पिता की सहमति के बिना भी नाबालिग को पासपोर्ट देना होगा, हाईकोर्ट ने विदेश में पढ़ाई के अधिकार पर सुनाया बड़ा फैसला

पिता की सहमति के बिना भी नाबालिग को पासपोर्ट देना होगा, हाईकोर्ट ने विदेश में पढ़ाई के अधिकार पर सुनाया बड़ा फैसला

प्रेषित समय :16:50:45 PM / Sat, Aug 22nd, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

जोधपुर. माता-पिता के बीच वैवाहिक संबंध समाप्त हो जाने के बाद यदि नाबालिग बच्चे की देखभाल और अभिरक्षा मां के पास है, तो केवल पिता की सहमति नहीं मिलने के आधार पर उसके पासपोर्ट का रास्ता नहीं रोका जा सकता. राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि बच्चे के भविष्य और शिक्षा से जुड़े अधिकार को माता-पिता में से किसी एक की इच्छा पर निर्भर नहीं किया जा सकता. अदालत ने पासपोर्ट प्राधिकरण को नाबालिग को बिना अनावश्यक देरी के पासपोर्ट जारी करने का निर्देश दिया है.

न्यायमूर्ति अनूप कुमार ढांड की पीठ ने यह फैसला उस याचिका पर सुनाया, जिसमें नाबालिग ने अपनी मां के माध्यम से पासपोर्ट जारी करने की मांग की थी. मामला ऐसे परिवार से जुड़ा था, जिसमें माता-पिता के बीच वर्ष 2022 में तलाक हो चुका था और बच्चा मां की देखभाल में रह रहा था. बच्चे की ओर से अदालत को बताया गया कि वह आगे की पढ़ाई के लिए विदेश जाना चाहता है, लेकिन पासपोर्ट के आवेदन में पिता की सहमति नहीं होने के कारण प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ पा रही थी.

अदालत के सामने मूल सवाल यह था कि क्या अलग रह रहे या तलाकशुदा माता-पिता में से एक की सहमति नहीं मिलने मात्र से नाबालिग के पासपोर्ट आवेदन को रोका जा सकता है. हाईकोर्ट ने इस प्रश्न का उत्तर बच्चे के संवैधानिक अधिकारों के पक्ष में दिया. अदालत ने माना कि पासपोर्ट केवल विदेश जाने का दस्तावेज नहीं है, बल्कि उस अधिकार तक पहुंच का माध्यम है जिसे संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत व्यक्तिगत स्वतंत्रता के व्यापक दायरे में मान्यता प्राप्त है.

सुनवाई के दौरान पासपोर्ट प्राधिकरण की ओर से यह तर्क रखा गया कि अलग रह रहे माता-पिता की स्थिति में संबंधित नियमों के अनुसार आवश्यक सहमति की जरूरत होती है. प्राधिकरण की ओर से यह भी कहा गया कि तलाक के आदेश में बच्चे की अभिरक्षा के संबंध में स्थिति पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं है. ऐसे में दोनों माता-पिता की सहमति जरूरी हो सकती है.

हाईकोर्ट ने मामले के रिकॉर्ड और तलाक की कार्यवाही की जांच की तो पाया कि बच्चा अपनी मां की अभिरक्षा में था. अदालत ने यह भी ध्यान दिया कि पिता ने बच्चे की अभिरक्षा हासिल करने के लिए अभिभावक एवं वार्ड अधिनियम के तहत कोई आवेदन दाखिल नहीं किया था. इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने मां की स्थिति को बच्चे की देखभाल और अभिरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण तथ्य माना.

मामले में बच्चे की शैक्षणिक उपलब्धियों को भी अदालत ने नजरअंदाज नहीं किया. रिकॉर्ड के अनुसार उसने माध्यमिक स्तर की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की थी और आगे बेहतर शिक्षा के लिए विदेश जाने की इच्छा जताई थी. अदालत ने माना कि जब बच्चा अपनी शिक्षा और करियर को आगे बढ़ाने के लिए विदेश जाना चाहता है, तब केवल माता-पिता के बीच मौजूद मतभेद को उसके भविष्य के रास्ते में बाधा नहीं बनने दिया जा सकता.

पीठ ने इस मामले को केवल पासपोर्ट जारी करने की प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं माना. अदालत ने कहा कि बच्चे का भविष्य उसके माता-पिता में से किसी एक की इच्छा या असहमति के अधीन नहीं छोड़ा जा सकता. यदि किसी नाबालिग को उच्च शिक्षा या करियर के अवसर के लिए विदेश जाना है और उसके पास यात्रा के लिए आवश्यक दस्तावेज नहीं है, तो केवल तकनीकी आधार पर पासपोर्ट रोकना उसके अधिकारों को प्रभावित कर सकता है.

अदालत की टिप्पणी का महत्वपूर्ण पहलू यह रहा कि उसने बच्चे के हित को माता-पिता के बीच व्यक्तिगत विवाद से अलग करके देखने की आवश्यकता पर जोर दिया. तलाक के बाद अभिभावकों के बीच मतभेद या संपर्क की कमी का खामियाजा बच्चे को नहीं भुगतना चाहिए. यदि बच्चा विधिसम्मत रूप से मां की देखरेख में है और पिता ने उसकी अभिरक्षा को लेकर कोई कानूनी दावा आगे नहीं बढ़ाया है, तो महज सहमति के अभाव को पासपोर्ट जारी करने से इनकार का आधार नहीं बनाया जा सकता.

हाईकोर्ट ने विदेश यात्रा के अधिकार को भी व्यापक संवैधानिक परिप्रेक्ष्य में देखा. पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की सुरक्षा का दायरा केवल देश की सीमाओं के भीतर रहने तक सीमित नहीं है. विदेश यात्रा का अधिकार भी व्यक्तिगत स्वतंत्रता के क्षेत्र में आता है. हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रत्येक व्यक्ति को बिना किसी वैधानिक प्रक्रिया के विदेश जाने का अधिकार मिल जाता है, लेकिन जहां कानूनन आवश्यक शर्तें पूरी हो रही हों, वहां किसी मनमाने या केवल तकनीकी आधार पर यात्रा के अवसर को रोका नहीं जा सकता.

अदालत ने पासपोर्ट नियमों में उपलब्ध व्यवस्था की ओर भी ध्यान दिलाया. पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि माता-पिता में से कोई एक सहमति देने से इनकार करता है, तब भी निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुए नाबालिग को पासपोर्ट जारी किया जा सकता है. इसके लिए संबंधित मामले में एनेक्शर-सी जमा किया जा सकता है. इस व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे मामलों में रास्ता उपलब्ध कराना है, जहां माता-पिता के बीच सहमति संभव नहीं है, लेकिन बच्चे का वैध हित पासपोर्ट जारी करने में है.

इस टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि प्रशासनिक नियमों की व्याख्या इस तरह नहीं की जा सकती, जिससे उनका प्रभाव बच्चे के मूल अधिकारों को अनावश्यक रूप से सीमित करने वाला हो जाए. पासपोर्ट अधिकारी की भूमिका दस्तावेजों और कानूनी शर्तों की जांच तक है, लेकिन किसी अभिभावक की असहमति को अपने आप में बच्चे के भविष्य के विरुद्ध निर्णायक आधार नहीं बनाया जा सकता.

मामले में यह तथ्य भी महत्वपूर्ण रहा कि पिता ने बच्चे की अभिरक्षा को लेकर किसी सक्षम न्यायालय के समक्ष अपना दावा प्रस्तुत नहीं किया था. ऐसे में केवल इस आधार पर कि वह जैविक पिता है और उसकी सहमति उपलब्ध नहीं है, बच्चे की शिक्षा से जुड़े अवसर को रोकना उचित नहीं माना गया. अदालत ने इस पूरे विवाद को बच्चे के हित के दृष्टिकोण से देखने पर जोर दिया.

हाईकोर्ट ने विदेश में पढ़ाई को भी बदलते सामाजिक और शैक्षणिक परिवेश से जोड़कर देखा. अदालत ने कहा कि आज उच्च शिक्षा और बेहतर करियर के लिए विदेश जाना केवल विलासिता या शौक का विषय नहीं रह गया है. विद्यार्थियों के लिए अंतरराष्ट्रीय शिक्षा के अवसर उनके भविष्य को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. ऐसे में किसी नाबालिग की वास्तविक शैक्षणिक आकांक्षा को केवल माता-पिता के आपसी विवाद के कारण समाप्त नहीं किया जा सकता.

पीठ की यह टिप्पणी ऐसे मामलों के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, जिनमें तलाक या अलगाव के बाद बच्चे की अभिरक्षा एक अभिभावक के पास रहती है और दूसरा अभिभावक पासपोर्ट या विदेश यात्रा के लिए सहमति देने से इनकार करता है. फैसले से यह संदेश निकलता है कि बच्चे के हित और उसके संवैधानिक अधिकारों का मूल्यांकन माता-पिता के निजी मतभेदों से स्वतंत्र रूप से किया जाना चाहिए.

हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पासपोर्ट जारी करने का मतलब विदेश यात्रा से जुड़े अन्य सभी कानूनी प्रतिबंध समाप्त होना नहीं है. पासपोर्ट जारी होने के बाद भी विदेश यात्रा के लिए लागू कानून, आव्रजन नियम और अन्य आवश्यक औपचारिकताएं अपनी जगह प्रभावी रहेंगी. हाईकोर्ट का निर्देश विशेष रूप से उस बाधा से संबंधित था, जो पिता की सहमति नहीं होने के कारण पासपोर्ट जारी करने की प्रक्रिया में उत्पन्न हुई थी.

अदालत ने मामले के सभी तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद रिट याचिका स्वीकार कर ली. पासपोर्ट अधिकारी को निर्देश दिया गया कि वह बिना अनावश्यक देरी के याचिकाकर्ता को पासपोर्ट जारी करे. इस आदेश के साथ अदालत ने स्पष्ट किया कि अलग रह रहे या तलाकशुदा माता-पिता के बीच सहमति का अभाव अपने आप में बच्चे के पासपोर्ट के अधिकार को समाप्त नहीं करता.

यह फैसला इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि इसमें बच्चे को माता-पिता के विवाद का पक्षकार नहीं, बल्कि स्वतंत्र अधिकारों वाला व्यक्ति माना गया है. अदालत ने उसके भविष्य, शिक्षा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विदेश यात्रा के अधिकार को केंद्र में रखते हुए प्रशासनिक प्रक्रिया की समीक्षा की. संदेश साफ है कि अभिभावकों के बीच संबंधों में आई दरार का असर बच्चे की शिक्षा और उसके भविष्य के अवसरों पर नहीं पड़ना चाहिए.

मामला रिद्धम देवरा बनाम भारत संघ, एस.बी. सिविल रिट याचिका संख्या 17014/2026 से संबंधित है. राजस्थान हाईकोर्ट के इस निर्णय ने नाबालिगों के पासपोर्ट से जुड़े मामलों में अभिभावकीय सहमति और बच्चे के संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर महत्वपूर्ण दिशा स्पष्ट की है.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-