जबलपुर. मध्य प्रदेश के 13,565 चिह्नित वेटलैंड को अतिक्रमण और अनियंत्रित निर्माण से बचाने के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण के ताजा निर्देश अब संरक्षण की प्रक्रिया को कागजी रिकॉर्ड से जमीन पर ले जाने वाले हैं. अधिकरण ने सभी वेटलैंड की वास्तविक सीमा पर मुनार यानी सीमा-चिह्न लगाने का काम छह महीने में पूरा करने के निर्देश दिए हैं. आदेश में मुख्य सचिव को संबंधित विभागों के बीच समन्वय कर तय समयसीमा में यह काम पूरा कराने की जिम्मेदारी सौंपी गई है. राज्य वेटलैंड प्राधिकरण को सभी संबंधित विभागों को तकनीकी सहायता देने के निर्देश भी दिए गए हैं.
जबलपुर के लिए यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मध्य प्रदेश राज्य वेटलैंड प्राधिकरण और पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन की 9 मार्च 2026 की जिला-वार रिपोर्ट में जिले में 317 वेटलैंड दर्ज हैं. इनमें 316 राजस्व भूमि और एक वन भूमि से संबंधित है. रिपोर्ट में इन सभी 317 वेटलैंड का स्थलीय सत्यापन और सीमांकन पूरा दर्ज किया गया है. यानी यहां अब चुनौती केवल यह पता लगाने की नहीं है कि वेटलैंड कहां हैं, बल्कि उनकी तय सीमा को जमीन पर स्थायी रूप से सुरक्षित रखने और उसके बाद अतिक्रमण रोकने की है.
राज्य वेटलैंड प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार मध्य प्रदेश में कुल 13,565 वेटलैंड चिह्नित किए गए हैं. इनमें 13,043 राजस्व भूमि और 522 वन भूमि से संबंधित हैं. 9 मार्च 2026 तक 13,509 वेटलैंड का स्थलीय सत्यापन और 13,314 का सीमांकन पूरा हो चुका था. इसके बावजूद एनजीटी ने सभी वेटलैंड की जमीन पर सीमा-चिह्न लगाने की जरूरत पर जोर दिया है, ताकि संरक्षण के नियमों को मौके पर प्रभावी बनाया जा सके.
एनजीटी के आदेश का सबसे महत्वपूर्ण पहलू विभागीय जिम्मेदारी को स्पष्ट करना है. वेटलैंड अलग-अलग सरकारी विभागों, स्थानीय निकायों और अन्य एजेंसियों के अधीन होने के कारण किसी एक विभाग के लिए पूरे प्रदेश में मुनार लगाने का काम करना संभव नहीं माना गया. इसलिए अधिकरण ने मुख्य सचिव को संबंधित विभागों के बीच समन्वय कर छह महीने की तय समयसीमा में काम पूरा कराने का निर्देश दिया है. प्रगति की समीक्षा राज्य वेटलैंड प्राधिकरण के सदस्य सचिव को हर माह करने को कहा गया है. इस व्यवस्था से जबलपुर के लिए भी जिम्मेदारी का दायरा स्पष्ट होता है. जिले में वेटलैंड की पहचान और सीमांकन का रिकॉर्ड उपलब्ध होने के बाद संबंधित विभागों को अब मौके पर सीमा-चिह्न स्थापित करने की प्रक्रिया सुनिश्चित करनी होगी. इससे भविष्य में यह विवाद कम करने में मदद मिल सकती है कि किसी जल क्षेत्र की वास्तविक सीमा कहां तक है.
वेटलैंड संरक्षण में सबसे बड़ी समस्या कई बार रिकॉर्ड और जमीन की वास्तविक स्थिति के बीच अंतर की होती है. किसी तालाब या जलक्षेत्र का नाम राजस्व या पर्यावरणीय रिकॉर्ड में दर्ज होना अलग बात है और उसकी सीमा को मौके पर स्पष्ट रूप से चिह्नित करना अलग. मुनार लगाने का उद्देश्य इसी अंतर को खत्म करना है.
एनजीटी ने मुनार लगाने के बाद प्रमुख स्थानों पर सूचना-पट्ट लगाने के निर्देश भी दिए हैं. इन पर वेटलैंड नियमों के महत्वपूर्ण प्रावधानों की जानकारी देने को कहा गया है, ताकि स्थानीय लोगों को यह स्पष्ट हो सके कि संबंधित क्षेत्र का पर्यावरणीय महत्व क्या है और वहां किस तरह की गतिविधियां प्रतिबंधित हैं. )
प्रदेश के आंकड़े से अलग जिला-स्तर पर उपलब्ध 317 का आंकड़ा इस खबर का सबसे महत्वपूर्ण स्थानीय आधार है. इसे 13,565 के साथ मिलाकर नहीं देखा जाना चाहिए. 13,565 पूरे मध्य प्रदेश में चिह्नित वेटलैंड की संख्या है, जबकि 317 जिले के लिए राज्य वेटलैंड प्राधिकरण की जिला-वार रिपोर्ट में दर्ज संख्या है.
राज्य वेटलैंड प्राधिकरण की व्यवस्था में वेटलैंड संबंधी जानकारी को जिला और गांव के स्तर तक डिजिटल रूप से दर्ज करने का प्रावधान है. आधिकारिक पोर्टल में वेटलैंड का क्षेत्रफल, निर्देशांक, कोड, सीमा, जल निकासी और नदी संबंधी जानकारी सहित कई सूचनाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था बताई गई है. इससे भविष्य में जमीन पर होने वाले बदलावों की निगरानी को डिजिटल रिकॉर्ड से जोड़ने का आधार तैयार होता है.
सीमांकन और मुनार लगना संरक्षण की शुरुआत है, अंतिम समाधान नहीं. यदि सीमा-चिह्न लगाने के बाद उसके आसपास होने वाले निर्माण, मिट्टी भराव, जल निकासी में बदलाव और कचरे के प्रवेश पर नियमित निगरानी नहीं हुई तो केवल मुनार लगने से जलक्षेत्र सुरक्षित नहीं रहेंगे.
जबलपुर के जल निकायों को लेकर पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन पहले भी वैज्ञानिक अध्ययन कर चुका है. संगठन की आधिकारिक जानकारी में गुलौआ ताल, संग्राम सागर और शहर के 12 अन्य जल निकायों के जल गुणवत्ता संबंधी अध्ययन का उल्लेख है. इससे स्पष्ट है कि यहां जल निकायों का संरक्षण केवल भूमि सीमा का विषय नहीं, बल्कि जल गुणवत्ता और पारिस्थितिक स्थिति से भी जुड़ा है.
अतिक्रमण पर लगेगा अंकुश
मुनार लगाने का व्यावहारिक महत्व अतिक्रमण रोकने में सबसे अधिक सामने आएगा. जब किसी वेटलैंड की सीमा जमीन पर स्पष्ट होगी तो उसके भीतर या सीमा से सटे हिस्से में होने वाले निर्माण और भूमि उपयोग में बदलाव की पहचान आसान होगी. राजस्व रिकॉर्ड, स्थानीय निकायों की निर्माण अनुमति और वेटलैंड के डिजिटल रिकॉर्ड को आपस में जोड़कर निगरानी व्यवस्था और मजबूत की जा सकती है.
प्रदेश में वेटलैंड की जानकारी के लिए विकसित डिजिटल व्यवस्था में गांव स्तर तक की भौगोलिक जानकारी दर्ज करने का प्रावधान है. ऐसे में मुनार के साथ डिजिटल रिकॉर्ड का इस्तेमाल होने पर किसी जलक्षेत्र की सीमा में बदलाव को भविष्य में अधिक आसानी से जांचा जा सकेगा.
एनजीटी का आदेश केवल सीमा तय करने तक सीमित नहीं है. आदेश में यह भी कहा गया है कि मुनार स्थापित होने के बाद स्थानीय लोगों को जागरूक करने के लिए सूचना-पट्ट लगाए जाएं. इसका अर्थ यह है कि संरक्षण व्यवस्था में प्रशासन के साथ स्थानीय समुदाय की भूमिका को भी महत्व दिया गया है.
जिले में 317 वेटलैंड की पहचान और सीमांकन का रिकॉर्ड मौजूद होने के बाद अब अगला चरण यह सुनिश्चित करना होगा कि सीमा जमीन पर भी दिखाई दे और उसका उल्लंघन होने पर तत्काल कार्रवाई हो. यही वह बिंदु है जहां प्रदेश के ताजा आदेश का वास्तविक असर दिखाई देगा.
मध्य प्रदेश के लिए छह महीने की समयसीमा तय करने और मुख्य सचिव को विभागों के बीच समन्वय की जिम्मेदारी सौंपने का फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे वेटलैंड संरक्षण को केवल किसी एक विभाग की नियमित कार्रवाई मानने के बजाय अंतरविभागीय जिम्मेदारी का रूप मिलता है. जबलपुर के 317 वेटलैंड के संदर्भ में अब निगाह इस बात पर रहेगी कि तय सीमा के मुताबिक मुनार कब लगती हैं, सूचना-पट्ट कब लगाए जाते हैं और उसके बाद इन क्षेत्रों की नियमित निगरानी किस तरह होती है. यही प्रक्रिया तय करेगी कि कागज पर दर्ज वेटलैंड वास्तव में जमीन पर कितने सुरक्षित रह पाते हैं.
Source : palpalindia ये भी पढ़ें :-

