बेंगलुरु.कर्नाटक की राजनीति में शुक्रवार को उस समय नया मोड़ आ गया, जब मंत्री बी नागेंद्र ने राज्य मंत्रिमंडल के साथ-साथ विधायक पद से भी इस्तीफा देने की घोषणा कर दी. महार्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम में कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर लंबे समय से विपक्ष के निशाने पर रहे नागेंद्र ने कहा कि उन्होंने यह फैसला स्वेच्छा से लिया है, ताकि उनके कारण पार्टी को किसी तरह की असहज स्थिति का सामना न करना पड़े. उनके इस्तीफे ने राज्य सरकार पर विपक्ष के बढ़ते राजनीतिक दबाव और आरोपों की गंभीरता को लेकर नई बहस छेड़ दी है.
नागेंद्र के खिलाफ लगाए गए आरोपों को लेकर भारतीय जनता पार्टी लगातार सरकार पर दबाव बना रही थी. विपक्ष का कहना था कि मामले की निष्पक्ष जांच और राजनीतिक जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए मंत्री को अपने पद से हटना चाहिए. सरकार के सामने चुनौती यह थी कि वह एक ओर आरोपों की जांच को आगे बढ़ाए और दूसरी ओर विपक्ष के लगातार हमलों का राजनीतिक जवाब भी दे. नागेंद्र के कैबिनेट से हटने के फैसले ने फिलहाल इस दबाव का एक बड़ा राजनीतिक परिणाम सामने ला दिया है.
नागेंद्र ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि उन्होंने पार्टी को किसी तरह की शर्मिंदगी से बचाने के लिए स्वेच्छा से पद छोड़ने का निर्णय लिया है. हालांकि, उन्होंने अपने खिलाफ उठाए जा रहे राजनीतिक सवालों को स्वीकार करने के बजाय विपक्ष की राजनीति पर भी निशाना साधा. उन्होंने भारतीय जनता पार्टी पर ‘मनुवादी’ राजनीति करने का आरोप लगाया और खुद को इसका शिकार बताया. इस बयान से साफ है कि इस्तीफे के बावजूद नागेंद्र ने अपने खिलाफ लगाए जा रहे राजनीतिक आरोपों को स्वीकार नहीं किया है.
मामला महार्षि वाल्मीकि अनुसूचित जनजाति विकास निगम में कथित वित्तीय अनियमितताओं से जुड़ा है. निगम का काम अनुसूचित जनजाति समुदाय के कल्याण और विकास से संबंधित योजनाओं से जुड़ा है. ऐसे संस्थान में वित्तीय गड़बड़ी के आरोप राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील माने जाते हैं, क्योंकि इसका सीधा संबंध सरकारी धन और लक्षित लाभार्थियों से जुड़ा होता है. इसी कारण मामले ने राजनीतिक रंग ले लिया और विपक्ष ने इसे सरकार की जवाबदेही से जोड़कर लगातार उठाया.
नागेंद्र के इस्तीफे की सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने केवल मंत्रिमंडल से अलग होने का फैसला नहीं किया, बल्कि विधायक पद छोड़ने की भी घोषणा की. इससे इस घटनाक्रम का दायरा महज मंत्रिमंडल में फेरबदल तक सीमित नहीं रहा. विधायक पद से इस्तीफा देने का निर्णय उनके राजनीतिक भविष्य और आने वाले दिनों में राज्य की राजनीति पर भी असर डाल सकता है. अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि उनके इस्तीफे के बाद कांग्रेस नेतृत्व इस पूरे घटनाक्रम को किस तरह संभालता है और सरकार मामले को लेकर आगे क्या कदम उठाती है.
विपक्ष के लिए नागेंद्र का इस्तीफा सरकार पर दबाव बनाने के अपने अभियान को मजबूत करने का अवसर है. भाजपा इसे सरकार की जवाबदेही तय करने की दिशा में अपनी राजनीतिक जीत के रूप में पेश कर सकती है. आने वाले दिनों में पार्टी इस मुद्दे को विधानसभा और सार्वजनिक मंचों पर और अधिक जोर से उठा सकती है. खासकर सरकारी निगमों में वित्तीय प्रबंधन और कल्याणकारी योजनाओं के धन के इस्तेमाल को लेकर विपक्ष सरकार से जवाब मांग सकता है.
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए चुनौती केवल एक मंत्री के इस्तीफे तक सीमित नहीं है. सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि वित्तीय अनियमितताओं से जुड़े आरोपों की जांच विश्वसनीय तरीके से आगे बढ़े और किसी भी स्तर पर राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप न लगें. मामले में पारदर्शिता बनाए रखना सरकार के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण होगा क्योंकि निगम के संसाधन अनुसूचित जनजाति समुदाय के कल्याण से जुड़े हैं.
नागेंद्र ने अपने इस्तीफे को राजनीतिक दबाव के सामने झुकने के बजाय पार्टी हित में लिया गया स्वैच्छिक फैसला बताया है. उनके बयान में भाजपा की राजनीति पर हमला यह संकेत देता है कि वह इस मुद्दे पर अपनी राजनीतिक लड़ाई जारी रखने की कोशिश कर सकते हैं. हालांकि, मंत्री पद और विधायक पद से अलग होने के बाद उनकी राजनीतिक भूमिका किस रूप में सामने आएगी, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा.
इस पूरे घटनाक्रम ने कर्नाटक सरकार के सामने दोहरी चुनौती खड़ी कर दी है. एक तरफ वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों की जांच और जवाबदेही का सवाल है, वहीं दूसरी ओर विपक्ष इसे सरकार की कार्यप्रणाली पर व्यापक हमला बनाने की कोशिश करेगा. नागेंद्र का इस्तीफा तत्काल राजनीतिक दबाव को कुछ हद तक कम कर सकता है, लेकिन इससे मूल आरोप और उनसे जुड़े सवाल खत्म नहीं होते.
अब निगाह इस बात पर रहेगी कि सरकार मामले की जांच को किस दिशा में आगे बढ़ाती है, वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों में आगे क्या तथ्य सामने आते हैं और नागेंद्र के इस्तीफे के बाद कांग्रेस इस राजनीतिक संकट को किस तरह संभालती है. फिलहाल उनका कैबिनेट और विधायक पद छोड़ना कर्नाटक की सियासत में एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम बन गया है.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

