नई दिल्ली. भारतीय क्रिकेट से जुड़े एक परिवार की बेटी अनाया बांगर की क्रिकेट में वापसी की कोशिश अब देश की सीमाओं से बाहर एक नए पड़ाव तक पहुंच गई है. पूर्व भारतीय क्रिकेटर और कोच संजय बांगर की बेटी अनाया ने महिला क्रिकेट में प्रतिस्पर्धात्मक स्तर पर खेलने की इच्छा को लेकर भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड से संपर्क किया था. उनका दावा है कि उन्हें वहां से कोई स्पष्ट जवाब नहीं मिला. इसके बाद उन्होंने क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया से संपर्क किया, जहां उन्हें सामुदायिक स्तर की महिला क्रिकेट में खेलने की अनुमति मिल गई है. इस घटनाक्रम ने महिला क्रिकेट में पात्रता, खेल संगठनों की नीतियों और ट्रांसजेंडर खिलाड़ियों के लिए प्रतिस्पर्धात्मक अवसरों को लेकर बहस को फिर चर्चा में ला दिया है.
अनाया का क्रिकेट से रिश्ता नया नहीं है. मुंबई में उम्र आधारित क्रिकेट से शुरुआत करने के बाद उन्होंने क्लब और राज्य स्तर पर क्रिकेट खेला. क्रिकेट उनके लिए केवल पारिवारिक विरासत का हिस्सा नहीं रहा, बल्कि बचपन से ही उनके खेल जीवन का महत्वपूर्ण आधार रहा है. उनके पिता संजय बांगर भारत के लिए टेस्ट और एकदिवसीय क्रिकेट खेल चुके हैं और बाद में कोच की भूमिका में भी रहे. ऐसे माहौल में क्रिकेट से जुड़ाव स्वाभाविक रूप से मजबूत हुआ, लेकिन समय के साथ अनाया के सामने खेल जारी रखने से जुड़ी पात्रता की चुनौती खड़ी हो गई.
अनाया ने अपने संक्रमण के अनुभव को सार्वजनिक रूप से साझा किया है. इसके साथ ही उनका मामला महिला क्रिकेट में भागीदारी के नियमों से जुड़ गया. अलग-अलग क्रिकेट संस्थाओं में इस विषय पर नियम और पात्रता की शर्तें समान नहीं हैं. अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के स्तर पर ट्रांसजेंडर महिला खिलाड़ियों को लेकर नियम पहले की तुलना में अधिक स्पष्ट और प्रतिबंधात्मक हुए हैं. विशेष रूप से पुरुष यौवन से गुजर चुकी ट्रांसजेंडर महिलाओं की अंतरराष्ट्रीय महिला क्रिकेट में भागीदारी पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद की नीति महत्वपूर्ण है. ऐसे में घरेलू और सामुदायिक क्रिकेट में खेलने के अवसरों को लेकर अलग-अलग क्रिकेट बोर्डों की नीतियां अहम हो जाती हैं.
अनाया का कहना है कि इसी स्थिति को समझने के लिए उन्होंने भारत में क्रिकेट की सर्वोच्च संस्था से संपर्क किया था. उनका उद्देश्य यह जानना था कि भारत में ट्रांसजेंडर खिलाड़ी महिला क्रिकेट में प्रतिस्पर्धात्मक रूप से हिस्सा ले सकती हैं या नहीं. उनके मुताबिक, भारतीय बोर्ड से उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. उनके लिए यह केवल व्यक्तिगत खेल करियर का सवाल नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था से स्पष्टता पाने की कोशिश भी थी जिसके तहत वह अपने भविष्य का निर्णय ले सकें.
भारतीय क्रिकेट में महिला वर्ग तेजी से विस्तार कर रहा है. घरेलू प्रतियोगिताओं से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक महिला खिलाड़ियों के लिए अवसर बढ़े हैं. ऐसे दौर में खिलाड़ियों की पात्रता से जुड़े प्रश्न भी अधिक महत्वपूर्ण हो गए हैं. अनाया का मामला इसी व्यापक बदलाव के बीच सामने आया है. उनका तर्क है कि यदि किसी खिलाड़ी को नियमों के कारण किसी वर्ग में खेलने से रोका जाना है तो संबंधित संस्था की ओर से स्पष्ट नीति और संवाद भी होना चाहिए.
भारत से स्पष्टता नहीं मिलने के बाद अनाया ने जून 2026 में क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया से संपर्क किया. ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट बोर्ड ने उन्हें सामुदायिक स्तर की महिला क्रिकेट में खेलने की अनुमति दी. उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह अनुमति ऑस्ट्रेलिया की घरेलू प्रतियोगिता के उस स्तर तक है, जहां पात्रता के लिए संबंधित नियम लागू होते हैं. उन्हें मार्च 2027 तक प्रीमियर क्रिकेट में खेलने की अनुमति मिली है. हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि उन्हें ऑस्ट्रेलिया की शीर्ष महिला प्रतियोगिताओं में स्वतः खेलने का अधिकार मिल गया है. उच्च स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए अलग पात्रता नियम लागू होंगे.
यही अंतर इस पूरे मामले को महत्वपूर्ण बनाता है. एक ओर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में पात्रता संबंधी नियम अपेक्षाकृत कड़े हैं, दूसरी ओर घरेलू या सामुदायिक स्तर पर कुछ क्रिकेट बोर्ड अलग व्यवस्था के तहत खिलाड़ियों को अवसर दे रहे हैं. इससे यह सवाल भी उठता है कि क्या भविष्य में महिला क्रिकेट के विभिन्न स्तरों के लिए पात्रता का एक समान ढांचा बनाया जाएगा या अलग-अलग प्रतियोगिताओं के लिए अलग नियम जारी रहेंगे.
अनाया के लिए ऑस्ट्रेलिया में खेलने की अनुमति उनके क्रिकेट जीवन में एक नई शुरुआत है. उन्होंने सार्वजनिक रूप से यह भी कहा है कि एक समय उन्हें लगा था कि वह शायद दोबारा प्रतिस्पर्धात्मक क्रिकेट नहीं खेल पाएंगी. अब उन्हें मैदान पर लौटने का अवसर मिला है. हालांकि यह अवसर किसी बड़े टूर्नामेंट में चयन की गारंटी नहीं है. उन्हें क्लब स्तर पर प्रदर्शन करना होगा और उपलब्ध अवसरों के आधार पर अपनी जगह बनानी होगी.
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू भारतीय क्रिकेट प्रशासन से जुड़ा है. अनाया द्वारा बीसीसीआई से संपर्क किए जाने और जवाब नहीं मिलने का दावा यदि सही है तो यह केवल एक खिलाड़ी की व्यक्तिगत शिकायत के रूप में नहीं देखा जा सकता. खेल संगठनों के सामने अब ऐसे मामलों के लिए स्पष्ट संवाद और नीति की जरूरत पहले से अधिक महसूस हो रही है. किसी भी खिलाड़ी के लिए पात्रता संबंधी स्थिति को समय रहते स्पष्ट किया जाना उसके करियर की योजना बनाने के लिए जरूरी होता है.
संजय बांगर की बेटी होने के कारण अनाया का मामला स्वाभाविक रूप से लोगों का अधिक ध्यान आकर्षित कर रहा है, लेकिन इसकी अहमियत केवल उनके पारिवारिक परिचय तक सीमित नहीं है. यह मामला उस बड़े प्रश्न को सामने रखता है कि बदलते सामाजिक और खेल परिदृश्य में क्रिकेट की संस्थाएं खिलाड़ियों की पहचान, पात्रता और प्रतिस्पर्धात्मक अवसरों से जुड़े मुद्दों को किस तरह संबोधित करती हैं.
अनाया के सामने अब सबसे तत्काल चुनौती मैदान पर वापसी की है. ऑस्ट्रेलिया में खेलने की अनुमति मिलने के बाद उन्हें क्लब क्रिकेट के माध्यम से अपनी फिटनेस, कौशल और प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता साबित करने का अवसर मिलेगा. शीर्ष स्तर तक पहुंचने के लिए उन्हें वहां लागू अतिरिक्त पात्रता शर्तों को भी पूरा करना होगा. इसलिए ऑस्ट्रेलिया का निर्णय उनके क्रिकेट करियर का अंतिम पड़ाव नहीं, बल्कि वापसी की शुरुआत है.
उनकी कहानी में क्रिकेट परिवार की विरासत, व्यक्तिगत पहचान और खेल नियम तीनों एक साथ दिखाई देते हैं. एक तरफ वह उस खेल में लौटना चाहती हैं जिससे उनका बचपन जुड़ा रहा, दूसरी तरफ महिला क्रिकेट में भागीदारी के नियम उनके रास्ते को निर्धारित कर रहे हैं. भारत में उन्हें स्पष्ट जवाब नहीं मिलने का उनका दावा और ऑस्ट्रेलिया में खेलने की अनुमति मिलना दोनों घटनाएं इस बहस को अलग-अलग दृष्टिकोण देती हैं.
आने वाले समय में अनाया का प्रदर्शन और क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया की पात्रता व्यवस्था इस मामले की दिशा तय करेगी. साथ ही यह भी देखना होगा कि भारतीय क्रिकेट प्रशासन ऐसे मामलों को लेकर कोई स्पष्ट नीति बनाता है या नहीं. फिलहाल अनाया के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि क्रिकेट का मैदान, जिसे उन्होंने अपने जीवन का हिस्सा माना है, उनके लिए फिर से खुल गया है. अब उनकी नजर वापसी को प्रदर्शन में बदलने पर होगी.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

