हिमाचल में 1000 से ज्यादा ग्लेशियल झीलों ने बढ़ाया खतरा, तेजी से सिकुड़ रहे ग्लेशियर से तबाही का डर

हिमाचल में 1000 से ज्यादा ग्लेशियल झीलों ने बढ़ाया खतरा, तेजी से सिकुड़ रहे ग्लेशियर से तबाही का डर

प्रेषित समय :18:03:24 PM / Thu, Aug 27th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

शिमला. हिमाचल प्रदेश के ऊंचाई वाले इलाकों में तेजी से सिकुड़ते ग्लेशियर और उनके पिघलने से बन रही ग्लेशियल झीलों ने भविष्य के खतरे की चिंता बढ़ा दी है. राज्य में ऐसी झीलों की संख्या वर्ष 2019 में दर्ज 562 से बढ़कर अब एक हजार से अधिक हो गई है. इनमें कई झीलें ऐसी हैं, जिन्हें संवेदनशील माना जा रहा है. इन झीलों के अचानक टूटने या उनमें जमा पानी के तेज बहाव के रूप में नीचे की ओर आने से ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड यानी हिमनदीय झील फटने से अचानक बाढ़ का खतरा पैदा हो सकता है. हिमाचल प्रदेश विधानसभा के मानसून सत्र में यह मुद्दा उठने के बाद पहाड़ी क्षेत्रों में बढ़ते प्राकृतिक खतरे को लेकर सरकार और विशेषज्ञों की चिंता सामने आई है.

नेपाल में हाल में हुई भीषण प्राकृतिक आपदा के संदर्भ में हिमालयी राज्यों की संवेदनशीलता पर भी चर्चा हुई. हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने नेपाल में प्राकृतिक आपदा में जान गंवाने वाले लोगों के प्रति शोक व्यक्त करते हुए इसे हिमालयी क्षेत्र में गहराते जलवायु संकट का गंभीर संकेत बताया. विधानसभा में मृतकों की आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन भी रखा गया. इस दौरान हिमालयी राज्यों में बदलते मौसम, बढ़ते तापमान और ग्लेशियरों की स्थिति को लेकर चिंता जताई गई.

मुख्यमंत्री ने कहा कि मौसम के बदलते मिजाज और तापमान में हो रहे बदलाव का सबसे गंभीर असर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों में दिखाई दे रहा है. हिमालयी क्षेत्र में तापमान बढ़ने के साथ ग्लेशियरों के सिकुड़ने की प्रक्रिया तेज हो रही है. इसका सीधा असर उन क्षेत्रों पर पड़ रहा है जहां ग्लेशियरों से निकलने वाला पानी प्राकृतिक झीलों और जलस्रोतों में जमा होता है. यदि किसी झील की प्राकृतिक सीमा कमजोर पड़ती है और अचानक बड़ी मात्रा में पानी बाहर निकलता है तो नीचे बसे क्षेत्रों के लिए स्थिति बेहद गंभीर हो सकती है.

हिमाचल प्रदेश के सतलुज, ब्यास, रावी और चिनाब नदी बेसिन में स्थित ग्लेशियरों की स्थिति को लेकर विशेष चिंता जताई गई है. तापमान बढ़ने के कारण इन क्षेत्रों में ग्लेशियरों का दायरा लगातार कम हो रहा है. ग्लेशियरों के पिघलने से निकलने वाला पानी कई स्थानों पर प्राकृतिक अवरोधों के पीछे जमा होकर झीलों का रूप ले रहा है. ऐसी झीलों में पानी की मात्रा लगातार बढ़ती रहे और उनका प्राकृतिक बांध कमजोर हो जाए तो अचानक बाढ़ की स्थिति बन सकती है.

राज्य में ग्लेशियल झीलों की संख्या में पिछले कुछ वर्षों में हुआ इजाफा इस खतरे को और गंभीर बनाता है. वर्ष 2019 में जहां राज्य में 562 ऐसी झीलें चिह्नित की गई थीं, वहीं अब इनकी संख्या एक हजार से अधिक दर्ज की गई है. संख्या में यह बढ़ोतरी केवल आंकड़ा नहीं है, बल्कि हिमालयी क्षेत्र में तेजी से बदल रही प्राकृतिक परिस्थितियों की ओर भी संकेत करती है. खासतौर पर ऊंचाई वाले इलाकों में नई झीलों का बनना और मौजूदा झीलों के आकार में बदलाव वैज्ञानिकों तथा आपदा प्रबंधन से जुड़े अधिकारियों के लिए निगरानी का विषय बन गया है.

राज्य में चिह्नित उच्च जोखिम वाली ग्लेशियल झीलों में से 48 झीलें हिमाचल प्रदेश में स्थित बताई गई हैं. यह संख्या देश के हिमालयी राज्यों में सर्वाधिक बताई जा रही है. यही वजह है कि राज्य सरकार के लिए ग्लेशियरों और उनसे बनने वाली झीलों की लगातार निगरानी करना महत्वपूर्ण हो गया है. उपग्रह आधारित अध्ययन के माध्यम से झीलों के आकार, क्षेत्रफल और उनमें होने वाले बदलाव पर नजर रखी जा रही है, ताकि संभावित खतरे का पहले से आकलन किया जा सके.

हिमाचल प्रदेश विज्ञान, प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण परिषद, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन और राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण से जुड़े अध्ययनों में भी हिमाचल की नदी घाटियों में ग्लेशियल झीलों के विस्तार की स्थिति सामने आई है. इन अध्ययनों से यह संकेत मिला है कि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में ग्लेशियरों के सिकुड़ने के साथ कई स्थानों पर झीलों का विस्तार हो रहा है. ऐसी परिस्थितियों में किसी एक झील में अचानक बदलाव भी नीचे के इलाकों में रहने वाली आबादी और बुनियादी ढांचे के लिए खतरा पैदा कर सकता है.

सतलुज नदी बेसिन इस मामले में सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में शामिल है. स्पीति, पारछू और किन्नौर के ऊपरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में ग्लेशियल झीलें मौजूद हैं. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार सतलुज बेसिन में 750 से अधिक झीलें चिह्नित की गई हैं. इनमें तिब्बत और किन्नौर से जुड़े ऊंचाई वाले क्षेत्र भी शामिल हैं. इस क्षेत्र में ग्लेशियरों और झीलों की स्थिति में होने वाला बदलाव सतलुज नदी के निचले हिस्सों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है.

चिनाब नदी बेसिन में भी 250 से अधिक ग्लेशियल झीलों की मौजूदगी दर्ज की गई है. चंद्रा, भागा और मियार जैसी उपघाटियों में ग्लेशियरों के आसपास बनने वाली झीलों पर निगरानी जरूरी मानी जा रही है. ऊंचाई वाले इलाकों में भौगोलिक परिस्थितियां कठिन होने के कारण वहां प्रत्यक्ष निगरानी हमेशा आसान नहीं होती. ऐसे में उपग्रह चित्रों और वैज्ञानिक अध्ययनों के जरिए झीलों में हो रहे बदलाव का पता लगाने की कोशिश की जा रही है.

रावी नदी बेसिन में चंबा के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में 60 से अधिक ग्लेशियल झीलों का उल्लेख किया गया है. वहीं ब्यास नदी बेसिन में 90 से अधिक झीलें बताई गई हैं. कुल्लू की ऊपरी घाटियों और पार्वती उपघाटी में भी ग्लेशियरों के आसपास झीलों का विस्तार देखा गया है. अलग-अलग नदी घाटियों में मौजूद इन झीलों की भौगोलिक स्थिति और आकार अलग-अलग हैं, इसलिए सभी झीलों को एक समान जोखिम वाला नहीं माना जा सकता. विशेषज्ञों के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह पता लगाना है कि इनमें से कौन सी झीलें अस्थिर हैं और किनमें अचानक पानी का बहाव बढ़ने की आशंका अधिक है.

सरकार का कहना है कि ग्लेशियर विशेषज्ञों और वैज्ञानिक संस्थानों के साथ लगातार समीक्षा की जा रही है. उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में मौजूद झीलों और ग्लेशियरों की स्थिति का अध्ययन कर संभावित खतरे वाले स्थानों की पहचान करने पर जोर दिया जा रहा है. इसका उद्देश्य किसी आपदा के बाद राहत पहुंचाने के बजाय उससे पहले खतरे का आकलन कर बचाव की तैयारी करना है.

ग्लेशियल झील फटने से आने वाली बाढ़ का प्रभाव केवल नदी के किनारे बसे गांवों तक सीमित नहीं रह सकता. तेज बहाव अपने रास्ते में आने वाली सड़कों, पुलों, बिजली परियोजनाओं, भवनों और अन्य बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचा सकता है. पहाड़ी क्षेत्रों में नदी घाटियां संकरी होने के कारण अचानक आने वाले पानी का असर कई बार कम समय में दूर तक पहुंच सकता है. यही कारण है कि संभावित संवेदनशील झीलों की निगरानी और समय रहते चेतावनी की व्यवस्था को महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

हिमाचल जैसे पहाड़ी राज्य के लिए यह चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यहां बड़ी संख्या में आबादी नदी घाटियों और पर्वतीय ढलानों के आसपास रहती है. राज्य का पर्यटन, जलविद्युत, परिवहन और स्थानीय अर्थव्यवस्था भी पर्वतीय भूगोल से सीधे जुड़ी है. किसी बड़े हिमनदीय बाढ़ के कारण इन क्षेत्रों में जनजीवन के साथ आर्थिक गतिविधियां भी प्रभावित हो सकती हैं.

विधानसभा में उठे इस मुद्दे ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि जलवायु परिवर्तन का असर अब केवल तापमान बढ़ने तक सीमित नहीं है. इसके कारण हिमालयी पारिस्थितिकी में भी बदलाव दिखाई दे रहे हैं. ग्लेशियरों का सिकुड़ना, नई झीलों का बनना और मौजूदा झीलों का आकार बढ़ना ऐसे संकेत हैं, जिनकी लगातार वैज्ञानिक निगरानी जरूरी है.

फिलहाल हिमाचल प्रदेश में एक हजार से अधिक ग्लेशियल झीलों की मौजूदगी और इनमें 48 उच्च जोखिम वाली झीलों का चिह्नित होना सरकार के लिए गंभीर चेतावनी है. विशेषज्ञों की निगरानी, उपग्रह अध्ययन, जोखिम वाली झीलों की पहचान और समय रहते चेतावनी की व्यवस्था ही संभावित आपदा के प्रभाव को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है. नेपाल की त्रासदी ने हिमालयी राज्यों के सामने मौजूद इस खतरे को और स्पष्ट कर दिया है. अब चुनौती यह है कि हिमाचल में तेजी से बदल रहे ग्लेशियरों और उनसे बन रही झीलों की निगरानी को कितना प्रभावी बनाया जाता है, ताकि किसी संभावित आपदा से पहले ही लोगों की सुरक्षा के लिए जरूरी कदम उठाए जा सकें.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-