अहमदाबाद. गुजरात के दाहोद जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने बीमा दावे से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बीमा कंपनी को मुंह के कैंसर के इलाज पर खर्च हुई पूरी राशि का भुगतान करने का आदेश दिया है. आयोग ने पाया कि संबंधित बीमा पॉलिसी की शर्तों में तंबाकू सेवन को लेकर ऐसा कोई स्पष्ट अपवाद या निषेध नहीं था, जिसके आधार पर कंपनी इलाज के खर्च का बड़ा हिस्सा देने से इनकार कर सके. आयोग ने बीमा कंपनी को मृतक बीमाधारक के वारिसों को इलाज पर खर्च हुई राशि का भुगतान करने के साथ मानसिक परेशानी और मुकदमे के खर्च के लिए अतिरिक्त राशि देने का भी निर्देश दिया.
मामला रामचंद्र पमनानी से जुड़ा है, जिन्हें मुंह का कैंसर होने के बाद अहमदाबाद के एक अस्पताल में इलाज के लिए भर्ती कराया गया था. इलाज के दौरान उनके उपचार पर करीब 13.21 लाख रुपये खर्च हुए. इसके बाद उनके परिवार की ओर से यूनाइटेड इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड के समक्ष बीमा दावा पेश किया गया. बीमा कंपनी ने पूरे खर्च की भरपाई करने के बजाय केवल करीब 2.33 लाख रुपये का भुगतान किया और शेष राशि देने से इनकार कर दिया.
बीमा कंपनी का तर्क था कि पमनानी को हुआ कैंसर तंबाकू के सेवन से संबंधित था. कंपनी ने इसी आधार पर बाकी उपचार खर्च का भुगतान करने से इनकार किया. इसके बाद पमनानी के परिवार ने वर्ष 2021 में दाहोद जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के समक्ष शिकायत दाखिल की और बीमा कंपनी से पॉलिसी के तहत पूरी राशि दिलाने की मांग की.
मामले की सुनवाई के दौरान बीमा कंपनी की ओर से मरीज के इलाज से संबंधित प्रमाण-पत्र तथा दो अस्पतालों की चिकित्सकीय राय रिकॉर्ड पर रखी गई. हालांकि, आयोग ने पाया कि जिन डॉक्टरों ने इलाज किया था, उनकी ओर से आवश्यक शपथ-पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया. दूसरी ओर, शिकायतकर्ता पक्ष ने इस बात पर जोर दिया कि बीमा पॉलिसी में तंबाकू सेवन को इलाज के खर्च से बाहर रखने वाली कोई स्पष्ट शर्त मौजूद नहीं थी.
आयोग ने पॉलिसी की शर्तों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद बीमा कंपनी के तर्क को स्वीकार नहीं किया. आयोग ने कहा कि यदि बीमा कंपनी किसी बीमारी या उसके संभावित कारण को पॉलिसी के दायरे से बाहर रखना चाहती है तो इसके लिए पॉलिसी की शर्तों में स्पष्ट प्रावधान होना जरूरी है. केवल यह दावा कर देना कि बीमारी तंबाकू सेवन के कारण हुई, अपने आप में बीमा दावे को अस्वीकार करने का पर्याप्त आधार नहीं बन सकता, खासकर तब जब पॉलिसी में इस संबंध में स्पष्ट बहिष्करण की शर्त नहीं हो.
उपभोक्ता आयोग ने पाया कि संबंधित बीमा पॉलिसी के नियमों में तंबाकू का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं था. ऐसे में बीमा कंपनी द्वारा इलाज पर हुए खर्च की शेष राशि रोकना उचित नहीं माना जा सकता. आयोग ने शिकायतकर्ता के वारिसों को पूरी पात्र बीमा राशि का भुगतान करने का निर्देश दिया.
आयोग ने बीमा कंपनी को आदेश दिया कि आदेश की तारीख से दो महीने के भीतर इलाज पर खर्च हुई राशि का भुगतान किया जाए. इसके अलावा मानसिक परेशानी के लिए दो हजार रुपये और मुकदमे के खर्च के रूप में भी दो हजार रुपये देने का निर्देश दिया गया. इस तरह आयोग ने बीमा कंपनी को केवल मूल बीमा दावे के भुगतान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि शिकायतकर्ता पक्ष को हुई परेशानी और कानूनी प्रक्रिया में हुए खर्च के लिए भी अतिरिक्त राशि देने को कहा.
मामले में बीमा कंपनी ने यह दावा किया था कि मरीज के तंबाकू सेवन और कैंसर के बीच संबंध होने के कारण उपचार खर्च की पूरी राशि का भुगतान उसकी जिम्मेदारी नहीं है. लेकिन आयोग ने इस तर्क को पॉलिसी की स्पष्ट शर्तों के अभाव में स्वीकार नहीं किया. आयोग के आदेश का मूल आधार यह रहा कि बीमा अनुबंध में जिस बीमारी, आदत या परिस्थिति को अपवर्जित किया गया हो, उसका स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए. बीमाधारक को ऐसी शर्त के आधार पर बाद में वंचित नहीं किया जा सकता, जिसका पॉलिसी में स्पष्ट प्रावधान ही नहीं है.
यह फैसला बीमा पॉलिसी लेने वाले उपभोक्ताओं के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. बीमा कंपनियां उपचार से जुड़े दावों की जांच करते समय बीमारी के कारण, पूर्व चिकित्सा इतिहास और पॉलिसी की शर्तों को आधार बनाती हैं. ऐसे में किसी दावे को खारिज करने या राशि कम करने के लिए पॉलिसी में मौजूद स्पष्ट शर्तों का महत्व बढ़ जाता है.
मामले में आयोग ने यह भी देखा कि कंपनी ने मरीज के इलाज से जुड़े दस्तावेज और चिकित्सकीय राय तो प्रस्तुत की, लेकिन इलाज करने वाले चिकित्सकों के शपथ-पत्र रिकॉर्ड पर नहीं रखे गए. इसके बावजूद कंपनी ने तंबाकू सेवन को आधार बनाकर बड़ी राशि का भुगतान रोक दिया था. आयोग ने उपलब्ध रिकॉर्ड और पॉलिसी की शर्तों के आधार पर शिकायतकर्ता के पक्ष में निर्णय दिया.
फैसले के बाद अब बीमा कंपनी को मृतक बीमाधारक के वारिसों को उपचार के दौरान खर्च हुई शेष पात्र राशि का भुगतान करना होगा. आयोग ने इसके लिए दो महीने की समय-सीमा निर्धारित की है. साथ ही मानसिक परेशानी और कानूनी खर्च के लिए निर्धारित अतिरिक्त राशि भी देनी होगी.
उपभोक्ता कानून के जानकारों के मुताबिक इस तरह के मामलों में बीमा कंपनी और बीमाधारक के बीच अनुबंध की शर्तें सबसे महत्वपूर्ण होती हैं. किसी बीमारी का संभावित कारण अपने आप में बीमा दावे को समाप्त करने का आधार नहीं बनता, यदि संबंधित कारण या बीमारी को पॉलिसी में स्पष्ट रूप से बाहर नहीं रखा गया हो. हालांकि प्रत्येक बीमा मामले में अंतिम निर्णय संबंधित पॉलिसी की वास्तविक शर्तों और मामले में उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही किया जाएगा.
दाहोद जिला उपभोक्ता आयोग के इस आदेश ने ऐसे मामलों में बीमा कंपनियों द्वारा दावों की जांच और उन्हें अस्वीकार करने के तरीके को लेकर महत्वपूर्ण सवाल उठाया है. आयोग ने स्पष्ट किया कि पॉलिसी में स्पष्ट शर्त के अभाव में केवल तंबाकू सेवन का हवाला देकर कैंसर के इलाज के खर्च की देनदारी से पूरी तरह बचा नहीं जा सकता. मृतक बीमाधारक के परिवार को अब उपचार पर खर्च हुई राशि की शेष रकम मिलने का रास्ता साफ हो गया है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

