जोधपुर. नदियों, झीलों और जल स्त्रोतों पर अतिक्रमण रोकने की जिम्मेदारी अब केवल सरकारी अमले तक सीमित नहीं रहेगी. राजस्थान हाईकोर्ट ने जल स्रोतों के संरक्षण से जुड़ी सुनवाई के दौरान मीडिया और पत्रकारों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण माना है. अदालत ने कहा कि पत्रकार जनता की आंख और कान हैं. यदि उन्हें जलस्रोतों या सरकारी जमीन पर अतिक्रमण दिखाई देता है तो वे इसकी जानकारी जिला कलेक्टर को दे सकते हैं. कलेक्टर को ऐसी सूचना की जांच कराए जाने और सही पाए जाने पर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं.
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और न्यायमूर्ति चंद्रशेखर शर्मा की खंडपीठ ने यह टिप्पणी जयपुर जिला कलेक्टर की ओर से प्रस्तुत हलफनामे पर सुनवाई के दौरान की. हलफनामे में रामगढ़ बांध की ओर पानी के बहाव वाले क्षेत्र में आने वाली नदियों और छोटे नालों के जलग्रहण क्षेत्रों में मौजूद अतिक्रमणों की सूची अदालत के समक्ष रखी गई थी. सूची का अवलोकन करने के बाद अदालत ने पाया कि जयपुर जिले की कई तहसीलों में बड़ी संख्या में अतिक्रमण मौजूद हैं, जिन्हें हटाया जाना आवश्यक है.
अदालत के सामने विशेष रूप से आंधी, जमवारामगढ़, आमेर, शाहपुरा और विराटनगर तहसीलों में मौजूद अतिक्रमण का मामला आया. न्यायालय ने सरकारी जमीन पर कब्जा करने वालों को अतिक्रमणकारी मानते हुए इन कब्जों को हटाने की प्रक्रिया आगे बढ़ाने के निर्देश दिए. जलस्रोतों के आसपास और उनके जलग्रहण क्षेत्रों में मौजूद अतिक्रमण को हटाने के पीछे मुख्य उद्देश्य प्राकृतिक जल प्रवाह और जलस्रोतों के संरक्षण को बनाए रखना है.
मामले में एक व्यावहारिक समस्या भी सामने आई. अतिक्रमणकारियों की संख्या अधिक होने के कारण प्रत्येक व्यक्ति को अलग-अलग नोटिस भेजने में काफी समय लग सकता है. वहीं, कानून के अनुसार अतिक्रमण हटाने से पहले संबंधित व्यक्ति को नोटिस देकर अपना पक्ष रखने और कब्जा हटाने का अवसर देना आवश्यक है. इसी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए हाईकोर्ट ने अतिक्रमणकारियों की सूची समाचार पत्रों में प्रकाशित करने का निर्देश दिया.
अदालत ने राज्य में सर्वाधिक प्रसार वाले दो समाचार पत्रों दैनिक भास्कर और राजस्थान पत्रिका में अतिक्रमणकारियों की सूची प्रकाशित कराने को कहा है. इस प्रकाशन को कानूनी नोटिस की प्रक्रिया पूरी करने के उद्देश्य से किया जाएगा. सूची प्रकाशित होने के बाद संबंधित अतिक्रमणकारियों को अतिक्रमण हटाने के लिए 15 दिन का समय मिलेगा. अदालत का मानना है कि सार्वजनिक रूप से सूचना प्रकाशित होने के बाद किसी अतिक्रमणकारी के लिए यह कहना कठिन होगा कि उसे कार्रवाई की जानकारी नहीं थी या उसे सुनवाई का अवसर नहीं दिया गया.
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि 15 दिन की अवधि समाप्त होने के बाद यदि अतिक्रमण नहीं हटाया जाता है तो राज्य सरकार और उसके अधिकारी तत्काल कार्रवाई कर सकेंगे. अतिक्रमण हटाने में आने वाला खर्च भी संबंधित अतिक्रमणकारियों से वसूला जाएगा. यानी सरकारी जमीन या जलस्रोतों से जुड़ी भूमि पर कब्जा करने के बाद उसे हटाने की कार्रवाई का आर्थिक भार भी सरकारी खजाने पर नहीं छोड़ा जाएगा.
अदालत ने बड़े पैमाने पर अतिक्रमण अथवा कार्रवाई के दौरान विरोध की स्थिति से निपटने के लिए भी प्रशासन को पर्याप्त अधिकार दिए हैं. जरूरत पड़ने पर राज्य सरकार पुलिस सहायता ले सकती है. यदि कार्रवाई का विरोध कानून-व्यवस्था की स्थिति पैदा करता है तो संबंधित लोगों के खिलाफ आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की कार्रवाई भी की जा सकती है.
इसी सुनवाई के दौरान पत्रकारों की भूमिका पर अदालत की टिप्पणी विशेष रूप से महत्वपूर्ण रही. हाईकोर्ट ने कहा कि मीडिया और पत्रकारों को जनता की आंख और कान माना जाता है. जहां कहीं उन्हें अतिक्रमण दिखाई देता है, वे उसकी जानकारी जयपुर कलेक्टर को दे सकते हैं. इस सूचना पर कलेक्टर को जांच करानी होगी और यदि शिकायत सही पाई जाती है तो आवश्यक कार्रवाई करनी होगी.
अदालत की यह टिप्पणी पत्रकारिता की भूमिका को केवल खबर प्रकाशित करने तक सीमित नहीं रखती. जलस्रोतों के आसपास होने वाले अतिक्रमण अक्सर स्थानीय स्तर पर दिखाई देते हैं और कई बार उनकी जानकारी प्रशासन तक पहुंचने में समय लग जाता है. ऐसे में पत्रकार स्थानीय स्तर पर सामने आने वाली समस्या को प्रशासन के संज्ञान में लाने का माध्यम बन सकते हैं. हालांकि कार्रवाई करने की जिम्मेदारी संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों की ही रहेगी.
रामगढ़ बांध से जुड़े मामले में जलग्रहण क्षेत्र का महत्व भी सामने आया है. किसी बांध या जलस्रोत का संरक्षण केवल उसके मुख्य जल क्षेत्र तक सीमित नहीं होता. उन नदियों, नालों और प्राकृतिक रास्तों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है, जिनके माध्यम से पानी जलस्रोत तक पहुंचता है. इन क्षेत्रों में अतिक्रमण होने से पानी के प्राकृतिक बहाव में बाधा पैदा हो सकती है. इसलिए अदालत ने जलग्रहण क्षेत्र में मौजूद कब्जों को गंभीरता से लिया है.
जिला कलेक्टर को अतिक्रमण की सूचना देने का अधिकार आम नागरिकों और पत्रकारों दोनों के लिए एक तरह से निगरानी की भूमिका को मजबूत करता है. कोई व्यक्ति या संस्था भी अतिक्रमण की जानकारी प्रशासन को दे सकती है और कलेक्टर को उस सूचना की जांच करनी होगी. इससे अतिक्रमण की पहचान केवल सरकारी सर्वे और निरीक्षण तक सीमित नहीं रहेगी.
हाईकोर्ट के निर्देशों में एक ओर अतिक्रमणकारियों को कानूनी प्रक्रिया के तहत 15 दिन का अवसर देने की बात है, तो दूसरी ओर समयसीमा समाप्त होने के बाद प्रशासन को तत्काल कार्रवाई करने का स्पष्ट संदेश भी है. इससे जलस्रोतों और सरकारी जमीन से जुड़े अतिक्रमण मामलों में लंबे समय तक कार्रवाई लंबित रहने की संभावना कम करने का प्रयास दिखाई देता है.
मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर 2026 को होगी. उस समय प्रशासन की ओर से अतिक्रमण की पहचान और उन्हें हटाने की दिशा में हुई कार्रवाई की जानकारी अदालत के सामने रखी जा सकती है. फिलहाल हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जलस्रोतों की सुरक्षा केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी नहीं है. नागरिकों और पत्रकारों की सतर्क निगाह भी इस व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकती है और अतिक्रमण की सूचना समय पर प्रशासन तक पहुंचाकर वे जलस्रोतों के संरक्षण में अपनी भूमिका निभा सकते हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

