ZEE के संस्थापक सुभाष चंद्र की 6.5 करोड़ की पुनर्भुगतान योजना पर एनसीएलटी की मुहर, 22006 करोड़ के दावों के मुकाबले भुगतान

ZEE के संस्थापक सुभाष चंद्र की 6.5 करोड़ की पुनर्भुगतान योजना पर एनसीएलटी की मुहर, 22006 करोड़ के दावों के मुकाबले भुगतान

प्रेषित समय :21:15:57 PM / Fri, Aug 28th, 2026
Reporter : पलपल रिपोर्टर

नई दिल्ली.एस्सेल समूह के चेयरमैन और जी टीवी के संस्थापक डॉ. सुभाष चंद्र से जुड़ी व्यक्तिगत दिवालिया प्रक्रिया में राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (एनसीएलटी) ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. नई दिल्ली स्थित एनसीएलटी ने 25 अगस्त को सुभाष चंद्र की ओर से पेश की गई पुनर्भुगतान योजना को मंजूरी देने का रास्ता साफ कर दिया. करीब 22,006.57 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावों के मुकाबले योजना में लेनदारों को कुल 6.25 करोड़ रुपये देने का प्रस्ताव है. यानी प्रस्तावित भुगतान स्वीकृत दावों की राशि का लगभग 0.028 प्रतिशत ही है. हालांकि, कुछ ऐसे दावों को सूची से बाहर करने का निर्देश दिया गया है, जिन्हें पर्याप्त दस्तावेजों के अभाव में स्वीकार किया गया था. इससे अंतिम वितरण राशि में बदलाव संभव है.

यह मामला इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड और डॉ. सुभाष चंद्र के बीच व्यक्तिगत गारंटी से जुड़ा है. इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस ने वर्ष 2022 में दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता के तहत सुभाष चंद्र के खिलाफ व्यक्तिगत गारंटर के रूप में दिवाला प्रक्रिया शुरू करने की मांग की थी. मामला सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेशों के कारण कुछ समय तक आगे नहीं बढ़ सका और अप्रैल 2024 में याचिका स्वीकार किए जाने के बाद प्रक्रिया आगे बढ़ी.

मामले में समाधान पेशेवर शिव नंदन शर्मा ने लेनदारों के सामने पुनर्भुगतान योजना रखी. इसमें लेनदारों के लिए 6.25 करोड़ रुपये और प्रक्रिया से जुड़े खर्च के लिए 25 लाख रुपये का प्रावधान था. कुल स्वीकृत दावों की तुलना में यह राशि बेहद कम थी. इसके बावजूद लेनदारों के मतदान में 80.814 प्रतिशत मतदान हिस्सेदारी रखने वाले सदस्यों ने योजना के पक्ष में मतदान किया. योजना को लेकर कई बड़े वित्तीय संस्थानों ने आपत्ति दर्ज कराई और इसकी प्रक्रिया तथा संभावित वसूली पर सवाल उठाए.

आरबीएल बैंक, केनरा बैंक, एचडीएफसी बैंक, आईडीबीआई ट्रस्टीशिप और इंडसइंड बैंक ने अलग-अलग आवेदन देकर योजना को चुनौती दी. एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस ने भी योजना पर आपत्ति जताई, जबकि एसटीसीआई फाइनेंस ने अलग से इसे चुनौती दी. आपत्तियों में बेहद कम वसूली, प्रक्रिया में कथित खामियां और कुछ संस्थाओं को मतदान में शामिल किए जाने को लेकर सवाल उठाए गए थे. कुछ लेनदारों का तर्क था कि इतने बड़े दावों के मुकाबले प्रस्तावित भुगतान व्यावहारिक रूप से नगण्य है.

योजना पर एनसीएलटी के न्यायिक और तकनीकी सदस्यों की राय एक नहीं रही. न्यायिक सदस्य ने योजना को स्वीकार करने का पक्ष लिया, जबकि तकनीकी सदस्य ने इसे मंजूर करने से असहमति जताई. दोनों के बीच मतभेद के कारण मामला तीसरे सदस्य न्यायिक सदस्य निलेश शर्मा के सामने रखा गया. शर्मा की राय के बाद बहुमत का रुख योजना को मंजूरी देने के पक्ष में रहा.

तीसरे सदस्य ने अपने आदेश में कहा कि आवश्यक बहुमत वाले लेनदारों ने पुनर्भुगतान योजना के पक्ष में मतदान किया है. केवल कुछ लेनदारों के विरोध या व्यक्तिगत गारंटर के वित्तीय मामलों पर आपत्ति जताए जाने से योजना को मंजूरी देने योग्य नहीं मानने का आधार नहीं बनता. अधिकरण ने यह भी स्पष्ट किया कि व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया में लेनदारों के व्यावसायिक निर्णय की जगह अधिकरण अपना निर्णय नहीं थोप सकता.

लेनदारों की ओर से प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों में यह भी शामिल था कि उन्हें योजना पर विचार करने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया. कुछ आपत्तियों में कहा गया कि योजना पर विचार के लिए केवल छह दिन मिले और बढ़ी हुई मतदान अवधि 31 अक्टूबर 2024 को समाप्त हुई, जो दिवाली का सार्वजनिक अवकाश था. हालांकि, तीसरे सदस्य ने इस आपत्ति को स्वीकार नहीं किया. उनके अनुसार लेनदारों ने नोटिस अवधि कम करने पर सहमति दी थी और 95 प्रतिशत से अधिक मतदान हिस्सेदारी वाले लेनदारों ने प्रक्रिया में भाग लिया था.

एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस ने अपने दावे की तुलना में बेहद कम भुगतान का मुद्दा उठाया. उसके अनुसार करीब 1,322 करोड़ रुपये के स्वीकृत दावे के मुकाबले केवल 38 लाख रुपये के भुगतान का प्रस्ताव था. लेनदारों ने यह तर्क भी रखा कि व्यक्तिगत गारंटर अपनी देनदारी को इस आधार पर कम नहीं कर सकता कि मूल उधारकर्ता या अन्य पक्षों की ओर से कुछ भुगतान किए गए हैं.

मामले में सुभाष चंद्र की संपत्ति और पूर्व में दिए गए नेटवर्थ प्रमाणपत्रों को लेकर भी सवाल उठे. कुछ लेनदारों ने 2017 में आरबीएल बैंक और 2018 में केनरा बैंक को दिए गए नेटवर्थ प्रमाणपत्रों का हवाला दिया, जिनमें उनकी नेटवर्थ क्रमशः 7.17 अरब अमेरिकी डॉलर और 40,562 करोड़ रुपये बताई गई थी. इसके जवाब में सुभाष चंद्र की ओर से कहा गया कि ये आंकड़े व्यक्तिगत रूप से उनके स्वामित्व वाली संपत्तियों के नहीं, बल्कि प्रमोटर समूह की कंपनियों की संपत्तियों पर आधारित थे.

अधिकरण ने संबंधित संस्थाओं को ‘एसोसिएट’ माने जाने के सवाल पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की. सुभाष चंद्र से जुड़े पक्षों को मतदान से बाहर करने की मांग की गई थी. एनसीएलटी ने कहा कि व्यक्तिगत दिवाला प्रक्रिया में एसोसिएट की परिभाषा कॉरपोरेट दिवाला प्रक्रिया में लागू ‘रिलेटेड पार्टी’ की अवधारणा से अलग है. अधिकरण के अनुसार केवल पारिवारिक संबंध या अप्रत्यक्ष प्रभाव किसी संस्था को एसोसिएट मानने के लिए पर्याप्त नहीं है. इसके लिए कानून में निर्धारित हिस्सेदारी या नियंत्रण की शर्तों को ठोस प्रमाण के साथ साबित करना आवश्यक है.

इसी आधार पर अधिकरण ने वीणा इन्वेस्टमेंट्स और उसकी सहायक कंपनियों को सुभाष चंद्र की एसोसिएट संस्थाएं मानने से इनकार कर दिया. अधिकरण ने कहा कि किसी लेनदार को मतदान के अधिकार से वंचित करना उसके महत्वपूर्ण वैधानिक अधिकार को प्रभावित करता है. इसलिए केवल संदेह या अनुमान के आधार पर ऐसा नहीं किया जा सकता.

एसटीसीआई फाइनेंस की आपत्ति पर भी अधिकरण ने राहत नहीं दी. उसका कहना था कि सुरक्षित लेनदार के रूप में उसकी सहमति जरूरी थी. एनसीएलटी ने कहा कि पुनर्भुगतान योजना से उसकी सुरक्षा समाप्त या प्रभावित नहीं होती और वह अपनी बंधक संपत्ति के संबंध में स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने के अधिकार को बनाए रखता है.

कम वसूली के सवाल पर अधिकरण ने माना कि प्रस्तावित राशि बहुत कम है, लेकिन केवल इसी आधार पर योजना को खारिज नहीं किया जा सकता. आदेश में उपलब्ध व्यक्तिगत संपत्तियों की स्थिति और इस संभावना पर भी विचार किया गया कि दिवालिया प्रक्रिया में लेनदारों को इससे भी कम या कुछ भी प्राप्त न हो. अधिकरण ने इस बात को महत्वपूर्ण माना कि लेनदारों के आवश्यक बहुमत ने योजना को स्वीकार किया है.

मामले में एक अन्य महत्वपूर्ण तथ्य कुछ दावों को स्वीकार करने की प्रक्रिया से जुड़ा रहा. अधिकरण ने पाया कि अनिल कुमार के माध्यम से 960 व्यक्तियों और सुनील जैन के माध्यम से 300 व्यक्तियों से जुड़े दावों को केवल सुभाष चंद्र के मौखिक आश्वासन के आधार पर स्वीकार किया गया था. इन दावों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज उपलब्ध नहीं थे. तीसरे सदस्य ने माना कि ऐसे दावों को स्वीकार करना उचित नहीं था.

एनसीएलटी ने इन असमर्थित दावों को बाहर करने का निर्देश दिया है. साथ ही, इन दावों के लिए निर्धारित राशि को अन्य पात्र लेनदारों के बीच पुनर्वितरित करने को कहा गया है. इसके बाद मामले को मूल खंडपीठ के समक्ष रखा जाएगा, ताकि बहुमत की राय के आधार पर आगे आवश्यक आदेश पारित किए जा सकें.

यह फैसला व्यक्तिगत गारंटरों के खिलाफ चलने वाली दिवाला प्रक्रिया में लेनदारों की मतदान शक्ति, पुनर्भुगतान योजना की स्वीकृति और अधिकरण की सीमित लेकिन निगरानी वाली भूमिका को लेकर महत्वपूर्ण माना जा रहा है. फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि बड़ी राशि के दावे और कम वसूली अपने आप में किसी पुनर्भुगतान योजना को खारिज करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं हैं, यदि वैधानिक प्रक्रिया पूरी हुई हो और आवश्यक बहुमत ने योजना को स्वीकार किया हो. हालांकि, असमर्थित दावों को हटाने के बाद अंतिम रूप से पात्र लेनदारों को मिलने वाली राशि का वास्तविक वितरण अब आगे की प्रक्रिया में तय होगा.

Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-