिकी दर्ज होने में देरी अपने आप में अभियोजन के मामले को झूठा या दुर्भावनापूर्ण साबित नहीं करती. देरी के कारणों और उसके प्रभाव का मूल्यांकन जांच तथा मुकदमे की आगे की प्रक्रिया में किया जा सकता है. इस चरण पर केवल देरी के आधार पर अग्रिम जमानत देना उचित नहीं होगा.
न्यायालय ने यह भी माना कि जांच एजेंसी के सामने अभी कई महत्वपूर्ण सवाल हैं. टिकट बिक्री से प्राप्त राशि में कमी किस स्तर पर हुई, रिकॉर्ड में वास्तविक स्थिति क्या थी, संबंधित कर्मचारियों की जिम्मेदारियां क्या थीं और क्या किसी स्तर पर आपसी मिलीभगत हुई—इन सभी पहलुओं की जांच आवश्यक है. इसके लिए बुकिंग रिकॉर्ड, नकदी संबंधी दस्तावेज, ड्यूटी चार्ट, विभागीय अभिलेख और अन्य संबंधित दस्तावेजों की जांच की जा सकती है. साथ ही मामले से जुड़े कर्मचारियों और अन्य व्यक्तियों के बयान भी महत्वपूर्ण होंगे.
अदालत की नजर में जांच की यही अपूर्ण स्थिति अग्रिम जमानत के खिलाफ महत्वपूर्ण आधार बनी. पीठ ने अपराध की गंभीरता, रेलवे की राशि से जुड़े आरोप, कथित पूर्व नियोजित साजिश और महिला कर्मचारी की भूमिका के अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं होने जैसी परिस्थितियों को ध्यान में रखा. अदालत ने माना कि जांच की दिशा तय करने और आरोपियों की वास्तविक भूमिका सामने लाने के लिए आवश्यक पूछताछ को केवल अग्रिम जमानत देकर सीमित करना उचित नहीं होगा.
इस आधार पर हाई कोर्ट ने महिला कर्मचारी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी. हालांकि अदालत का यह आदेश आरोपी को दोषी ठहराने वाला निर्णय नहीं है. फिलहाल आरोपों की जांच चल रही है और अंतिम निष्कर्ष जांच में सामने आने वाले साक्ष्यों तथा आगे की न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही तय होगा.
रेलवे जैसे सार्वजनिक परिवहन तंत्र में टिकट बिक्री से प्राप्त राजस्व का हिसाब-किताब अत्यंत महत्वपूर्ण होता है. प्रतिदिन बड़ी संख्या में यात्रियों से टिकट के माध्यम से राशि प्राप्त होती है और उसके प्रत्येक हिस्से का लेखा निर्धारित प्रक्रिया के तहत रखा जाता है. ऐसे में लाखों रुपये की कमी सामने आना केवल आर्थिक नुकसान का विषय नहीं, बल्कि राजस्व प्रबंधन और आंतरिक निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है.
इस मामले में हाई कोर्ट के आदेश का व्यापक महत्व इस बात में है कि न्यायालय ने किसी कर्मचारी की केवल पदस्थिति, सेवा रिकॉर्ड या घटना के समय अवकाश पर होने को उसकी कथित आपराधिक भूमिका से स्वतः मुक्त करने वाला आधार नहीं माना. साथ ही अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि विभागीय जांच और आपराधिक जांच को एक ही कसौटी पर नहीं देखा जा सकता. अब जांच एजेंसी को यह स्पष्ट करना होगा कि 4.47 लाख रुपये की कमी कैसे हुई और इसमें प्रत्येक आरोपी की वास्तविक भूमिका क्या थी. मामले की आगे की दिशा इसी जांच और सामने आने वाले साक्ष्यों से तय होगी.
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